Order XII Rule 6 CPC | आपराधिक मामले में की गई स्वीकारोक्ति का इस्तेमाल सिविल कार्यवाही में किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

11 May 2026 9:46 PM IST

  • Order XII Rule 6 CPC | आपराधिक मामले में की गई स्वीकारोक्ति का इस्तेमाल सिविल कार्यवाही में किया जा सकता है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिविल प्रक्रिया संहिता (CPC) के आदेश XII नियम 6 के तहत स्वीकारोक्ति पर आधारित फैसला, उन स्वीकारोक्तियों पर भी आधारित हो सकता है, जो लिखित दलीलों (Pleadings) के बाहर की गई हों।

    ट्रायल कोर्ट, पहली अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट के एक जैसे फैसलों में दखल देने से इनकार करते हुए जस्टिस जे. बी. पारदीवाला और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने प्रतिवादी (Defendant) की याचिका खारिज की। इस प्रतिवादी को आपराधिक कार्यवाही के दौरान की गई स्वीकारोक्तियों के आधार पर विवादित जगह खाली करने का निर्देश दिया गया; उन स्वीकारोक्तियों में उसने माना था कि वह वादी (Plaintiff) के अधीन केवल एक देखभाल करने वाले (Caretaker) के तौर पर उस संपत्ति पर काबिज था।

    जिस शिकायत के आधार पर FIR दर्ज की गई, उसमें अपीलकर्ता ने स्वीकार किया कि वह प्रतिवादी के स्वामित्व वाली विवादित संपत्ति का देखभाल करने वाला है। इस स्वीकारोक्ति पर भरोसा करते हुए ट्रायल कोर्ट ने अनिवार्य निषेधाज्ञा (Mandatory Injunction) के लिए दायर मुकदमे के पक्ष में फैसला सुनाया और अपीलकर्ता-प्रतिवादी को विवादित संपत्ति खाली करने का निर्देश दिया।

    ट्रायल कोर्ट का यह फैसला हाईकोर्ट तक बरकरार रहा। इससे व्यथित होकर प्रतिवादी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील करते हुए तर्क दिया कि आपराधिक कार्यवाही में उसकी स्वीकारोक्ति CPC के आदेश XII नियम 6 के तहत उसके खिलाफ फैसला सुनाने का आधार नहीं बन सकती।

    याचिका खारिज करते हुए बेंच ने ट्रायल कोर्ट्स के फैसलों को सही ठहराया। बेंच ने कहा कि संहिता (Code) के तहत ऐसा कोई प्रतिबंध नहीं है कि स्वीकारोक्ति पर आधारित फैसला केवल लिखित दलीलों में की गई स्वीकारोक्ति पर ही आधारित हो; बल्कि, कहीं और की गई स्वीकारोक्ति को भी ध्यान में रखा जा सकता है, बशर्ते वे स्पष्ट और असंदिग्ध हों।

    कोर्ट ने कहा,

    "CPC के आदेश XII, नियम 6 के तहत स्वीकारोक्ति के आधार पर फैसला सुनाया जा सकता है, चाहे वह स्वीकारोक्ति लिखित दलीलों में हो या कहीं और। ऐसी स्वीकारोक्ति लिखित भी हो सकती है और मौखिक भी। स्वीकारोक्ति के लिए किसी विशेष रूप या प्रारूप की आवश्यकता नहीं है।"

    अदालत ने उत्तम सिंह दुग्गल एंड कंपनी लिमिटेड बनाम यूनाइटेड बैंक ऑफ इंडिया, (2000) 7 SCC 120 का हवाला देते हुए यह टिप्पणी की,

    “CPC के आदेश XII के नियम 6 का उद्देश्य किसी पक्ष को उस सीमा तक त्वरित न्याय प्राप्त करने में सक्षम बनाना है, जिस सीमा तक वह दूसरे पक्ष की स्वीकारोक्ति के अनुसार, उसका हकदार है। जिस स्वीकारोक्ति के आधार पर निर्णय का दावा किया जा सकता है, वह स्पष्ट और असंदिग्ध होनी चाहिए। ऐसी स्वीकारोक्ति या तो वाद में किए गए संपूर्ण दावे के संबंध में होनी चाहिए, अथवा दावे के किसी ऐसे भाग के संबंध में होनी चाहिए जिसके लिए अलग से डिक्री पारित की जा सके।”

    उपर्युक्त के आधार पर उक्त याचिका खारिज की गई।

    Cause Title: SHEIKH ABEDIN VERSUS IQBAL AHMED & ANR.

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