Order 7 Rule 11 CPC | मूल्यांकन या कोर्ट फीस में कमी के आधार पर वाद-पत्र को बिना सुधार का मौका दिए खारिज नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

22 April 2026 7:39 PM IST

  • Order 7 Rule 11 CPC | मूल्यांकन या कोर्ट फीस में कमी के आधार पर वाद-पत्र को बिना सुधार का मौका दिए खारिज नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में यह फैसला दिया कि किसी वाद के मूल्यांकन में कमी या कोर्ट फीस के भुगतान में कमी के आधार पर किसी वादी को CPC के आदेश 7 नियम 11 के तहत अपने आप ही खारिज (Non-Suited) नहीं किया जा सकता। चूंकि ये दोनों कमियां सुधारी जा सकने वाली हैं, इसलिए वादी को सुधार का मौका दिया जाना चाहिए। साथ ही वाद को तभी खारिज किया जाना चाहिए, जब वह इस मौके का पालन न करे।

    कोर्ट ने कहा,

    "आदेश VII नियम 11(b) या (c) के तहत किसी वाद-पत्र खारिज करना, केवल कम मूल्यांकन या कोर्ट फीस में कमी पाए जाने पर अपने आप नहीं हो जाता; बल्कि, यह कोर्ट द्वारा दिए गए सुधार के मौके का पालन न करने पर निर्भर करता है।"

    जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की खंडपीठ ने यह फैसला सुनाते हुए कहा:

    "संहिता (Code) के आदेश VII नियम 11 के खंड (b) और (c) को सीधे और एक साथ पढ़ने से यह पूरी तरह स्पष्ट हो जाता है कि उसमें बताए गए आधारों पर किसी वाद-पत्र को खारिज करने की शक्ति का प्रयोग, पहली बार में वादी को सुधार का मौका दिए बिना नहीं किया जाना चाहिए। कानूनी योजना में दो चरणों वाली प्रक्रिया का प्रावधान है।

    पहला, कोर्ट को यह राय बनानी होगी कि मांगी गई राहत का मूल्यांकन कम किया गया या चुकाई गई कोर्ट फीस अपर्याप्त है। दूसरा, इस निर्धारण के बाद कोर्ट का यह दायित्व है कि वह वादी से अपने द्वारा तय किए गए समय के भीतर मूल्यांकन को ठीक करने और/या आवश्यक कोर्ट फीस जमा करने की मांग करे। वादी द्वारा निर्धारित समय के भीतर इस निर्देश का पालन करने में विफल रहने पर ही वाद-पत्र को खारिज किए जाने के परिणाम सामने आ सकते हैं।"

    कोर्ट वादी (Appellant) द्वारा मद्रास हाईकोर्ट के आदेश को दी गई चुनौती पर सुनवाई कर रहा था। उस आदेश के तहत प्रतिवादियों द्वारा दायर पुनरीक्षण याचिका (Revision Petition) स्वीकार की गई थी और ट्रायल कोर्ट का आदेश रद्द किया गया था, जिसमें CPC के आदेश 7 नियम 11 के तहत दायर आवेदन खारिज किया गया। इसके परिणामस्वरूप, वादी का वाद-पत्र खारिज हो गया।

    यह वाद-पत्र, अन्य बातों के साथ-साथ एक अनिवार्य निषेधाज्ञा (Mandatory Injunction) की मांग करते हुए दायर किया गया, जिसमें प्रतिवादियों को पक्षों के बीच अंतिम रूप दिए गए 'समझौता ज्ञापन' (Memorandum of Agreement - MoA) को निष्पादित करने का निर्देश देने की मांग की गई। इस MoA के तहत संपत्ति को 8 अलग-अलग विक्रय-पत्रों (Sale Deeds) के माध्यम से (नामांकित व्यक्तियों के रूप में कार्य करने वाली विशेष प्रयोजन संस्थाओं - SPVs के ज़रिए) 58.6 करोड़ रुपये के प्रतिफल पर प्रतिवादियों को बेचा जाना था। हालांकि 8 अलग-अलग बिक्री विलेख (Sale Deeds) निष्पादित किए गए, लेकिन प्रतिवादियों ने जाहिर तौर पर MoA (समझौता ज्ञापन) निष्पादित नहीं किया या उसके तहत अपने आपसी दायित्वों को पूरा नहीं किया।

    प्रतिवादियों ने CPC के आदेश 7 नियम 11 के तहत वाद-पत्र (Plaint) खारिज करने के लिए आवेदन किया, यह दावा करते हुए कि इसमें कार्रवाई का कोई कारण (Cause of Action) नहीं बताया गया, मांगी गई राहत का मूल्यांकन कम किया गया और वाद-पत्र पर अपर्याप्त स्टांप शुल्क लगा था। हालांकि, ट्रायल कोर्ट ने अपीलकर्ता के पक्ष में फैसला सुनाया, यह देखते हुए कि उठाए गए मुद्दे पूर्ण सुनवाई (Full Trial) के हकदार थे। प्रतिवादियों ने हाईकोर्ट में पुनर्विचार याचिका (Revision Petition) दायर की, जिसे स्वीकार कर लिया गया और वाद-पत्र खारिज किया गया।

    अन्य बातों के अलावा, हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की कि MoA एक लागू करने योग्य अनुबंध नहीं था। एक बार जब बिक्री विलेख निष्पादित हो गए तो किसी भी पूर्व या सहायक व्यवस्था को लागू करने के लिए कार्रवाई का कोई स्वतंत्र कारण शेष नहीं रहा। इसने यह भी टिप्पणी की कि वाद-पत्र मूल रूप से 53-55 करोड़ रुपये की वसूली का दावा था। इस प्रकार, 'एड वैलोरेम' (मूल्य-आधारित) कोर्ट फीस का भुगतान किया जाना चाहिए था, लेकिन अपीलकर्ता ने ऐसा नहीं किया।

    इससे व्यथित होकर अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया। उपलब्ध सामग्री पर विचार करने के बाद सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि वाद-पत्र में स्पष्ट रूप से निम्नलिखित बातें सामने आई थीं: (a) एक बातचीत से तय हुई वाणिज्यिक व्यवस्था का अस्तित्व, (b) बिक्री विलेखों के निष्पादन के माध्यम से उसका आंशिक कार्यान्वयन, (c) आपसी दायित्वों का बने रहना, और (d) प्रतिवादियों द्वारा कथित तौर पर उन दायित्वों का उल्लंघन।

    इस प्रकार, कार्रवाई का एक सुस्पष्ट कारण मौजूद था, जिसके लिए वाद-पत्र को संक्षेप में खारिज करने के बजाय पूर्ण सुनवाई की आवश्यकता थी।

    इसके अतिरिक्त, अदालत ने यह फैसला सुनाया कि हाईकोर्ट ने इस बात की जांच करने में त्रुटि की कि क्या MoA लागू करने योग्य था। यह निष्कर्ष निकालने में भी गलती की कि कार्रवाई का कोई कारण शेष नहीं रहा। यह कार्य एक 'लघु-सुनवाई' (Mini-trial) आयोजित करने के समान था, जिसकी कानून में अनुमति नहीं है।

    अदालत ने कहा,

    "इस चरण पर अदालत से यह अपेक्षा की जाती है कि वह वाद-पत्र में किए गए कथनों को सत्य मान ले और यह निर्धारित करे कि क्या वे मुकदमा करने का अधिकार दर्शाते हैं; अदालत के लिए यह उचित नहीं है कि वह उन कथनों की सत्यता की जांच करे या प्रतिपक्ष के बचाव (Defence) के आधार पर उनका मूल्यांकन करे।"

    गलत मूल्यांकन और उचित कोर्ट फीस का भुगतान न करने के आधार पर वाद-पत्र खारिज करना भी गलत पाया गया। कोर्ट ने कहा कि हाई कोर्ट ने वाद के मूल्यांकन और कोर्ट फीस में कमी को तो नोट किया, लेकिन यह तय नहीं किया कि सही मूल्यांकन और कोर्ट फीस कितनी होनी चाहिए थी।

    आगे कहा गया,

    "ऐसी किसी निष्कर्ष के अभाव में मूल्यांकन को ठीक करने का कोई भी निर्देश, यदि दिया भी गया हो तो वादी द्वारा उसका सार्थक रूप से पालन नहीं किया जा सकता। इस तरह का निर्धारण दर्ज करने में विफलता, विवादित आदेश को और भी दोषपूर्ण बना देती है।"

    यह भी नोट किया गया कि मूल्यांकन या कोर्ट फीस से संबंधित त्रुटि एक ऐसी कमी है जिसे सुधारा जा सकता है। ऐसी त्रुटियों को सुधारने का अवसर देना किसी मुक़दमेबाज़ को ऐसी कमी के कारण मुक़दमे से वंचित होने से बचाने का काम करता है, जिस कमी को दूर किया जा सकता हो।

    "मूल्यांकन या कोर्ट फीस में कमी अपने आप में वाद को शुरुआती चरण में ही अस्वीकार्य नहीं बना देती है। यह एक ऐसी कमी है, जिसे सुधारा जा सकता है और कानून स्पष्ट रूप से ऐसे सुधार के लिए एक प्रक्रिया प्रदान करता है। हाईकोर्ट ने इस कानूनी आवश्यकता की अनदेखी करते हुए प्रभावी रूप से अपीलकर्ता को इस कमी को सुधारने का अवसर देने से मना किया, जिससे 'आदेश VII नियम 11' के खंड (b) और (c) के मूल उद्देश्य की ही हार हुई।"

    अंततः, कोर्ट ने हाईकोर्ट का आदेश रद्द किया और ट्रायल कोर्ट को निर्देश दिया कि वह अपीलकर्ता को मूल्यांकन को ठीक करने और आवश्यक कोर्ट फीस का भुगतान करने का अवसर प्रदान करे।

    Case Title: M/s. MARG LIMITED VERSUS SUSHIL LALWANI & ORS., SLP (C) No. 25132 OF 2025

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