'जांच अधिकारी को सबूत नहीं बनाने चाहिए': गवाहों को 'सेट अप' किए जाने का पता चलने पर सुप्रीम कोर्ट ने बरी करने का फैसला बरकरार रखा

  • जांच अधिकारी को सबूत नहीं बनाने चाहिए: गवाहों को सेट अप किए जाने का पता चलने पर सुप्रीम कोर्ट ने बरी करने का फैसला बरकरार रखा

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जांच अधिकारी का काम सबूत इकट्ठा करना है, न कि उन्हें बनाना। कोर्ट ने एक महिला को दो लोगों की हत्या के मामले में बरी किया, क्योंकि यह पाया गया कि जांच एजेंसी ने सबूत बनाने के लिए गवाहों को "सेट अप" किया था और यह नहीं बता पाई कि जांच के दौरान उनके बयान क्यों दर्ज किए गए।

    जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस विजय बिश्नोई की बेंच ने इस मामले की सुनवाई की। अभियोजन पक्ष ने एक टैक्सी ड्राइवर और होटल के कर्मचारी के बयानों के आधार पर आरोपी का अपराध साबित करने की कोशिश की थी। लेकिन जांच में यह पाया गया कि ये गवाह बनाए गए; न तो यह बताया गया कि उनके बयान क्यों, कब और किन हालात में दर्ज किए गए, और न ही उन गवाहों के पास आरोपी के खिलाफ कोई ऐसा सबूत था जिसके कारण वे पुलिस के पास जाते।

    यह मामला 2011 में हिमाचल प्रदेश के डिउर में एक महिला (D-1) और उसके बेटे (D-2) की उनके घर पर हुई हत्या से जुड़ा है। आरोपी महिला, D-1 की सौतेली बेटी और D-2 की सौतेली बहन है।

    अभियोजन पक्ष का आरोप है कि घटना की रात आरोपी चंबा से डिउर गई और हत्याओं के लिए वही जिम्मेदार है। उनका मामला मुख्य रूप से PW-4 (एक टैक्सी ड्राइवर, जिसने कथित तौर पर आरोपी को पहुंचाया) और PW-18 (एक होटल कर्मचारी, जिसने कथित तौर पर उसे चंबा के एक होटल में ठहरते देखा था) के बयानों पर आधारित है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, कथित घटना की रात आरोपी ने टैक्सी ड्राइवर की मदद से चंबा और डिउर (घटना स्थल) के बीच यात्रा की थी। डिउर से चंबा लौटने के बाद वह एक होटल में रुकी, जहां होटल कर्मचारी ने उसके हाथ पर खून बहता हुआ घाव देखा था।

    इन सब बातों से अभियोजन पक्ष घटनाओं की एक ऐसी कड़ी बनाना चाहता है, जिससे यह साबित हो सके कि आरोपी ने ही अपराध किया। अभियोजन पक्ष ने आरोपी को अपराध से जोड़ने के लिए चाबियों और एक मोबाइल फ़ोन की बरामदगी, मृतक के कमरे में आरोपी के खून/DNA की मौजूदगी और अन्य परिस्थितिजन्य सबूतों का भी सहारा लिया। आरोपी ने आरोपों से इनकार किया। अभियोजन पक्ष ने मृतक की संपत्ति से जुड़े मकसद का आरोप लगाया।

    ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को हत्या के अपराध का दोषी ठहराया। आरोपी द्वारा दायर अपील पर हाई कोर्ट ने दोषसिद्धि को पलट दिया, जिसके बाद हिमाचल प्रदेश राज्य ने बरी किए जाने के फैसले के खिलाफ सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

    बरी करने का हाईकोर्ट का फैसला सही ठहराते हुए जस्टिस मिश्रा द्वारा लिखे गए फैसले में खास तौर पर इस बात पर सवाल उठाया गया कि जांच अधिकारी यह बताने में नाकाम रहे कि उक्त गवाहों के बयान क्यों, कब और किन हालात में दर्ज किए गए। वास्तव में, कोर्ट ने टैक्सी ड्राइवर और होटल कर्मचारी को 'गढ़े हुए गवाह' (स्वाभाविक गवाह नहीं) माना, जिन्हें ऐसे सबूत तैयार करने के लिए लाया गया, जो न तो जांच अधिकारी के पास उपलब्ध थे और न ही उन गवाहों के पास खुद थे।

    कोर्ट ने कहा,

    "यह अच्छी तरह से स्थापित है कि जांच अधिकारी की भूमिका सबूत इकट्ठा करना है, न कि उन्हें गढ़ना। जब जांच अधिकारी के लिए किसी व्यक्ति का बयान दर्ज करने या उस व्यक्ति के लिए पुलिस को जानकारी देने का कोई मौका न हो, फिर भी पुलिस बिना यह बताए कि बयान दर्ज करना क्यों ज़रूरी समझा गया, उसका बयान दर्ज कर लेती है, तो इस बात पर गंभीर संदेह पैदा होता है कि क्या उस गवाह को सबूत गढ़ने के लिए खड़ा किया गया।"

    कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि जांच अधिकारी को जांच के दौरान सामने आने वाले सबूत इकट्ठा करने होते हैं और वह गवाहों से पूछताछ की ज़रूरत बताने के बिना उन्हें लाकर हालात की कोई ऐसी कड़ी नहीं बना सकता जो असल में मौजूद न हो।

    कोर्ट ने कहा,

    “आमतौर पर जांच अधिकारी उन गवाहों से सबूत इकट्ठा करता है जो या तो अपराध की जगह पर मौजूद थे या जिन्हें अपराध के बारे में जानकारी होने की संभावना है। ऐसे लोगों से भी सबूत इकट्ठा किए जा सकते हैं जिनके पास पीड़ित या आरोपी से अपने संबंधों के कारण ज़रूरी जानकारी हो सकती है। जांच अधिकारी पीड़ित या संदिग्धों के मोबाइल के कॉल डिटेल रिकॉर्ड (CDR) के आधार पर उन लोगों से भी संपर्क कर सकता है जो पीड़ित या आरोपी के संपर्क में रहे हों। इसी तरह आरोपी के खुलासे वाले बयान से मिली जानकारी के आधार पर भी जानकारी जुटाई जा सकती है। हालांकि, अगर किसी व्यक्ति को यह पता ही न हो कि उसके पास मौजूद जानकारी किसी व्यक्ति के खिलाफ़ सबूत का काम कर सकती है तो इस बात की संभावना नहीं है कि वह व्यक्ति पुलिस को वह जानकारी देगा। ऐसे हालात में जांच अधिकारी का उसका बयान दर्ज करने का मकसद अहम हो जाता है। अगर वह वजह नहीं बताई जाती है तो उस गवाह की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं, क्योंकि यह माना जा सकता है कि उस गवाह को जान-बूझकर खड़ा किया गया।”

    कोर्ट ने बताया कि जांच अधिकारी किसी ऐसे व्यक्ति का बयान सही तरीके से दर्ज कर सकता है, जिसके बारे में उसे पहले किसी गवाह से जानकारी मिली हो कि उस व्यक्ति के पास काम की जानकारी हो सकती है। हालांकि, जब किसी खास व्यक्ति का बयान दर्ज करने का कोई साफ कारण न हो और गवाह के पास खुद पुलिस के पास जाने का कोई कारण न हो, तो बयान दर्ज करने से जुड़ी परिस्थितियां अहम हो जाती हैं।

    कोर्ट ने समझाया,

    "...जांच अधिकारी जांच के दौरान दर्ज किसी बयान से सुराग लेकर किसी दूसरे व्यक्ति का बयान दर्ज कर सकता है। ऐसी कार्रवाई पूरी तरह से सही और ईमानदारी से की गई मानी जाएगी। उदाहरण के लिए, अगर 'A' का बयान दर्ज करने के बाद जांच अधिकारी को पता चलता है कि 'B' को किसी काम की बात की जानकारी हो सकती है, तो 'B' का बयान दर्ज करना सही होगा। लेकिन अगर जांच अधिकारी सीधे 'B' का बयान दर्ज करता है। उसके पास यह मानने का कोई ठोस कारण नहीं है कि 'B' के पास काम की जानकारी है, और 'B' के पास भी जांच अधिकारी को खुद जानकारी देने का कोई कारण नहीं है, तो यह शक पैदा हो सकता है कि 'B' का बयान सिर्फ़ सबूत बनाने के लिए दर्ज किया गया है। इस बारे में कोई सफाई न होने पर 'B' की विश्वसनीयता पर सवाल उठ सकते हैं।"

    कोर्ट ने बनाए गए गवाह की गवाही को सबूत के तौर पर मानने से इनकार करते हुए कहा कि टैक्सी में यात्रा करना या होटल में ठहरना, अपने आप में ऐसी कोई संदिग्ध बात नहीं है, जिससे कोई व्यक्ति आम तौर पर पुलिस के पास जाए। इसके अलावा, होटल कर्मचारी की यह गवाही कि उसने घटना की रात आरोपी को देखा था, क्योंकि वह होटल में ठहरी हुई थी, भी बेअसर हो गई क्योंकि गवाह अपनी बात को साबित करने के लिए गेस्ट लिस्ट या विज़िटर एंट्री नहीं दिखा पाया।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    “इस मामले में PW-20 यानी जांच अधिकारी ने सवाल को टाल दिया और यह बताने से इनकार किया कि जांच के दौरान उन्होंने PW-4 और PW-18 के बयान कब दर्ज किए। इसके अलावा, इस बात का कोई स्पष्टीकरण नहीं है कि जांच के दौरान PW-4 और PW-18 के बयान दर्ज करने के लिए उन्हें किस बात ने प्रेरित किया। महत्वपूर्ण बात यह है कि PW-20 ने यह नहीं बताया कि आरोपी ने अपने खुलासे वाले बयान में चंबा से डिउर तक टैक्सी से यात्रा करने और वापस आने या होटल में ठहरने के बारे में कोई जानकारी दी। PW-20 ने केवल इतना कहा कि आरोपी ने अपने खुलासे में कहा कि वह चाबियां और मोबाइल बरामद करवा सकती है। इस प्रकार, PW-4 और PW-18 के बयान केवल सबूत तैयार करने के लिए दर्ज किए गए प्रतीत होते हैं... PW-4 के खुद पुलिस के पास जाकर अपना बयान दर्ज कराने की संभावना बहुत कम है, क्योंकि टैक्सी में यात्रा करना या होटल में ठहरना अपने आप में ऐसी कोई आपत्तिजनक बात नहीं है, जिससे कोई व्यक्ति परेशान हो और पुलिस को इसकी सूचना दे। इसलिए जांच अधिकारी को PW-4 और PW-18 के बयान दर्ज करने के लिए किस बात ने प्रेरित किया, यह महत्वपूर्ण हो जाता है। हमारी राय में इस संबंध में जानकारी या स्पष्टीकरण का अभाव उन्हें परिस्थितियों की एक श्रृंखला बनाने के लिए सबूत तैयार करने के उद्देश्य से लाए गए गवाह मानने के लिए पर्याप्त है।”

    पुलिस द्वारा सबूत तैयार करने के अलावा, अन्य प्रासंगिक कारक जैसे DNA सबूत का मेल न खाना, परिस्थितियों से जुड़े सबूतों की अधूरी श्रृंखला आदि भी अभियोजन पक्ष के मामले के लिए नुकसानदायक साबित हुए।

    नतीजतन, अपील खारिज की गई और बरी किए जाने का फैसला बरकरार रखा गया।

    Case Title : THE STATE OF HIMACHAL PRADESH VERSUS ANCHLA @ CHANCHLA

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