'एक ही आरोपों पर समानांतर FIRs की अनुमति नहीं': सुप्रीम कोर्ट ने Brahma City/Krrish World प्रोजेक्ट से जुड़ी FIRs एक साथ जोड़ीं
Shahadat
20 May 2026 10:01 AM IST

यह दोहराते हुए कि एक ही लेन-देन या घटना के संबंध में कई FIRs दर्ज नहीं की जा सकतीं, सुप्रीम कोर्ट ने NCR-स्थित रियल एस्टेट डेवलपर अमित कात्याल के खिलाफ हरियाणा में दर्ज एक FIR को दिल्ली की आर्थिक अपराध शाखा (EOW) द्वारा पहले से दर्ज अन्य FIR के साथ जोड़ने का आदेश दिया। ये FIRs "Brahma City/Krrish World" प्रोजेक्ट से जुड़े कथित रियल एस्टेट धोखाधड़ी के मामले में दर्ज की गईं।
जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की खंडपीठ ने T.T. Antony बनाम State of Kerala, (2001) 6 SCC 181 मामले का हवाला देते हुए यह टिप्पणी की,
"...एक ही घटना या लेन-देन के संबंध में, जिससे संज्ञेय अपराध उत्पन्न होते हैं, कई FIRs दर्ज नहीं की जा सकतीं। दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की योजना एक एकल, व्यापक जांच की परिकल्पना करती है, जिसमें जांच एजेंसी को आगे की जांच करने और पूरक रिपोर्ट दाखिल करने की स्वतंत्रता होती है। इसके बजाय, अलग-अलग मंचों पर समानांतर और एक-दूसरे से टकराने वाली जांचों की अनुमति नहीं दी जा सकती।"
कोर्ट ने आगे कहा,
"तथ्यों के एक ही समूह के आधार पर अलग-अलग क्षेत्राधिकारों में कई FIRs और जांचों की अनुमति देना न केवल स्थापित कानूनी स्थिति के विपरीत होगा, बल्कि इससे अनावश्यक रूप से कई मुकदमेबाजी, परस्पर विरोधी निष्कर्ष और याचिकाकर्ताओं को गंभीर नुकसान भी होगा। साथ ही ऐसी 17 FIRs को एक ही स्थान पर समेकित (एक साथ जोड़ना) करने से न्याय के उद्देश्यों की पूर्ति होगी, क्योंकि इससे एक समन्वित, प्रभावी और पूर्ण जांच सुनिश्चित होगी। इसके अलावा, यह याचिकाकर्ताओं के उस अधिकार की भी रक्षा करेगा जिसके तहत वे एक ही कार्यवाही में अपना प्रभावी और सार्थक बचाव प्रस्तुत कर सकें।"
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला याचिकाकर्ता के खिलाफ लगाए गए उन आरोपों से संबंधित था जिनमें धोखाधड़ी, आपराधिक विश्वासघात और धन के गबन की बात कही गई थी। यह धन उन घर खरीदारों से एकत्र किया गया जिन्हें कथित तौर पर रियल एस्टेट प्रोजेक्ट में प्लॉट और फ्लैट देने का वादा किया गया था, लेकिन भारी-भरकम भुगतान करने के बावजूद उन्हें उनका कब्ज़ा नहीं दिया गया।
याचिकाकर्ताओं ने गुरुग्राम के सेक्टर-65 पुलिस स्टेशन में दर्ज FIR को चुनौती दी। उन्होंने यह तर्क दिया कि इसी प्रोजेक्ट और समान आरोपों के संबंध में दिल्ली और हरियाणा में पहले से ही कई FIRs दर्ज की जा चुकी हैं। उन्होंने दलील दी कि अलग-अलग क्षेत्राधिकारों में बार-बार की जाने वाली जांचों से उन्हें गंभीर नुकसान हो रहा है और यह एक प्रकार का उत्पीड़न है।
कोर्ट के समक्ष, याचिकाकर्ताओं ने दिल्ली EOW द्वारा दर्ज की गई FIR पर विशेष रूप से ज़ोर दिया, जिसमें घर खरीदारों की 83 शिकायतों को पहले ही एक साथ जोड़ दिया गया। उस मामले में एक चार्जशीट भी दायर की गई थी और ट्रायल की कार्यवाही अभी चल रही थी।
याचिकाकर्ताओं ने आगे बताया कि 2016 में दिल्ली में दर्ज अन्य FIR में जांच एजेंसी ने खुद यह निष्कर्ष निकाला था कि लेन-देन "स्पष्ट रूप से सिविल प्रकृति का" था और इसमें आपराधिक प्रलोभन या तथ्यों को छिपाने का कोई तत्व नहीं पाया गया।
इस याचिका का विरोध करते हुए हरियाणा राज्य ने तर्क दिया कि आरोपों से एक बड़े पैमाने पर हुए धोखाधड़ी का खुलासा होता है, जिससे कई राज्यों में भोले-भाले घर खरीदार प्रभावित हुए हैं और जिसमें शेल कंपनियों के माध्यम से फंड का हेरफेर शामिल है। राज्य ने कहा कि एक विशेष जांच दल (SIT) का गठन पहले ही किया जा चुका है और पैसे के लेन-देन (money trail) की गहन जांच चल रही है।
हालांकि, दिल्ली पुलिस ने अदालत को सूचित किया कि उसे इस बात पर कोई आपत्ति नहीं है कि यदि जांच को एक साथ मिलाकर (Consolidated) किसी एक ही एजेंसी के माध्यम से किया जाए।
निर्णय
याचिका आंशिक रूप से स्वीकार करते हुए जस्टिस वराले द्वारा लिखे गए फैसले में यह माना गया कि गुरुग्राम में बाद में दर्ज की गई FIR कानूनन सही नहीं थी। हालांकि, अदालत ने याचिकाकर्ता की उस प्रार्थना को खारिज कर दिया जिसमें इस मामले में भविष्य में दर्ज होने वाली FIRs पर रोक लगाने या उन्हें प्रतिबंधित करने का निर्देश मांगा गया।
अदालत ने पाया कि दिल्ली और हरियाणा में दर्ज FIRs में लगाए गए आरोप एक ही मुख्य आरोप के इर्द-गिर्द घूमते हैं: कि घर खरीदारों को इस प्रोजेक्ट में निवेश करने के लिए लुभाया गया, पैसे भी जमा किए गए, लेकिन उन्हें फ्लैटों और प्लॉटों का कब्ज़ा कभी नहीं सौंपा गया।
अदालत ने टिप्पणी की,
"...बाद में दर्ज की गई FIR संख्या 439/2024, जो पुलिस स्टेशन सेक्टर-65, गुरुग्राम, हरियाणा में दर्ज है, उन्हीं आरोपों के आधार पर सामने आई और उसी लेन-देन का हिस्सा है, जो पहले से ही दिल्ली की आर्थिक अपराध शाखा (Economic Offences Wing) में दर्ज FIR संख्या 30/2019 का विषय है। ऐसी परिस्थितियों में समानांतर जांच की अनुमति देना न केवल दंड प्रक्रिया संहिता (CrPC) की मूल भावना के विपरीत होगा, बल्कि इससे याचिकाकर्ताओं के साथ घोर अन्याय भी होगा और कानूनी कार्यवाही की संख्या में अनावश्यक वृद्धि होगी।"
भविष्य में दर्ज होने वाली FIRs पर रोक लगाने की प्रार्थना के संबंध में अदालत ने यह टिप्पणी की:
"इस अदालत के लिए यह न तो उचित है और न ही कानूनन स्वीकार्य कि वह भविष्य में दर्ज होने वाली FIRs के संबंध में किसी भी प्रकार की दंडात्मक कार्रवाई (Coercive Steps) पर पूर्ण रोक लगाने का कोई सामान्य निर्देश (blanket direction) जारी करे। हालांकि, यह स्पष्ट किया जाता है कि यदि उसी लेन-देन के आधार पर भविष्य में कोई ऐसी FIR दर्ज की जाती है, तो याचिकाकर्ताओं के लिए यह खुला रहेगा कि वे कानून के तहत उपलब्ध अन्य कानूनी उपायों का सहारा ले सकें।"
Cause Title: AMIT KATYAL & ANR. VERSUS STATE OF HARYANA & ANR.

