'दोनों पक्ष 4 साल तक खुशी-खुशी साथ रहे, बाद में रिश्ते में खटास आ गई': सुप्रीम कोर्ट ने शादी के झूठे वादे पर रेप का मामला रद्द किया
Shahadat
5 May 2026 4:53 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में शादी के झूठे वादे पर रेप के आरोपी व्यक्ति के खिलाफ चल रही आपराधिक कार्यवाही रद्द की। कोर्ट ने पाया कि यह रिश्ता कई सालों तक आपसी सहमति से बना था और शादी के झूठे वादे के कारण शुरू नहीं हुआ, क्योंकि जब यह रिश्ता शुरू हुआ था, तब दोनों पक्ष पहले से ही किसी और से शादीशुदा थे।
कोर्ट ने कहा,
"तथ्यों को देखते हुए दोनों पक्षकारों को पता था कि वे पहले से ही किसी और से शादीशुदा हैं। यह भी माना हुआ तथ्य है कि तलाक मिलने से पहले ही, शिकायतकर्ता (महिला) ने शादी के लिए विज्ञापन दे दिया था। तलाक को अंतिम रूप मिलने से पहले ही उनके बीच शारीरिक संबंध बन गए। 4 साल तक शिकायतकर्ता ने कभी भी आरोपी पर किसी तरह का ज़ोर-ज़बरदस्ती करने का आरोप नहीं लगाया। हमारी राय में यह ऐसा मामला नहीं है, जहां शादी के वादे के कारण आरोपी ने शिकायतकर्ता को धोखा दिया हो। दोनों पक्ष 2017 से 2020 के बीच खुशी-खुशी साथ रहे। उसके बाद उनके रिश्ते में खटास आ गई।"
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस मनमोहन की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया, जिसमें आरोपी की याचिका को यह कहते हुए सुनने से मना किया गया था कि यह सुनवाई योग्य नहीं है, क्योंकि आरोपी ने पहले भी इसी अपराध से संबंधित एक याचिका वापस ले ली है।
कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट का याचिका खारिज करना सही नहीं था, क्योंकि पिछली याचिका बिना किसी ठोस आधार पर विचार किए ही वापस ले ली गई। मौजूदा मामले में जब यह पाया गया कि कोई अपराध बनता ही नहीं है, तो केवल इस आधार पर याचिका को खारिज करना न्यायसंगत नहीं होगा।
कोर्ट ने कहा,
"हम हाईकोर्ट के इस तर्क से भी सहमत नहीं हैं कि याचिका सुनवाई योग्य नहीं थी, खासकर इसलिए क्योंकि मौजूदा मामले में पिछली याचिका बिना किसी ठोस आधार पर चर्चा किए ही वापस ले ली गई। इसके अलावा, जब हमने तथ्यों की जांच की और पाया कि आरोप के अनुसार कोई अपराध बनता ही नहीं है तो हमें लगता है कि केवल 'सुनवाई योग्य न होने' के आधार पर याचिका को खारिज कर देना सही नहीं होगा। हम इस मामले के विशेष तथ्यों को देखते हुए ऐसा कह रहे हैं।"
आरोपी पर IPC की धारा 376(2)(n), 377 और 506 के तहत अपराधों का आरोप लगाया गया। शिकायतकर्ता के अनुसार, उसकी शादी 1998 में हुई और 2012 में वह अपने पति से अलग रहने लगी थी। 2017 में उसका तलाक़ पक्का होने से पहले ही उसने दूसरी शादी के लिए मैट्रिमोनियल वेबसाइट पर अपनी प्रोफ़ाइल बनाई। उसने दावा किया कि अपीलकर्ता ने इसी प्लेटफ़ॉर्म के ज़रिए उससे संपर्क किया और उससे लगातार बातचीत करता रहा, और उसे भरोसा दिलाया कि वह उससे शादी करेगा।
शिकायतकर्ता ने आरोप लगाया कि 17 अक्टूबर, 2017 को अपीलकर्ता उससे मिलने आया, दो-तीन दिन तक उसके साथ रहा और उसकी मर्ज़ी के बिना उसके साथ शारीरिक संबंध बनाए, जिसमें अप्राकृतिक संबंध भी शामिल हैं। उसने यह भी बताया कि दोनों के बीच रिश्ता चलता रहा, वे साथ में घूमने गए, होटलों में रुके और कई सालों तक उनके बीच शारीरिक संबंध बने रहे।
6 फरवरी, 2021 को जब उसने सूरत में अपीलकर्ता से मिलने की कोशिश की और शादी के लिए ज़ोर दिया तो उसने कोई जवाब नहीं दिया और बाद में उससे शादी करने से मना कर दिया। तब उसने एक शिकायत दर्ज कराई, जिसमें आरोप लगाया कि उसने शादी का झूठा वादा करके उसे शारीरिक संबंध बनाने के लिए फुसलाया था।
बॉम्बे हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता की वह याचिका खारिज की, जिसमें उसने मामले की कार्यवाही रद्द करने की मांग की थी। कोर्ट ने यह आधार दिया कि पहले भी एक बार कार्यवाही रद्द करने की याचिका दायर की गई, जिसे वापस ले लिया गया और अब लगाए गए आरोपों पर सुनवाई (ट्रायल) होना ज़रूरी है।
सुप्रीम कोर्ट ने इस बात पर गौर किया कि दोनों पक्षकारों को पता था कि वे पहले से ही शादीशुदा हैं। शिकायतकर्ता ने अपना तलाक़ पक्का होने से पहले ही दूसरी शादी करने की कोशिश शुरू की थी और दोनों पक्षकारों के बीच कई सालों तक शारीरिक संबंध बने रहे थे।
कोर्ट ने यह भी पाया कि 17 अक्टूबर, 2017 को कथित तौर पर ज़बरदस्ती हुई घटना की रिपोर्ट 9 फरवरी, 2021 तक दर्ज नहीं कराई गई, जबकि इस दौरान दोनों पक्षों के बीच लगातार बातचीत होती रही थी।
कोर्ट ने अपने पिछले फ़ैसले महेश दामू खरे बनाम महाराष्ट्र राज्य और अन्य का हवाला दिया। उस फ़ैसले में कोर्ट ने कहा था कि, "शादी करने के इरादे के बिना किए गए झूठे वादे" और "बाद के हालात की वजह से वादा टूट जाने" के बीच फ़र्क करना ज़रूरी है। कोर्ट ने कहा था कि किसी पर आपराधिक दायित्व तभी बनता है, जब शारीरिक संबंध सीधे तौर पर किसी झूठे वादे का नतीजा हों, न कि किसी अन्य वजह से बने हों।
कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया कि इस मामले में शादी का कोई ऐसा झूठा वादा नहीं किया गया, जिसके आधार पर यह कहा जा सके कि शिकायतकर्ता को धोखे में रखा गया। कोर्ट ने मामला रद्द किया और टिप्पणी की कि 2017 से 2020 के बीच दोनों पक्ष साथ-साथ रहे थे। बाद में जाकर उनके रिश्ते में खटास आ गई।
Case Title – Shaileshbhai Govindbhai Makwana v. State of Maharashtra & Anr.

