सिर्फ़ लंबे समय तक कब्ज़ा 'एडवर्स पज़ेशन' साबित नहीं करता, इसके लिए 'विरोधी इरादा' ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

10 Sept 2026 8:19 PM IST

  • सिर्फ़ लंबे समय तक कब्ज़ा एडवर्स पज़ेशन साबित नहीं करता, इसके लिए विरोधी इरादा ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने गुरुवार (10.09.2026) को कहा कि किसी प्रॉपर्टी पर सिर्फ़ लंबे समय तक और बिना रुकावट कब्ज़ा होना ही 'एडवर्स पज़ेशन' (प्रतिकूल कब्ज़ा) का दावा साबित करने के लिए काफ़ी नहीं है। इसके लिए यह साबित करना ज़रूरी है कि कब्ज़ा किस बिंदु पर असली मालिक के खिलाफ़ (विरोधी) हो गया।

    ऐसा फैसला सुनाते हुए कोर्ट ने यह भी कहा कि रेवेन्यू रिकॉर्ड में कब्ज़े को 'गैर-मरूसी बिला लगान बवजह धर्म-अर्थ' (यानी धार्मिक उद्देश्यों के लिए बिना किराया दिए कब्ज़ा) के तौर पर दर्ज करना प्रॉपर्टी को पूरी तरह से धार्मिक काम के लिए समर्पित (डेडिकेशन) साबित करने के लिए काफ़ी नहीं है।

    जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के फैसले के खिलाफ़ दायर अपील पर सुनवाई करते हुए यह आदेश दिया। हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट और पहली अपीलीय अदालत के एक जैसे फैसलों को पलट दिया और रेस्पॉन्डेंट्स (प्रतिवादियों) के पक्ष में मालिकाना हक और कब्ज़े के लिए फैसला सुनाया था।

    यह मामला खेती की ज़मीन से जुड़ा है। इसकी शुरुआत 1981 में दायर एक सिविल मुकदमे से हुई। वादी (Plaintiffs) ने 1965 के रजिस्टर्ड सेल डीड और कब्ज़ा सौंपने के ब्योरे पर भरोसा किया। इसके विपरीत, प्रतिवादियों (Defendants) का तर्क था कि प्रॉपर्टी बहुत पहले ही डेरा के पक्ष में 'धर्म-अर्थ' के लिए समर्पित कर दी गई। साथ ही रेवेन्यू रिकॉर्ड में लगातार डेरा के महंत को 'गैर-मरूसी बिला लगान बवजह धर्म-अर्थ' के तौर पर कब्ज़े में दिखाया गया।

    यह भी तर्क दिया गया कि प्रॉपर्टी लगातार अलग-अलग महंतों के कब्ज़े में रही है, इसलिए डेरा के पास 'एडवर्स पज़ेशन' (प्रतिकूल कब्ज़े) के आधार पर भी मालिकाना हक है।

    इसके बाद ट्रायल कोर्ट ने फैसला सुनाया कि प्रॉपर्टी डेरा को समर्पित थी और महंतों के ज़रिए कब्ज़ा बना हुआ था। पहली अपीलीय अदालत ने भी इस फैसले को सही ठहराया और कहा कि कब्ज़ा सौंपने के साथ ही समर्पण (Dedication) पूरा हो गया। इसके लिए किसी अलग रजिस्टर्ड दस्तावेज़ की ज़रूरत नहीं थी। हालांकि, पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने इन फैसलों को पलट दिया।

    हाईकोर्ट ने कहा कि रेवेन्यू एंट्रीज़ से न तो पूरी तरह समर्पण और न ही 'एडवर्स पज़ेशन' साबित होता है, खासकर तब जब बाद के महंतों के कब्ज़े की निरंतरता या मालिकाना हक के लिए कोई विरोधी दावा दिखाने वाला सबूत न हो।

    हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता (डेरा) सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।

    सुप्रीम कोर्ट के सामने अपील करने वालों ने तर्क दिया कि हाईकोर्ट से गलती हुई। उन्होंने कहा कि 1945-46 से रेवेन्यू रिकॉर्ड में कब्ज़े को लगातार 'धर्म-अर्थ' (धार्मिक और धर्मार्थ) उद्देश्यों के लिए बताया गया, जो समर्पण (Dedication) का सबूत है। साथ ही डेरा का चार दशकों से ज़्यादा समय से लगातार कब्ज़ा 'एडवर्स पज़ेशन' (Adverse Possession) के ज़रिए मालिकाना हक में बदल गया।

    यह भी तर्क दिया गया कि 1965 की सेल डीड (बिक्री विलेख) से पूरी विवादित संपत्ति का मालिकाना हक नहीं मिल सकता, क्योंकि दोनों बेचने वालों के पास कुल मिलाकर सिर्फ़ आधा हिस्सा था, और बाकी आधा हिस्सा किसी और का था (जो बेचने वालों में शामिल नहीं था)।

    इसके विपरीत, प्रतिवादियों (वादी) ने तर्क दिया कि ट्रायल कोर्ट और पहली अपीलीय अदालत ने रेवेन्यू रिकॉर्ड की एंट्रीज़ को मालिकाना हक का पक्का सबूत मानकर और संपत्ति को 'धर्म-अर्थ' बताने मात्र से समर्पण को पूरा मानकर गलती की थी। यह तर्क दिया गया कि 'एडवर्स पज़ेशन' का दावा तब तक नहीं माना जा सकता, जब तक कि यह साफ़ तौर पर न बताया जाए कि कब्ज़ा कब और कैसे 'हॉस्टाइल' (विपरीत/अधिकार-विरोधी) हुआ। साथ ही हाईकोर्ट ने पहली अपीलीय अदालत के तौर पर सबूतों का मूल्यांकन नहीं किया, बल्कि कानून के एक अहम सवाल को तय करने के बाद कानूनी सिद्धांतों के गलत इस्तेमाल को सुधारा है।

    सुप्रीम कोर्ट ने फिर से कहा कि रेवेन्यू रिकॉर्ड सिर्फ़ कब्ज़े के लिए अहम हैं और इनसे मालिकाना हक न तो मिलता है और न ही खत्म होता है।

    बेंच ने कहा,

    "रेवेन्यू रिकॉर्ड, जिनमें जमाबंदी और खसरा गिरदावरी शामिल हैं, कब्ज़े की प्रकृति और निरंतरता तय करने के लिए निस्संदेह अहम सबूत हैं। इनसे न तो मालिकाना हक बनता है और न ही खत्म होता है, और न ही ये अकेले मालिकाना हक का पक्का सबूत हो सकते हैं। इस कोर्ट का लगातार यही नज़रिया रहा है कि रेवेन्यू रिकॉर्ड में एंट्रीज़ मुख्य रूप से वित्तीय उद्देश्यों के लिए रखी जाती हैं और कब्ज़े के सबूत के तौर पर स्वीकार्य हैं, लेकिन इनसे अचल संपत्ति का मालिकाना हक नहीं मिलता। मालिकाना हक का सवाल आखिरकार ठोस सबूतों के आधार पर तय किया जाना चाहिए जो मालिकाना हक के स्रोत को साबित करते हों।"

    समर्पण (dedication) के सवाल पर कोर्ट ने कहा कि हालांकि हमेशा एक औपचारिक दस्तावेज़ की ज़रूरत नहीं होती, लेकिन जो पक्ष समर्पण का दावा कर रहा है, उसी पर यह साबित करने की ज़िम्मेदारी होती है कि मालिक का इरादा हमेशा के लिए मालिकाना हक छोड़ने का था और यह इरादा साफ़ और स्पष्ट था।

    इसलिए कोर्ट ने कहा,

    "किसी महंत का लंबे समय तक कब्ज़ा होना या रेवेन्यू रिकॉर्ड में धर्म-अर्थ के मकसद से खेती का ज़िक्र होना, अपने आप में इस बात का पक्का सबूत नहीं माना जा सकता कि मालिकाना हक हमेशा के लिए ट्रांसफर हो गया।"

    यह साफ़ करते हुए कि इस तरह की रेवेन्यू एंट्री न तो पूरी तरह से 'समर्पण' का पक्का सबूत है और न ही इजाज़त से किए गए कब्ज़े का पक्का सबूत। साथ ही इसे सभी सबूतों के साथ मिलाकर देखा जाना चाहिए, बेंच ने हाईकोर्ट के फैसले को सही ठहराया।

    इस प्रकार, इसने प्रतिवादियों (वादीगण) के पक्ष में मुकदमा तय किया।

    Case: Bhag Singh (dead) through Mahant Kashmir Singh v Basant Kaur (dead) through LRs & Ors.

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