'सिर्फ़ टेलीफ़ोन रिकॉर्ड से नाजायज़ रिश्ते साबित नहीं हो सकते': सुप्रीम कोर्ट ने पति की हत्या के मामले में आरोपियों को बरी करने का फ़ैसला बरकरार रखा

Shahadat

14 July 2026 10:37 AM IST

  • सिर्फ़ टेलीफ़ोन रिकॉर्ड से नाजायज़ रिश्ते साबित नहीं हो सकते: सुप्रीम कोर्ट ने पति की हत्या के मामले में आरोपियों को बरी करने का फ़ैसला बरकरार रखा

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि सिर्फ़ टेलीफ़ोन रिकॉर्ड पेश करने से हत्या की वजह बने नाजायज़ रिश्ते का ठोस सबूत नहीं माना जा सकता। कोर्ट ने 2007 में अपने पति की हत्या की आरोपी महिला, उसके कथित प्रेमी और एक अन्य सह-आरोपी को बरी करने के फ़ैसले को बरकरार रखा।

    कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष हालात से जुड़े सबूतों (circumstantial evidence) के आधार पर सज़ा सुनाने के लिए ज़रूरी हालात की अटूट कड़ी साबित करने में नाकाम रहा। कोर्ट ने पाया कि जांच में "गंभीर कमियां" थीं, जिसमें बरामद सामान को सील न करना भी शामिल है।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने महाराष्ट्र सरकार की उन अपीलों को खारिज किया, जो बॉम्बे हाईकोर्ट के 2010 के फ़ैसले के खिलाफ़ दायर की गईं। उस फ़ैसले में मोनिका किरण सूर्यवंशी (आरोपी नंबर 1), प्रकाश नागराज पाटिल (A2) और ज्ञानेश्वर गंगाराम महाले (A3) को भारतीय दंड संहिता की धारा 302 (हत्या) और 120B (आपराधिक साज़िश) के आरोपों से बरी कर दिया गया था।

    अन्य कमियों के अलावा, कोर्ट ने बरामद सामान को सील न करने की बात को अभियोजन पक्ष के मामले के लिए बहुत नुकसानदेह माना।

    कोर्ट ने कहा,

    "...हमें हाईकोर्ट के अच्छी तरह से तर्क दिए गए फ़ैसले में कोई गलती नहीं मिली। हत्या और साज़िश के लिए आरोपियों के खिलाफ़ अभियोजन पक्ष का मामला, जो पूरी तरह से हालात से जुड़े सबूतों पर टिका था, उसमें अहम कमियां हैं। खास तौर पर मकसद साबित न कर पाना, 'आखिरी बार देखा' (last seen) वाले गवाह का अविश्वसनीय होना, टेलीफ़ोन रिकॉर्ड में विरोधाभास, घटनास्थल पर बरामद सामान को सील न करने की बड़ी चूक, और उस बेडरूम में खून का बिल्कुल न मिलना जहां कथित तौर पर बेरहमी से हत्या हुई थी। हालात की कड़ी टूट गई है, और अपराध का अनुमान पूरी तरह से साबित नहीं होता है।"

    यह मामला 2007 में ICICI बैंक के कर्मचारी किरण सूर्यवंशी की हत्या से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष का आरोप था कि उनकी पत्नी (आरोपी नंबर 1) का अपने पड़ोसी (आरोपी नंबर 2) के साथ नाजायज़ रिश्ता था और उसने उसके और उसके दोस्त (आरोपी नंबर 3) के साथ मिलकर मृतक की हत्या की साज़िश रची थी। अभियोजन पक्ष का दावा कि आरोपी नंबर 1 ने अपने पति को नींद की दवा दी और फिर सिल-बट्टे (grinding stone) से उनका सिर कुचल दिया। प्रकाश और ज्ञानेश्वर को कथित तौर पर मोटरसाइकिल पर पीड़ित का शव ठिकाने लगाने के लिए ले जाते हुए पकड़ा गया।

    ट्रायल कोर्ट ने आरोपियों को दोषी ठहराया और उम्रकैद की सज़ा सुनाई; हालांकि, बॉम्बे हाईकोर्ट ने इस सज़ा को रद्द कर दिया। कोर्ट ने अभियोजन पक्ष के मामले में कमियों और जांच में खामियों का ज़िक्र किया, खासकर ज़ब्त की गई चीज़ों को फोरेंसिक जांच के लिए सील न करने की बात कही।

    इसके बाद हाईकोर्ट के फ़ैसले को चुनौती देते हुए राज्य सरकार सुप्रीम कोर्ट पहुंची।

    Cause Title: STATE OF MAHARASHTRA VERSUS MONIKA KIRAN SURYAWANSHI & ORS.

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