बलात्कार पीड़िता की पहचान उजागर न करने के आदेश का पालन नहीं हो रहा: सुप्रीम कोर्ट ने लंबित मामलों में कड़ाई से पालन करने का निर्देश दिया
Shahadat
25 March 2026 7:39 PM IST

अदालती रिकॉर्ड में बलात्कार पीड़िता की पहचान उजागर होने पर चिंता जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को निर्देश दिया कि वे सभी लंबित मामलों में IPC की धारा 228-A के तहत वैधानिक रोक का कड़ाई से पालन सुनिश्चित करें। इन मामलों में वे मामले भी शामिल हैं जो 'निपुण सक्सेना बनाम भारत संघ' मामले में 2018 के फैसले से पहले शुरू हुए थे। कोर्ट ने टिप्पणी की कि पीड़िता की पहचान उजागर न करने का आदेश कानून में लंबे समय से चली आ रही स्थिति है, फिर भी इसका लगातार पालन नहीं किया गया।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"अंत में, हम निर्देश देते हैं कि इस फैसले की एक प्रति सभी हाई कोर्ट के रजिस्ट्रार जनरल को भेजी जाए ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि 'निपुण सक्सेना बनाम भारत संघ' मामले में इस कोर्ट के फैसले से पहले के सभी मामलों में—जिसमें पीड़िता की पहचान उजागर न करने का आदेश दिया गया—और जो अभी भी लंबित हैं, IPC की धारा 228-A के तहत रोक का कड़ाई से पालन किया जाए। यह कानून में लंबे समय से चली आ रही स्थिति है, लेकिन इसका पालन नहीं किया गया।"
ये टिप्पणियां एक ऐसे मामले में आईं, जिसमें सुप्रीम कोर्ट ने एक नाबालिग लड़की के साथ बलात्कार के आरोपी व्यक्ति की बरी होने की सज़ा रद्द की। कोर्ट ने माना कि गवाहों के बयानों में मामूली विसंगतियां अभियोजन पक्ष के मामले को पूरी तरह से खारिज करने का आधार नहीं हो सकतीं, जब तक कि मामले का मूल आधार (Core) बरकरार रहता है।
कोर्ट ने कहा कि गवाहों के बयानों में मामूली विसंगतियां अभियोजन पक्ष के मामले को पूरी तरह से खारिज करने का कारण नहीं होनी चाहिए, जब तक कि अभियोजन पक्ष के मामले का मूल आधार प्रभावित न हो रहा हो।
जस्टिस संजय करोल और जस्टिस एन. कोटिश्वर सिंह की खंडपीठ ने टिप्पणी की,
"...यह भली-भांति स्वीकार किया गया कि मानवीय बोध, याददाश्त और वर्णन अपूर्ण होते हैं। ऐसे में कोर्ट ने लगातार यह माना है कि गवाहों की गवाही में मामूली विसंगतियां या छोटी-मोटी कमियां अपने आप में सबूतों को अविश्वसनीय नहीं बनातीं...सच्चे गवाह भी याददाश्त की सामान्य चूक या बोध में अंतर के कारण विवरण में भिन्न हो सकते हैं। मुख्य प्रश्न यह है कि क्या ये विसंगतियां अभियोजन पक्ष के वर्णन की रीढ़ (Backbone) को गंभीर रूप से प्रभावित करती हैं...जब चूक या विरोधाभास उन महत्वपूर्ण तथ्यों से संबंधित होते हैं, जो अभियोजन पक्ष के संस्करण की नींव बनाते हैं तो वे महत्वपूर्ण हो जाते हैं और उचित संदेह पैदा कर सकते हैं।"
अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि पीड़िता/शिकायतकर्ता सुबह लगभग 07:30 बजे अपनी माँ के कहने पर एक रिश्तेदार के घर से 'लस्सी' लाने के लिए घर से निकली थी; वह घर उसके घर से 8 किलोमीटर दूर है। जब वह 'लस्सी' लेकर लौट रही थी तो आरोपी-प्रतिवादी ने उसके साथ बलात्कार किया और वह सुबह 09:30 बजे तक घर लौट आई।
ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को IPC की धारा 376 के तहत दोषी ठहराया और उसे दस साल के कठोर कारावास की सज़ा सुनाई। हाईकोर्ट ने इस फ़ैसले में दखल देते हुए अभियोजन पक्ष के मामले पर संदेह जताया, जिसका आधार यह था कि पीड़िता/शिकायतकर्ता का दो घंटे के भीतर 16 किलोमीटर की यात्रा करने का बयान उन्हें बहुत ही अविश्वसनीय लगा।
हाईकोर्ट के बरी करने के फ़ैसले के ख़िलाफ़ राज्य सरकार ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
बरी करने का फ़ैसला रद्द करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फ़ैसले में यह टिप्पणी की गई कि जब अभियोजन पक्ष के मामले का मूल आधार (Core) जस का तस बना रहा—यानी, आरोपी द्वारा उसके साथ बलात्कार किए जाने के बारे में पीड़िता की गवाही को मेडिकल सबूतों से भी पुष्टि मिली—तो हाईकोर्ट के लिए यह अनुचित था कि वह केवल इस आधार पर अभियोजन पक्ष के पूरे मामले को ही ख़ारिज कर दे कि पीड़िता का दो घंटे में 16 किलोमीटर की यात्रा करना अविश्वसनीय है।
अदालत ने टिप्पणी की,
“भले ही यह सच हो कि 16 किलोमीटर की दूरी दो घंटे में तय करना मुमकिन नहीं था। फिर भी यह एक निर्विवाद सच्चाई है कि यौन हमले की घटना को नकारा नहीं जा सकता। किसी खास समय सीमा के भीतर अपराध होने की बात साबित करने के लिए अदालत गणितीय सटीकता की तलाश नहीं करती। बहस के लिए अगर कथित समय सीमा को एक घंटा बढ़ा भी दिया जाए, तब भी अपराध होने की संभावना पर कोई आंच नहीं आती।”
अदालत ने कहा कि हाईकोर्ट ने विशेषज्ञ मेडिकल सबूतों को खारिज करके गलती की, खासकर तब जब “विशेषज्ञ सबूत पीड़िता के बयान की पूरी तरह से पुष्टि करते हैं कि उसके साथ यौन हमला हुआ था।”
अदालत ने टिप्पणी की,
“यह बात अच्छी तरह से स्थापित है कि मेडिकल सबूत विशेषज्ञ की राय के रूप में होते हैं और उनकी प्रकृति सहायक होती है। यह भी उतनी ही अच्छी तरह से स्थापित है कि जब मेडिकल सबूत अन्य विश्वसनीय सबूतों, खासकर चश्मदीद गवाहों के सबूतों के विपरीत होते हैं तो ऐसी स्थिति में उन्हें एक तरफ रखा जा सकता है या नज़रअंदाज़ किया जा सकता है। हालांकि, यहां मामला ऐसा नहीं है। इस बात को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता कि विशेषज्ञ सबूत पीड़िता के बयान की पूरी तरह से पुष्टि करते हैं कि उसके साथ यौन हमला हुआ था। अपने बयान में भले ही बात दोहराई जा रही हो, यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि उसने आरोपी की पहचान की और इस कृत्य का आरोप उसी पर लगाया। कानून की प्रक्रिया के तहत इस बात को न तो चुनौती दी गई है और न ही इस पर कोई सवाल उठाया गया है। तो फिर सवाल यह उठता है कि, समय की कुछ कथित असंभावनाओं के आधार पर क्या हम अन्य विश्वसनीय सबूतों को नज़रअंदाज़ कर सकते हैं? हमें नहीं लगता। ऐसा रुख अपनाना पूरी तरह से कानून के विपरीत होगा।”
उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए अपील स्वीकार की गई, बरी करने का फैसला रद्द किया गया और प्रतिवादी को ट्रायल कोर्ट द्वारा सुनाई गई सज़ा काटने के लिए आत्मसमर्पण करने का निर्देश दिया गया।
Cause Title: STATE OF HIMACHAL PRADESH Versus HUKUM CHAND ALIAS MONU

