अनुशासनात्मक कार्रवाई के भय से जमानत देने में हिचक रहे हैं ट्रायल कोर्ट जज: सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता

Amir Ahmad

5 Jan 2026 6:36 PM IST

  • अनुशासनात्मक कार्रवाई के भय से जमानत देने में हिचक रहे हैं ट्रायल कोर्ट जज: सुप्रीम कोर्ट ने जताई चिंता

    सुप्रीम कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के जजों द्वारा जमानत देने में बढ़ती हिचक पर गंभीर चिंता जताते हुए कहा कि अनुशासनात्मक कार्रवाई के भय के कारण वे अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करने से कतराते हैं। कोर्ट ने चेतावनी दी कि ऐसा माहौल न्यायिक स्वतंत्रता को कमजोर करता है। इसी कारण हाईकोर्ट व सुप्रीम कोर्ट जमानत याचिकाओं से भरे पड़े हैं।

    जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की खंडपीठ ने कहा कि केवल संदेह के आधार पर या विवेकाधिकार के कथित गलत प्रयोग को लेकर न्यायिक अधिकारियों के खिलाफ विभागीय कार्रवाई शुरू किया जाना जिला स्तर के जजों की इस हिचक का प्रमुख कारण है।

    खंडपीठ ने कहा,

    “केवल संदेह के आधार पर विभागीय कार्यवाही शुरू किया जाना ट्रायल कोर्ट के जजों द्वारा जमानत देने में हिचक का एक बड़ा कारण है। ऐसा नहीं होना चाहिए कि प्रशासनिक कार्रवाई के भय से कानून के स्थापित सिद्धांतों के भीतर आने वाले योग्य मामलों में भी जमानत से इनकार कर दिया जाए। यही कारण है कि हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट जमानत याचिकाओं से भरे हुए हैं।”

    सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी मध्य प्रदेश के न्यायिक अधिकारी की बर्खास्तगी रद्द करते हुए की, जिन्हें भ्रष्टाचार और एमपी आबकारी अधिनियम के तहत जमानत मामलों में दोहरा मापदंड अपनाने के आरोपों पर पद से हटा दिया गया।

    अपने सहमतिपूर्ण निर्णय में जस्टिस पारदीवाला ने कहा कि निरंतर प्रशासनिक या अनुशासनात्मक कार्रवाई के डर से ट्रायल कोर्ट के जजों को उन मामलों में भी जमानत देने से नहीं रुकना चाहिए, जो कानून के स्थापित सिद्धांतों के अनुरूप हों। उन्होंने कहा कि डर के इस माहौल के कारण ही हाईकोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में जमानत याचिकाओं की संख्या बढ़ रही है।

    जस्टिस पारदीवाला ने जोर देते हुए कहा कि जिला न्यायपालिका के पास न्याय व्यवस्था के संचालन के लिए अत्यंत महत्वपूर्ण शक्तियां होती हैं। यदि उनकी स्वायत्तता प्रभावित होती है। न्यायिक कर्तव्यों पर भय हावी हो जाता है तो लोकतंत्र और विधि का शासन दोनों ही प्रभावित होते हैं।

    उन्होंने कहा,

    “समय के साथ ट्रायल कोर्ट के जजों में जमानत जैसे मामलों में अपने विवेकाधिकार का प्रयोग करने से बचने की प्रवृत्ति देखने को मिली है। जब हाईकोर्ट के कारण उनकी स्वायत्तता प्रभावित होती है और भय न्यायिक कर्तव्यों पर हावी हो जाता है तो लोकतंत्र और कानून का शासन प्रभावित होता है। लोकतंत्र के सुचारु संचालन के लिए यह आवश्यक है कि न्यायपालिका बिना भय और पक्षपात के न्याय प्रदान कर सके।”

    सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि केवल कोई गलत आदेश या जमानत देने में विवेकाधिकार का कथित गलत प्रयोग अपने आप में और बिना किसी अन्य गंभीर कारण के किसी न्यायिक अधिकारी के खिलाफ विभागीय कार्रवाई का आधार नहीं बन सकता। कोर्ट ने हाईकोर्ट्स से आग्रह किया कि वे जिला न्यायपालिका पर अपने पर्यवेक्षणीय अधिकार का प्रयोग करते समय यह सुनिश्चित करें कि केवल किसी आदेश को त्रुटिपूर्ण मान लेने के आधार पर न्यायिक अधिकारियों को विभागीय जांच की पीड़ा से न गुजरना पड़े।

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