क्या बंटे हुए फ़ैसले के बाद आपराधिक अपील की सुनवाई करने वाले तीसरे जज पिछली बेंच की राय मानने के लिए बाध्य हैं? सुप्रीम कोर्ट ने मामला बड़ी बेंच को भेजा
Shahadat
11 Jun 2026 8:17 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने 'सज्जन सिंह बनाम मध्य प्रदेश राज्य (1999) 1 SCC 315' मामले में अपने पहले के फ़ैसले की सही होने पर संदेह जताते हुए एक अहम सवाल बड़ी बेंच को भेजा है। यह सवाल 'कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर, 1973' की धारा 392 के तहत आपराधिक अपील की सुनवाई करने वाले तीसरे जज की शक्तियों से जुड़ा है।
कोर्ट ने बड़ी बेंच को यह सवाल भेजा है कि क्या 'कोड ऑफ़ क्रिमिनल प्रोसीजर, 1973' की धारा 392 के तहत आपराधिक अपील की सुनवाई करने वाला तीसरा जज उन निष्कर्षों को पलट सकता है, जिन पर डिवीज़न बेंच के दो जजों ने मामले में मतभेद सुलझाते समय सर्वसम्मति से सहमति जताई थी?
CrPC की धारा 392 के अनुसार, अगर किसी आपराधिक अपील की सुनवाई कर रही डिवीज़न बेंच के दो जज नतीजे पर सहमत नहीं होते हैं तो मामला तीसरे जज को भेजा जाएगा।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने कहा कि 'सज्जन सिंह (1999)' मामले के फ़ैसले पर फिर से विचार करने की ज़रूरत हो सकती है। उस फ़ैसले में कहा गया कि तीसरा जज पूरी अपील की स्वतंत्र रूप से जांच कर सकता है और वह मूल डिवीज़न बेंच के सर्वसम्मत निष्कर्षों से भी बंधा नहीं है।
यह मामला उन अपीलों से जुड़ा है, जिनमें इलाहाबाद हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को चुनौती दी गई, जिसमें 1991 के हत्या के मामले में तीन भाइयों अनिल, अजय और अतुल रस्तोगी को बरी कर दिया गया था।
ट्रायल कोर्ट ने इन भाइयों को भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302/149 और 148 के तहत दोषी ठहराया और उम्रकैद की सज़ा सुनाई। जब उनकी अपील इलाहाबाद हाईकोर्ट की डिवीज़न बेंच के सामने आई तो दोनों जज इस बात पर सहमत थे कि अनिल और अजय की दोषसिद्धि (कनविक्शन) बरकरार रखी जानी चाहिए। हालांकि, अतुल की दोषसिद्धि पर उनकी राय अलग-अलग थी। जस्टिस भंवर सिंह अतुल को बरी करने के पक्ष में थे, जबकि जस्टिस देवी प्रसाद सिंह का मानना था कि तीनों अपीलकर्ता दोषी हैं।
इसके बाद मामला CrPC की धारा 392 के तहत तीसरे जज को भेजा गया। तीसरे जज ने न केवल अतुल को बरी करने पर सहमति जताई, बल्कि अनिल और अजय के ख़िलाफ़ पहले के निष्कर्षों को भी पलट दिया और उन्हें भी बरी कर दिया। इसके बाद शिकायतकर्ता और उत्तर प्रदेश राज्य ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। सुप्रीम कोर्ट ने CrPC की धारा 392 के दायरे से जुड़े तीन कानूनी सवाल तय किए। इनमें यह सवाल भी शामिल था कि क्या कोई तीसरा जज डिवीज़न बेंच के दोनों जजों के सर्वसम्मत नतीजों से अलग राय रख सकता है, और क्या ऐसे जज को, अगर वह सहमत नहीं है, तो मामले को बड़ी बेंच के पास भेजना चाहिए।
कानूनी ढांचे की जांच करते हुए कोर्ट ने पुराने क्रिमिनल प्रोसीजर कोड, 1898 की धारा 429 और 1973 के कोड की धारा 392 के बीच एक अहम अंतर पाया। जहां पुराना कानून "मामले" को दूसरे जज के सामने रखने की बात करता था, वहीं धारा 392 "अपील" और बाद में "उस अपील" की बात करती है।
बेंच ने कहा कि धारा 392 में "उस अपील" शब्द का मतलब उसी खास अपील से है, जिसमें राय का अंतर पैदा हुआ। कोर्ट ने देखा कि जब कई दोषी मिलकर संयुक्त अपील (कम्पोजिट अपील) दायर करते हैं तो हर दोषी की चुनौती असल में एक अलग अपील ही रहती है, भले ही उन्हें प्रक्रिया के तौर पर एक साथ मिला दिया गया हो।
कोर्ट के मुताबिक, चूंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट के दो जजों ने अनिल और अजय की अपीलें सर्वसम्मति से खारिज की थीं, इसलिए उनके मामले में राय का कोई अंतर नहीं था। नतीजतन, सिर्फ़ अतुल की अपील ही तीसरे जज के सामने रखी जानी चाहिए। कोर्ट ने तर्क दिया कि सिर्फ़ इसलिए कि दोषियों ने संयुक्त अपील दायर की थी, किसी तीसरे जज को सर्वसम्मति से तय किए गए मुद्दों को फिर से खोलने की इजाज़त देने से बेतुके और भेदभावपूर्ण नतीजे निकल सकते हैं।
बेंच ने देखा कि सज्जन सिंह मामले में अपनाई गई व्याख्या के तहत कोई तीसरा जज उन पक्षों से जुड़े सर्वसम्मत बरी होने या दोषी ठहराए जाने के फैसलों को पलट सकता है, जिनके मामले में कोई असहमति नहीं थी, सिर्फ़ इसलिए कि किसी दूसरे अपीलकर्ता के मामले में राय का अंतर पैदा हुआ था। कोर्ट ने कहा कि ऐसे नतीजों के बारे में पहले के फैसले में शायद नहीं सोचा गया।
सज्जन सिंह मामले के फैसले से "सम्मानपूर्वक असहमति" जताते हुए कोर्ट ने यह सवाल एक बड़ी बेंच के पास भेज दिया कि क्या वह फैसला सही कानून तय करता है। यह बड़ी बेंच चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) द्वारा गठित की जाएगी। बेंच ने धारा 392 के तहत तीसरे जज की शक्तियों के दायरे से जुड़े मुख्य सवालों पर अपने जवाब तब तक के लिए सुरक्षित रख लिए जब तक कि बड़ी बेंच इस मुद्दे पर फैसला न कर ले।
Case Title: Dr. Rakesh Kumar Gupta v. State of Uttar Pradesh & Ors. and connected matter

