'बेटे की चाहत वाली पितृसत्तात्मक सोच अभी भी जारी': सुप्रीम कोर्ट ने सेक्स-सेलेक्शन पर रोक लगाने वाले कानूनों को सख्ती से लागू करने को कहा

Shahadat

11 Jun 2026 9:20 PM IST

  • बेटे की चाहत वाली पितृसत्तात्मक सोच अभी भी जारी: सुप्रीम कोर्ट ने सेक्स-सेलेक्शन पर रोक लगाने वाले कानूनों को सख्ती से लागू करने को कहा

    भारत में सेक्स-सेलेक्शन (लिंग-चयन) की प्रथाओं के अभी भी जारी रहने पर ध्यान देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने आज ज़ोर दिया कि 'प्री-कन्सेप्शन एंड प्री-नेटल डायग्नोस्टिक टेक्नीक्स (लिंग-चयन पर रोक) एक्ट, 1994' (PCPNDT Act) जैसे कल्याणकारी कानूनों को सख्ती से लागू किया जाना चाहिए।

    कोर्ट ने कहा,

    "यह सच है कि आम तौर पर लिंगानुपात (sex ratio) की गिरती स्थिति में काफी सुधार हुआ है, लेकिन कानून के प्रावधानों को कमजोर करना या उनके उल्लंघन को नजरअंदाज करना बर्दाश्त नहीं किया जा सकता।"

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की बेंच ने कहा कि हालांकि पिछले कुछ वर्षों में लिंगानुपात जैसे कई संकेतकों में सुधार हुआ है। फिर भी देश की प्रगति अधूरी और असमान है। कोर्ट ने कहा कि PCPNDT Act बनने के बाद से काफी प्रगति हुई है, लेकिन लड़की के जन्म को लेकर चिंताएं खत्म होने से पहले अभी भी बहुत कुछ हासिल करना बाकी है।

    कोर्ट ने कहा,

    "काफी प्रगति हुई है। फिर भी, अभी बहुत कुछ किया जाना बाकी है। संक्षेप में, हालांकि स्थिति 1990 के दशक के मध्य की तुलना में काफी बेहतर है, लेकिन आंकड़े लापरवाही की गुंजाइश नहीं देते। ऊपर बताए गए तथ्य दिखाते हैं कि हुई प्रगति अधूरी और असमान है। नतीजतन, PCPNDT Act जैसे कल्याणकारी कानूनों की अखंडता और सख्ती से उन्हें लागू करना ज़रूरी है। साथ ही लगातार और सच्ची कोशिशें भी ज़रूरी हैं, जब तक कि सोच में व्यापक बदलाव न आ जाए और जिसे अब तक महिला की 'जन्मजात कमजोरी' माना जाता है, उसकी जगह सच्ची समानता न ले ले और यह एहसास न हो जाए कि अब ऐसी कोशिशों की ज़रूरत नहीं है। इसका मतलब यह नहीं है कि IPC/BNS जैसे कानूनों के तहत महिलाओं की सुरक्षा करने वाले कानूनों की ज़रूरत नहीं रहेगी, लेकिन कम-से-कम इस बात पर सवाल नहीं उठेगा कि क्या लड़की को पैदा होने का हक है या नहीं।"

    कोर्ट ने यह टिप्पणी महाराष्ट्र के एक डॉक्टर की याचिका खारिज करते हुए की। डॉक्टर ने PCPNDT Act के तहत अपने सोनोग्राफी सेंटर में ज़रूरी रिकॉर्ड रखने में कथित कमियों के लिए अपने खिलाफ शुरू की गई आपराधिक कार्यवाही को चुनौती दी। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जहां नेशनल फ़ैमिली हेल्थ सर्वे-5 में कुल लिंगानुपात (sex ratio) प्रति 1,000 पुरुषों पर 1,020 महिलाओं का दर्ज किया गया, वहीं जन्म के समय लिंगानुपात प्रति 1,000 पुरुषों पर 929 महिलाओं का है। कोर्ट ने यह भी देखा कि कई राज्यों में जन्म के समय लिंगानुपात अभी भी राष्ट्रीय औसत से कम है, जो बेटे की चाहत और लिंग-चयन (sex-selection) जैसी पितृसत्तात्मक सोच और प्रथाओं के बने रहने को दिखाता है।

    कोर्ट ने देखा कि जनगणना के आंकड़ों से पता चलता है कि 1991 में प्रति 1,000 लड़कों पर 945 लड़कियां थीं, जो 2001 में घटकर 927 और 2011 में 919 हो गईं। हालांकि हाल के आंकड़े सुधार का संकेत देते हैं, लेकिन कोर्ट ने कहा कि यह सुधार केवल आंशिक रूप से स्थिति में बदलाव को दर्शाता है।

    कोर्ट ने कहा,

    "जन्म के समय लिंगानुपात का 929 तक पहुंचना आंशिक सुधार का संकेत है, लेकिन यह अभी भी सच्ची समानता और स्वीकार्यता की राह नहीं है। अलग-अलग राज्यों के आंकड़े इस बात को साबित करते हैं। उदाहरण के लिए, हरियाणा और पंजाब, जहां सदी की शुरुआत के ठीक बाद बच्चों का लिंगानुपात 900 से कम दर्ज किया गया, वहां बाद के सर्वेक्षणों में सुधार देखा गया। यह लागू किए गए नियमों और जागरूकता उपायों की सफलता को दर्शाता है। फिर भी कई राज्यों में जन्म के समय लिंगानुपात अभी भी राष्ट्रीय औसत से कम है। यह बेटे के प्रति गहरी पितृसत्तात्मक सोच और 'पर्दे के पीछे' लिंग-चयन प्रथाओं के प्रचलन को दिखाता है।"

    कोर्ट ने देखा कि जन्म के समय लिंगानुपात 2015-17 के दौरान प्रति 1,000 पुरुषों पर 896 महिलाओं से बढ़कर 2022-24 में प्रति 1,000 पुरुषों पर 918 महिलाएं हो गया।

    कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा,

    "हालांकि पिछली रिपोर्टों की तुलना में इसमें कुछ सुधार हुआ है, लेकिन यह अभी भी जैविक रूप से अपेक्षित स्तर (लगभग 950 या उससे अधिक) से कम है।"

    कोर्ट ने वर्ल्ड इकोनॉमिक फ़ोरम की 'ग्लोबल जेंडर गैप रिपोर्ट 2025' का ज़िक्र किया, जिसमें 148 देशों में भारत की कुल जेंडर समानता रैंकिंग 129 से गिरकर 131 हो गई।

    कोर्ट ने कहा कि देश में आंकड़ों में सुधार कई दशकों से सरकारों और लागू करने वाली एजेंसियों की लगातार कोशिशों का नतीजा है। कोर्ट ने केंद्र सरकार की 'बेटी बचाओ बेटी पढ़ाओ' योजना, 'सुकन्या समृद्धि योजना' और 'जननी सुरक्षा योजना' जैसी कई योजनाओं और राज्य-स्तर की पहलों का ज़िक्र किया, जिनका मकसद लड़कियों की स्थिति को बेहतर बनाना और कन्या भ्रूण हत्या को रोकना है।

    कोर्ट ने कहा,

    "हम बस इतना ही कह सकते हैं कि अपनी राह खुद तय करने के पचहत्तर साल से ज़्यादा समय बीत जाने के बाद भी आज भी किसी भी कस्बे या शहर में—दिल्ली समेत, जहां ये अक्सर दिल्ली ट्रांसपोर्ट कॉरपोरेशन की बसों पर दिखते हैं—लड़कियों की शिक्षा और उनकी बेहतरी (जिसमें आर्थिक सुरक्षा भी शामिल है) के लिए पोस्टर दिखना कोई असामान्य बात नहीं है।"

    कोर्ट ने कहा कि ये योजनाएं पितृसत्तात्मक सामाजिक ढांचे में लड़कियों के प्रति चली आ रही भेदभावपूर्ण सोच को खत्म करने की लगातार कोशिशों को दिखाती हैं, लेकिन उपलब्ध डेटा PCPNDT Act को लागू करने में किसी भी तरह की ढील का समर्थन नहीं करता है।

    इस मामले में PCPNDT Act के तहत रखे गए रिकॉर्ड में कथित कमियां मिलने के बाद अपील करने वाले डॉक्टर के खिलाफ कार्रवाई शुरू की गई। ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट फर्स्ट क्लास ने एक्ट की धारा 23 के तहत अपराधों का संज्ञान लिया, जो धारा 4(3), 5, 6 और 29 और संबंधित नियमों के कथित उल्लंघन से जुड़े थे। बाद में बॉम्बे हाई कोर्ट ने अभियोजन की कार्रवाई में दखल देने से इनकार किया।

    हाईकोर्ट के सामने डॉक्टर ने तर्क दिया कि जिस सिविल सर्जन ने कार्रवाई शुरू की, वह एक्ट के तहत सक्षम "उपयुक्त प्राधिकरण" (Appropriate Authority) नहीं है और 'फॉर्म F' में कथित गलतियां और खाली जगहें केवल तकनीकी और अनजाने में हुईं। 'फॉर्म F' PCPNDT नियमों के तहत हर प्रसव-पूर्व डायग्नोस्टिक प्रक्रिया और अल्ट्रासाउंड जांच के लिए ज़रूरी कानूनी रिकॉर्ड है। इसमें मरीज़, गर्भावस्था, प्रक्रिया के लिए मेडिकल कारणों और भ्रूण के लिंग का खुलासा न करने के बारे में घोषणाओं से जुड़ी जानकारी दर्ज की जाती है।

    हाईकोर्ट ने दोनों दलीलें खारिज कीं। कोर्ट ने पाया कि राज्य सरकार ने नोटिफिकेशन के ज़रिए ज़िला सिविल सर्जन को 'उपयुक्त प्राधिकरण' के तौर पर नियुक्त किया। इसके अलावा, कोर्ट ने माना कि रिकॉर्ड रखने में कमियां कोई मामूली बात नहीं है। साथ ही रिकॉर्ड रखने में लापरवाही न केवल धारा 4(3) के प्रावधान के तहत एक गंभीर अपराध है, बल्कि यह एक्ट के मकसद के भी खिलाफ है। हाईकोर्ट ने कहा कि कथित उल्लंघनों के दायरे और प्रकृति की जांच ट्रायल के दौरान की जानी चाहिए।

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि PCPNDT Act के तहत रिकॉर्ड रखने के बारे में कानूनी स्थिति पहले ही तय हो चुकी है। कोर्ट ने 'फेडरेशन ऑफ ऑब्सटेट्रिक्स एंड गायनेकोलॉजिकल सोसाइटीज ऑफ इंडिया बनाम भारत सरकार' मामले में अपने पहले के फैसले का ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि रिकॉर्ड न रखना सिर्फ़ कागज़ी गलती नहीं है, बल्कि इससे भ्रूण हत्या जैसा अपराध होने का रास्ता खुलता है। कोर्ट ने कहा कि सही रिकॉर्ड ही अक्सर एकमात्र ज़रिया होते हैं जिनसे अधिकारी यह पक्का कर सकते हैं कि डायग्नोस्टिक सुविधाओं का इस्तेमाल गैर-कानूनी लिंग जांच के लिए नहीं किया जा रहा है।

    मजिस्ट्रेट और हाई कोर्ट के आदेशों में दखल देने का कोई कारण न पाते हुए कोर्ट ने अपील खारिज की।

    Case Title – Dr. Ramesh v. State of Maharashtra & Anr.

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