'POCSO केस का सामना कर रहे माता-पिता को कस्टडी नहीं दी जा सकती': सुप्रीम कोर्ट ने माँ को बच्चों के साथ इंग्लैंड जाने की इजाज़त दी

  • POCSO केस का सामना कर रहे माता-पिता को कस्टडी नहीं दी जा सकती: सुप्रीम कोर्ट ने माँ को बच्चों के साथ इंग्लैंड जाने की इजाज़त दी

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (23 सितंबर) को एक माँ को अपने दो नाबालिग बच्चों के साथ यूनाइटेड किंगडम (UK) जाने की इजाज़त दी। साथ ही कोर्ट ने बच्चों की कस्टडी पिता को देने से इनकार किया, क्योंकि उन पर 'बच्चों को यौन अपराधों से संरक्षण अधिनियम, 2012' (POCSO Act) के तहत मुकदमा चल रहा है। कोर्ट ने कहा कि POCSO Act के तहत मुकदमा झेल रहे माता-पिता में से किसी को भी बच्चों की कस्टडी पाने का हकदार नहीं माना जा सकता।

    कोर्ट ने गौर किया कि 2023 में आक्रामक व्यवहार दिखाने के बाद NIMHANS में जाँच के दौरान बेटे ने पिता द्वारा यौन शोषण की घटनाओं का खुलासा किया। इसके बाद पुलिस में शिकायत दर्ज कराई गई, जिसके परिणामस्वरूप पिता के खिलाफ POCSO FIR दर्ज की गई। तब से चार्जशीट दाखिल की जा चुकी है, जबकि FIR को चुनौती देने वाली पिता की याचिका कलकत्ता हाई कोर्ट में लंबित है।

    कोर्ट ने कहा कि जब पिता के खिलाफ POCSO Act के तहत अपराध के आरोपों में चार्जशीट दाखिल हो चुकी है तो उन्हें बच्चों की कस्टडी देना "पूरी तरह से अनुचित और गैर-वाजिब" होगा।

    कोर्ट ने कहा,

    "किसी भी परिस्थिति में प्रतिवादी-पिता को, जब तक उन पर मुकदमा चल रहा है, बच्चों की कस्टडी पाने का हकदार व्यक्ति नहीं माना जा सकता।"

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा,

    "ऐसा कदम उठाना न केवल जुवेनाइल जस्टिस एक्ट के मुख्य मकसद के खिलाफ होगा, बल्कि इससे कानूनी कार्रवाई भी बेकार हो सकती है। क्योंकि अगर बेटे की कस्टडी पिता (रेस्पॉन्डेंट) को सौंप दी जाती है, तो इस बात की संभावना बहुत कम हो जाएगी कि बेटा उन कानूनी कार्यवाही में खुलकर और निष्पक्ष रूप से अपनी बात कह पाएगा।"

    यह विवाद सितंबर 2011 में दोनों पक्षों की शादी के बाद शुरू हुआ। उनका बेटा अप्रैल 2013 में और बेटी जनवरी 2019 में पैदा हुई।

    मां ने 2018 में अपना ससुराल छोड़ दिया, जब वह चार महीने की गर्भवती थीं। इसके बाद नौकरी की तलाश में वह भारत में अलग-अलग जगहों पर रहीं और आखिरकार यूके की यूनिवर्सिटी ऑफ़ हल में लेक्चरर की नौकरी हासिल की।

    फैमिली कोर्ट और बाद में दिल्ली हाईकोर्ट ने उनके बार-बार जगह बदलने को अस्थिर या "खानाबदोश" जीवनशैली का संकेत माना और आखिरकार दोनों बच्चों की कस्टडी पिता को सौंप दी। इससे नाराज़ होकर पत्नी सुप्रीम कोर्ट पहुंचीं।

    हाईकोर्ट के नज़रिए से असहमति जताते हुए जस्टिस मेहता द्वारा लिखे गए फैसले में बच्चों को अपीलकर्ता-मां के साथ यूके जाने की इजाज़त दी गई। कोर्ट ने जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और सुरक्षा) एक्ट, 2015 की धारा 3 में दिए गए सिद्धांतों, खासकर भागीदारी, बच्चों के सर्वोत्तम हित, सुरक्षा और अधिकारों को न छोड़ने (non-waiver) से जुड़े सिद्धांतों पर ध्यान दिया।

    जुवेनाइल जस्टिस (बच्चों की देखभाल और सुरक्षा) एक्ट, 2015 का ज़िक्र करते हुए, कोर्ट ने बच्चों की भागीदारी, सर्वोत्तम हित, सुरक्षा और अधिकारों को न छोड़ने के सिद्धांतों पर ज़ोर दिया।

    कोर्ट ने कहा कि जब तक आपराधिक मामला लंबित है, तब तक बेटे की गवाही और सुरक्षा को पिता के कस्टडी के दावे से कमतर नहीं आंका जा सकता।

    अपीलों को जनवरी 2027 में दोबारा सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया गया।

    Cause Title: D VERSUS S

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