क्या वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन वसीयतकर्ता की मौत के 3 साल के अंदर न करने पर समय-सीमा खत्म हो जाती है? सुप्रीम कोर्ट ने दिया जवाब

Shahadat

17 July 2026 10:14 AM IST

  • क्या वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन वसीयतकर्ता की मौत के 3 साल के अंदर न करने पर समय-सीमा खत्म हो जाती है? सुप्रीम कोर्ट ने दिया जवाब

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन वसीयतकर्ता की मौत के तीन साल के अंदर ही करना ज़रूरी नहीं है। कोर्ट ने कहा कि प्रोबेट के लिए आवेदन करने का अधिकार तब मिलता है जब ऐसा करना ज़रूरी हो जाता है, यानी जब वसीयत से बनी स्थिति के खिलाफ कोई कदम उठाया जाता है।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस विपुल एम पंचोली की बेंच ने कहा,

    "इसलिए आवेदन करने का अधिकार उस तारीख से मिलता है, जब आवेदन करना ज़रूरी हो जाता है। ज़ाहिर है, यह वसीयतकर्ता की मौत के तीन साल के अंदर होना ज़रूरी नहीं है।"

    बेंच ने ट्रायल कोर्ट और झारखंड हाईकोर्ट के उन फैसलों को रद्द किया, जिन्होंने प्रोबेट आवेदन को सिर्फ़ इसलिए खारिज कर दिया था क्योंकि इसे वसीयतकर्ता की मौत के तीन साल बाद दायर किया गया।

    यह मामला 15 अप्रैल 1995 की वसीयत के प्रोबेट के आवेदन से जुड़ा है, जिसे श्रीलाल सिंघानिया ने बनाया और जिनका 7 जून 1995 को निधन हो गया। यह आवेदन वसीयत में बताए गए एग्जीक्यूटर भूदेव प्रसाद सिंह ने 31 अगस्त 2005 को दायर किया था, जो वसीयतकर्ता की मौत के एक दशक से भी ज़्यादा समय बाद था।

    आपत्ति करने वाले प्रतिवादियों ने सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के ऑर्डर VII नियम 11 के तहत आवेदन दायर किया और तर्क दिया कि प्रोबेट आवेदन समय-सीमा (लिमिटेशन) के कारण खारिज होने योग्य है। ट्रायल कोर्ट ने इस तर्क को स्वीकार कर लिया और इंडियन सक्सेशन एक्ट, 1925 की धारा 222 और 276 के तहत प्रोबेट आवेदन खारिज किया।

    झारखंड हाईकोर्ट ने सिविल कोर्ट का फैसला सही ठहराते हुए अपील खारिज की, जिसके बाद सुप्रीम कोर्ट में यह अपील दायर की गई।

    अपील मंज़ूरी करते हुए जस्टिस करोल द्वारा लिखे गए फैसले में उस तर्क को खारिज कर दिया गया कि वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन वसीयतकर्ता की मौत के तीन साल के अंदर ही दायर किया जाना चाहिए।

    कोर्ट ने कहा कि चूंकि इंडियन सक्सेशन एक्ट में वसीयत के प्रोबेट के लिए आवेदन दायर करने की कोई समय-सीमा तय नहीं है, इसलिए लिमिटेशन एक्ट, 1963 के आर्टिकल 163 के तहत तय तीन साल की समय-सीमा लागू होगी। हालांकि, इसकी गिनती उस तारीख से की जाएगी जब दूसरी पार्टी ने वसीयत (Will) से तय स्थिति के खिलाफ कोई कदम उठाया हो।

    कानून को लागू करते हुए कोर्ट ने कहा:

    “आवेदन करने की ज़रूरत उस तारीख से शुरू होगी, जब प्रतिवादियों ने वसीयत से तय स्थिति के खिलाफ कदम उठाए, यानी 8 अगस्त 2005 को वसीयत करने वाले की पत्नी लक्ष्मी देवी द्वारा 'जनरल पावर ऑफ़ अटॉर्नी' (General Power of Attorney) निष्पादित करना। इस नज़रिए से, अपीलकर्ता संजय शर्मा उर्फ ​​संजय भारद्वाज के पक्ष में एग्जीक्यूटर मिस्टर भूदेव प्रसाद सिंह द्वारा वसीयत के प्रोबेट (probate) के लिए दिया गया आवेदन समय-सीमा के भीतर माना जाता है क्योंकि इसे 31 अगस्त 2005 को दायर किया गया।”

    इसमें P. Kumarakurubaran v. P. Narayanan, 2025 LiveLaw (SC) 509 मामले का हवाला दिया गया, जिसमें यह तय किया गया कि जब समय-सीमा (limitation) का सवाल विवादित तथ्यों से जुड़ा हो तो ऐसे मुद्दों का फैसला Order VII Rule 11 CPC के चरण में नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने समय-सीमा की अवधि को लेकर विवाद होने के बावजूद मुकदमे को सरसरी तौर पर खारिज करके गलती की, क्योंकि यह तथ्य और कानून का मिला-जुला सवाल है।

    कोर्ट ने यह फैसला सुनाया,

    “Order VII Rule 11 और समय-सीमा के सवाल, दोनों ही मामलों में निचली अदालतों के फैसलों और आदेशों को रद्द करना होगा। देवघर जिला अदालत द्वारा 31 जुलाई 2012 को पारित आदेश और झारखंड हाईकोर्ट द्वारा 28 अप्रैल 2022 को पारित फैसले को रद्द किया जाता है। कानून के मामले में स्पष्ट गलती होने के कारण अपील स्वीकार की जाती है। मामले को संबंधित सिविल कोर्ट में कानून के अनुसार आगे बढ़ने के लिए बहाल किया जाता है।”

    Cause title: SANJAY SHARMA @ SANJAY BHARDWAJ VERSUS KRISHNADHAN KHAWARE AND ORS.

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