2003 में ग्रामीण टेलीफ़ोन एक्सचेंज से CDR न मिलना कोई बड़ी बात नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने अपहरण मामले में सज़ा सही ठहराई

Shahadat

4 Jun 2026 1:16 PM IST

  • 2003 में ग्रामीण टेलीफ़ोन एक्सचेंज से CDR न मिलना कोई बड़ी बात नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने अपहरण मामले में सज़ा सही ठहराई

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि अगर ठोस मौखिक सबूत मज़बूत, भरोसेमंद और पूरी तरह से बेदाग हों तो कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) पेश न करना अभियोजन पक्ष के मामले के लिए घातक नहीं होगा।

    जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने दो लोगों की सज़ा को सही ठहराया। इन पर 2003 में दर्ज FIR के सिलसिले में IPC की धारा 346A के तहत फिरौती के लिए अपहरण करने का आरोप था।

    अपील करने वाले आरोपियों ने दलील दी कि फिरौती की मांग से जुड़ा CDR पेश न करना अभियोजन पक्ष के मामले के लिए घातक साबित होगा। उन्होंने दावा किया कि धारा 65-B का सर्टिफ़िकेट न होना, फिरौती की मांग के अभियोजन पक्ष के दावे के लिए घातक है। यह तर्क दिया गया कि फ़ोन कॉल के बारे में कोई भी खास जानकारी दस्तावेज़ों में दर्ज नहीं की गई।

    इस तर्क को खारिज करते हुए जस्टिस वराले द्वारा लिखे गए फ़ैसले में कहा गया कि जब फिरौती की मांग की पुष्टि करने वाले दूसरे सबूत मौजूद हों तो सिर्फ़ CDR पेश न करना—और वह भी 2003 के दौर का—सज़ा को पलटने का आधार नहीं हो सकता।

    कोर्ट ने पाया कि PW-1 (पीड़ित के पिता) और PW-2 व 3 की गवाहियां, जिनमें लैंडलाइन फ़ोन पर फिरौती की मांग की बात कही गई, लगातार एक जैसी, भरोसेमंद और बेदाग रहीं; इसलिए CDR की गैर-मौजूदगी में भी अपराध साबित करने के लिए ये गवाहियां काफ़ी होंगी।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    “PW-1 ने अपनी क्रॉस एग्जामिनेशन में साफ़ तौर पर बयान दिया कि FIR दर्ज कराने और तलाशी लेने के बाद शाम 7:00 बजे घर लौटने पर उनकी बेटियों ने उन्हें बताया कि उसी दिन सुबह करीब 11:00 बजे उनके घर के चालू टेलीफ़ोन पर 5 लाख 25 हज़ार रुपये की फिरौती मांगने वाला एक फ़ोन आया। इस बात की पूरी पुष्टि PW-2 और PW-3 के बयानों से होती है, जो उस समय घर में मौजूद थे और जिन्होंने 5 लाख रुपये की मांग के बारे में गवाही दी। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि PW-7 (जांच अधिकारी) ने बयान दिया कि PW-1 ने उन्हें 07.08.2003 को इस 5 लाख रुपये की फिरौती वाली फ़ोन कॉल के बारे में जानकारी दी थी। इसके बाद जांच अधिकारी ने इस खास फ़ोन कॉल के संबंध में संतोष कौर (पीड़िता की मां) का बयान दर्ज किया।”

    अदालत ने आगे कहा,

    “2003 में किसी ग्रामीण टेलीफ़ोन एक्सचेंज से CDR (कॉल डिटेल रिकॉर्ड) न मिल पाने के कारण आपराधिक न्याय प्रणाली को ठप नहीं होने दिया जा सकता, जबकि ठोस मौखिक सबूत मज़बूत, विश्वसनीय और पूरी तरह से निर्विवाद हैं। इसलिए हाईकोर्ट ने सही निष्कर्ष निकाला कि फिरौती की मांग बिना किसी उचित संदेह के साबित हो गई।”

    तदनुसार, अपील खारिज की गई।

    Cause Title: HARJINDRA SINGH ETC. VERSUS THE STATE OF U.P.

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