NCDRC के तीसरे सदस्य का रेफरेंस का जवाब देने के बजाय अपील पर फ़ैसला सुनाना ज़रूरी नहीं कि ग़ैर-क़ानूनी हो: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

31 Aug 2026 8:12 PM IST

  • NCDRC के तीसरे सदस्य का रेफरेंस का जवाब देने के बजाय अपील पर फ़ैसला सुनाना ज़रूरी नहीं कि ग़ैर-क़ानूनी हो: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) की बेंच के सदस्यों के बीच मतभेद होने पर तीसरे या "रेफरी" सदस्य की भूमिका की सीमाएं स्पष्ट की। कोर्ट ने कहा कि हालाँकि आम तौर पर रेफरी सदस्य को केवल रेफर किए गए सवालों का जवाब देना चाहिए और मामले को मूल बेंच को वापस भेजना चाहिए, लेकिन किसी असाधारण मामले में अपील पर ख़ुद फ़ैसला करना सही हो सकता है।

    जब रेफर करने वाली बेंच कंज्यूमर प्रोटेक्शन एक्ट, 2019 की धारा 58(3) के तहत मतभेद के सटीक बिंदुओं को बताने के बजाय, शिकायत की जड़ तक जाने वाले और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से जुड़े व्यापक सवाल तैयार करती है तो तीसरे सदस्य का उन सवालों का जवाब देने और साथ ही अपील के गुण-दोष के आधार पर फ़ैसला करने का निर्णय, ऐसी परिस्थितियों में ज़रूरी नहीं कि संविधान के अनुच्छेद 227 के तहत हस्तक्षेप की मांग करने वाली कोई ग़ैर-क़ानूनी कार्रवाई हो। इसलिए कोर्ट ने मामले को इलाहाबाद हाई कोर्ट में वापस भेज दिया ताकि अनुच्छेद 227 के लागू होने पर गुण-दोष के आधार पर नए सिरे से फ़ैसला किया जा सके।

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस शील नागू की बेंच इलाहाबाद हाईकोर्ट के एक सिंगल जज के फ़ैसले के ख़िलाफ़ अपील पर सुनवाई कर रही थी। सिंगल जज ने प्रतिवादी (प्रतिवादी 1/R1) द्वारा दायर अनुच्छेद 227 के तहत आवेदन को मंज़ूरी दी और नेशनल कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (NCDRC) के तीसरे सदस्य का आदेश रद्द किया, क्योंकि वह आदेश उन्हें भेजे गए रेफरेंस के दायरे से बाहर था।

    अपीलकर्ताओं ने 2016 में स्टेट कंज्यूमर डिस्प्यूट्स रिड्रेसल कमीशन (SCDRC) के समक्ष शिकायत दर्ज कराई, जिसमें 95 लाख रुपये (15% ब्याज के साथ) का मुआवज़ा दिया गया। इस आदेश के ख़िलाफ़ R1 की अपील पर NCDRC की दो-सदस्यीय बेंच ने सुनवाई की, जिसके सदस्यों की राय अलग-अलग थी। जहाँ पीठासीन सदस्य ने अपील को मंज़ूरी दी और शिकायत ख़ारिज की, वहीं दूसरे सदस्य ने SCDRC के आदेश में बदलाव करते हुए मुआवज़े की राशि घटाकर 93 लाख रुपये (12% ब्याज के साथ) की।

    इसके बाद CP Act की धारा 58(3) के तहत एक रेफरेंस भेजा गया, जिसमें रेफर करने वाली बेंच ने मामले से संबंधित तीसरे सदस्य की राय के लिए पाँच सवाल तैयार किए। तीसरे सदस्य ने साथी सदस्य की राय से सहमत होते हुए सवालों के जवाब दिए और खुद ही अपील पर फैसला सुनाते हुए मुआवज़े की रकम घटाकर 93 लाख रुपये (ब्याज और कानूनी खर्च सहित) की।

    इससे नाराज़ होकर R1 ने आर्टिकल 227 के तहत हाई कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। उनका तर्क था कि तीसरे सदस्य को सिर्फ़ रेफर किए गए सवालों के जवाब देने चाहिए और मामले को रेफर करने वाली बेंच को वापस भेजना चाहिए, न कि खुद अपील पर फैसला करना चाहिए था। सिंगल जज ने इस तर्क को मानते हुए कहा कि तीसरे सदस्य का आदेश "रेफर करने वाले सदस्य को मिली शक्तियों से ज़्यादा था।"

    उन्होंने उस आदेश को रद्द कर दिया और निर्देश दिया कि मामले की सुनवाई किसी तीसरे सदस्य द्वारा नए सिरे से की जाए। यह सदस्य NCDRC की डिवीज़न बेंच को मामला वापस भेजने से पहले सिर्फ़ रेफर किए गए सवालों के जवाब देने तक ही खुद को सीमित रखेगा।

    मुद्दे को तय करते हुए बेंच ने कहा,

    "इस अपील में फ़ैसले के लिए मुख्य सवाल यह है कि क्या तीसरे सदस्य का अपील पर खुद फ़ैसला करना सही था (जबकि वह रेफर करने वाली बेंच के साथी सदस्य की राय से सहमत थे), या उन्हें रेफर किए गए सवालों के जवाब दर्ज करने के बाद मामला रेफर करने वाली बेंच को वापस भेज देना चाहिए ताकि वह बहुमत की राय के आधार पर उचित आदेश पारित कर सके?"

    बेंच ने यह भी गौर किया कि सिंगल जज ने 'केशो नाथ खुराना बनाम भारत संघ व अन्य', 'इनकम टैक्स कमिश्नर, दिल्ली बनाम बंसी धर एंड संस' और हाईकोर्ट की फुल बेंच के 'श्रीराम इंडस्ट्रियल एंटरप्राइजेज लिमिटेड बनाम भारत संघ व अन्य' के फ़ैसलों का हवाला दिया।

    पुराने फ़ैसलों पर चर्चा करते हुए बेंच ने स्थापित स्थिति का सारांश इस प्रकार दिया:

    "आमतौर पर रेफरी बेंच को रेफर किए गए सवालों के जवाब उस बेंच को वापस भेजने चाहिए, जिसने रेफरेंस भेजा था, ताकि वह बेंच उन जवाबों को ध्यान में रखते हुए फ़ैसले के लिए उठे मुद्दों पर निर्णय ले सके। हालांकि, जैसा कि 'सलिल सबलोक' (ऊपर उल्लिखित) मामले में कहा गया, रेफरी बेंच सामान्य समझ (कॉमन सेंस) का इस्तेमाल करते हुए किसी ऐसे सहायक सवाल का जवाब दे सकती है जो तार्किक और अनिवार्य रूप से उठता हो।"

    बेंच ने यह भी कहा कि 'कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर, 1973' की धारा 392 या 'भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023' की धारा 433 के विपरीत, CPC में ऐसा कोई प्रावधान नहीं है। इसलिए CPC के तहत आने वाले विवादों में रेफरेंस (संदर्भ) पर फ़ैसला पुराने फ़ैसलों (Precedents) से मार्गदर्शन लेकर किया जाना चाहिए। जहां तक CP Act का सवाल है, कोर्ट ने धारा 58(3) पर ध्यान दिया। इसमें कहा गया कि अगर किसी बेंच के सदस्यों की राय अलग-अलग हो तो "वे उन बिंदुओं को बताएंगे, जिन पर उनकी राय अलग है, और मामले को प्रेसिडेंट (अध्यक्ष) के पास भेजेंगे। प्रेसिडेंट या तो खुद उन बिंदुओं पर सुनवाई करेंगे या मामले को एक या ज़्यादा दूसरे सदस्यों के पास सुनवाई के लिए भेजेंगे। उन बिंदुओं पर फ़ैसला उन सदस्यों की बहुमत की राय के आधार पर किया जाएगा जिन्होंने मामले की सुनवाई की है, जिसमें वे सदस्य भी शामिल हैं जिन्होंने पहले सुनवाई की थी।"

    धारा 58(3) को देखने के बाद कोर्ट ने पाया कि पहली नज़र में ऐसा लगता है कि तीसरे सदस्य ने अपील पर खुद फ़ैसला करके अपने अधिकार क्षेत्र (Jurisdiction) से बाहर जाकर काम किया है। हालाँकि, बेंच ने एक अहम फ़र्क पहचाना: इस मामले में रेफर करने वाली बेंच ने कानून के मुताबिक मतभेद के खास बिंदुओं को नहीं बताया, बल्कि पांच ऐसे सवाल तैयार किए, जिनके लिए "मेरिट के आधार पर बताए गए और खंडन किए गए तथ्यों पर विचार करने की ज़रूरत थी।"

    इसलिए कोर्ट ने कहा,

    "हमारी राय में रेफरेंस के दायरे को लेकर की गई आपत्ति तकनीकी है। हालांकि, CP Act के तहत कानूनी नियम यह कहता है कि तीसरे सदस्य को खुद को केवल मतभेद के बिंदुओं तक ही सीमित रखना चाहिए, लेकिन यह मामला अलग स्थिति में है। रेफर करने वाले आदेश में मतभेद के बिंदुओं को साफ तौर पर नहीं बताया गया; इसके बजाय ऐसे सवाल तैयार किए गए, जो शिकायत की जड़ तक जाते थे और रिकॉर्ड पर मौजूद सबूतों से अलग नहीं किए जा सकते थे। तीसरे सदस्य को, ज़रूरी तौर पर रेफर करने वाली बेंच के सामने पेश की गई सभी सामग्रियों और विरोधी तर्कों का जायज़ा लेना पड़ा।"

    बेंच ने माना कि रेफर किए गए सवालों का जवाब देते हुए और साथ ही बहुमत की राय के आधार पर अपील का फ़ैसला करते हुए तीसरे सदस्य ने "सामान्य समझ वाला तरीका" (common sense approach) अपनाया। सलिल सभलोक मामले में इसे खास मामलों में सही माना गया, और तीसरे सदस्य के इस तरीके को "इतने समय बाद" गलत नहीं ठहराया जाना चाहिए।

    ऊपर बताई गई बातों को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने यह नतीजा निकाला कि तीसरे सदस्य का रेफरेंस को सिर्फ़ जवाबों के साथ वापस न करना और अपील पर खुद फ़ैसला लेना, "ऐसी कोई गैर-कानूनी हरकत नहीं थी जिसके लिए संविधान के आर्टिकल 227 के तहत अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए दखल देने की ज़रूरत पड़ती।"

    हालांकि, सुप्रीम कोर्ट ने माना कि सिंगल जज के नज़रिए को 'केशो नाथ खुराना' मामले में समर्थन मिला था, लेकिन CP एक्ट की धारा 58(3) और जिस तरह से रेफरेंस तैयार किया गया, उसे देखते हुए कोर्ट ने कहा, "हमें विवादित आदेश के पैराग्राफ 21 में दर्ज नतीजों को सही ठहराने का कोई कारण नहीं दिखता।"

    कोर्ट ने यह भी गौर किया कि सिंगल जज ने तीसरे सदस्य के जवाबों की सच्चाई या मेरिट की जांच नहीं की, बल्कि उनका दखल सिर्फ़ प्रक्रिया से जुड़ी आपत्तियों तक ही सीमित था।

    ऐसे हालात में बेंच ने कहा,

    "अब यह ज़रूरी है कि हाई कोर्ट पहले प्रतिवादी (First Respondent) की आर्टिकल 227 के तहत दी गई अर्ज़ी पर मेरिट के आधार पर कोई फ़ैसला करे।"

    ऊपर बताई गई बातों को ध्यान में रखते हुए अपील मंज़ूर की गई और आर्टिकल 227 वाली अर्ज़ी को मेरिट के आधार पर नए सिरे से फ़ैसले के लिए हाई कोर्ट वापस भेज दिया गया। साथ ही तथ्यों और कानून से जुड़े सभी मुद्दों को खुला छोड़ दिया गया ताकि पार्टियां उन्हें रोस्टर बेंच के सामने उठा सकें। पहले ही बीत चुके समय को ध्यान में रखते हुए कोर्ट ने उम्मीद जताई कि अर्ज़ी पर जल्द फ़ैसला लिया जाएगा और यह भी साफ़ किया कि जब तक हाई कोर्ट अपना अंतिम फ़ैसला नहीं सुना देता, तब तक NCDRC आगे कोई कार्रवाई नहीं करेगा। इस तरह विवादित आदेश रद्द कर दिया गया।

    Case: Askari Hussain & Ors v Dinesh Kumar & Ors

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