O. 23 R. 3 CPC | समझौता लिखित रूप में और पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए, न्यायालय के समक्ष केवल बयान पर्याप्त नहीं : सुप्रीम कोर्ट

  • O. 23 R. 3 CPC | समझौता लिखित रूप में और पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए, न्यायालय के समक्ष केवल बयान पर्याप्त नहीं : सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि एग्रीमेंट डीड को तब तक मान्यता नहीं दी जा सकती, जब तक कि इसे लिखित रूप में न लाया जाए और पक्षों द्वारा हस्ताक्षरित न किया जाए।

    न्यायालय ने कहा कि न्यायालय के समक्ष केवल बयान दर्ज किए जाने से समझौता या समझौता नहीं माना जा सकता।

    न्यायालय ने कहा,

    "किसी मुकदमे में वैध समझौता करने के लिए लिखित रूप में वैध समझौता या समझौता होना चाहिए और पक्षकारों द्वारा हस्ताक्षरित होना चाहिए, जिसे न्यायालय की संतुष्टि के लिए साबित करना आवश्यक होगा।"

    न्यायालय ने आगे कहा,

    "वर्तमान मामले में न तो समझौता विलेख लिखित रूप में हुआ है और न ही न्यायालय द्वारा इसे दर्ज किया गया। न्यायालय के समक्ष ऐसे समझौते के बारे में पक्षों द्वारा केवल बयान दिए जाने से सीपीसी के आदेश XXIII नियम 3 की आवश्यकताओं को पूरा नहीं किया जा सकता। इसलिए समझौता डिक्री वैध नहीं है।"

    सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के आदेश 23 नियम 3 के अनुसार, मुकदमे के पक्षकारों के बीच वैध समझौते पर पहुंचने या लिखित रूप में समझौता करने पर न्यायालय द्वारा समझौता डिक्री पारित की जा सकती है। नियम यह भी कहता है कि समझौते को तब तक मान्यता नहीं दी जा सकती, जब तक कि मुकदमे के पक्षकारों द्वारा उस पर हस्ताक्षर न किए जाएं।

    दूसरे शब्दों में, यदि आदेश 23 नियम 3 सीपीसी के तहत निर्धारित अनिवार्य शर्तों का पालन नहीं किया गया तो समझौता दर्ज नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की खंडपीठ ने कहा,

    “जब समझौता दर्ज किया जाना है और डिक्री पारित की जानी है तो संहिता के आदेश XXIII के नियम 3 के अनुसार समझौते की शर्तों को लिखित रूप में कम किया जाना चाहिए और पक्षों द्वारा हस्ताक्षरित किया जाना चाहिए।”

    वर्तमान मामले में प्रतिवादी/वादी ने न्यायालय के समक्ष पक्षों के बीच दर्ज पहले के समझौते के आधार पर अपीलकर्ताओं/प्रतिवादी के खिलाफ कब्जे और अस्थायी निषेधाज्ञा के लिए नया मुकदमा दायर किया। वादी ने तर्क दिया कि पिछले मुकदमे में पक्षकारों के बीच हुए समझौते के अनुसार वे मुकदमे की भूमि के आधे हिस्से के मालिक हैं।

    हालांकि, अपीलकर्ता/प्रतिवादी ने वादी के तर्क का विरोध किया और तर्क दिया कि पिछले मुकदमे में पक्षों के बीच किए गए समझौते को मान्यता नहीं दी जा सकती, क्योंकि सीपीसी के आदेश 23 नियम 3 का अनुपालन न करने के कारण न्यायालय द्वारा कोई समझौता डिक्री पारित नहीं की गई।

    ट्रायल कोर्ट ने पक्षकारों के बीच विधिवत हस्ताक्षरित लिखित समझौते के अस्तित्व और उत्पादन की अनुपस्थिति में मुकदमा खारिज कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने यह भी माना कि जिला कोर्ट के समक्ष दिए गए बयानों को समझौता या समझौता नहीं माना जा सकता।

    हालांकि, प्रथम अपीलीय न्यायालय ने ट्रायल कोर्ट के निष्कर्षों को उलट दिया, जिसे बाद में हाईकोर्ट ने मंजूरी दे दी।

    इसके बाद अपीलकर्ता/प्रतिवादी ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाया।

    ट्रायल कोर्ट द्वारा किए गए निष्कर्षों को बहाल करते हुए जस्टिस विक्रम नाथ द्वारा लिखित निर्णय में कहा गया कि मुकदमे के पक्षों द्वारा विधिवत हस्ताक्षरित लिखित समझौते के अस्तित्व और प्रस्तुतीकरण के बिना समझौता करना कानून के तहत अस्वीकार्य है।

    न्यायालय ने कहा,

    “वर्तमान मामले में समझौते या समझौते की शर्तों को शामिल करने वाला कोई लिखित दस्तावेज नहीं है। लिखित में किसी भी दस्तावेज की अनुपस्थिति में पक्षकारों द्वारा उस पर हस्ताक्षर करने का सवाल ही नहीं उठता। यहां तक ​​कि न्यायालय की संतुष्टि के लिए ऐसे दस्तावेज को वैध साबित करने का सवाल भी नहीं उठता। इस प्रकार, यह नहीं कहा जा सकता है कि दिनांक 20.08.1984 का आदेश (पहले का मुकदमा) आदेश XXIII नियम 3 सीपीसी के तहत एक आदेश था।”

    तदनुसार, अपील को अनुमति दी गई। साथ ही विवादित निर्णय रद्द कर दिया गया।

    केस टाइटल: अमरो देवी और अन्य बनाम जुल्फी राम (मृत) थ्र.एलआरएस. और अन्य।

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