गुजरात प्रोहिबिशन एक्ट के तहत ज़ब्त गाड़ियों को अंतरिम तौर पर छोड़ने पर कोई पूरी तरह रोक नहीं: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
2 Sept 2026 8:56 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (02.09.2026) को ट्रायल कोर्ट, सेशंस कोर्ट और गुजरात हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द किया, जिनमें भारतीय निर्मित विदेशी शराब (IMFL) की बड़ी खेप ले जाते समय ज़ब्त किए गए ट्रक की अंतरिम कस्टडी देने से इनकार कर दिया गया। कोर्ट ने निर्देश दिया कि सिक्योरिटी जमा करने पर गाड़ी उसके मालिक को सौंप दी जाए। आदेशों को रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि गुजरात प्रोहिबिशन एक्ट, 1949 की धारा 98(2) ट्रायल के दौरान ज़ब्त गाड़ी को उसके मालिक को सौंपने पर पूरी तरह रोक नहीं लगाती है, भले ही बरामद शराब की मात्रा तय सीमा से ज़्यादा हो।
प्रोहिबिशन एक्ट की धारा 98(2) कोई पूर्ण रोक नहीं है और ट्रायल कोर्ट को कोर्ट के सामने पेश की गई चीज़ों की अंतरिम कस्टडी पर उचित आदेश देने के लिए क्रिमिनल प्रोसीजर कोड, 1973 की धारा 451 के तहत अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करना चाहिए।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस श्री चंद्रशेखर की बेंच ने अपीलकर्ता के अशोक लेलैंड ट्रक की ज़ब्ती से जुड़े एक मामले की सुनवाई करते हुए यह फैसला सुनाया। ट्रक को तब ज़ब्त किया गया, जब वह लुनावाड़ा होते हुए मोडासा से वड़ोडारा जा रहा था। रोके जाने पर, ड्राइवर ले जाए जा रहे सामान के लिए कोई पास या परमिट नहीं दिखा सका। तलाशी लेने पर गाड़ी में IMFL की 8,064 बोतलें मिलीं, जिनकी मात्रा लगभग 22,532.253 लीटर थी और कीमत 17,02,656 रुपये थी। इसे लगभग 98.66 लाख रुपये मूल्य के खाने-पीने के सामान की खेप के बीच छिपाकर रखा गया।
इसके बाद प्रोहिबिशन एक्ट की धारा 65(a), 65(e), 98(2), 81, 116(b) और 83 के तहत मामला दर्ज किया गया और ड्राइवर सहित चार आरोपियों के खिलाफ चार्जशीट दाखिल की गई। बाद में अपीलकर्ता ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 (BNSS) की धारा 497 के तहत ट्रक की अंतरिम कस्टडी के लिए अर्ज़ी दाखिल की। हालांकि, लुनावाड़ा के चीफ ज्यूडिशियल मजिस्ट्रेट ने इसे खारिज किया और बाद में महिसागर के सेशंस जज और गुजरात हाईकोर्ट, दोनों ने इस फैसले को सही ठहराया।
इसके बाद अपील करने वाले ने सुप्रीम कोर्ट का रुख किया। वहां यह तर्क दिया गया कि अपील करने वाली कंपनी एक ट्रांसपोर्ट कंपनी है और अपराध में उसकी कोई भूमिका नहीं थी। साथ ही यह भी कहा गया कि मुकदमे के पूरा होने में चार से पांच साल लग सकते हैं। यह भी बताया गया कि ट्रक एक साल से ज़्यादा समय से पुलिस स्टेशन में खड़ा है और धीरे-धीरे खराब हो रहा है। अपील करने वाले ने गाड़ी की अंतरिम कस्टडी पाने के लिए ज़रूरी सिक्योरिटी देने की इच्छा भी जताई।
दूसरी ओर, गुजरात सरकार ने गाड़ी छोड़ने का विरोध किया। सरकार का तर्क था कि प्रोहिबिशन एक्ट की धारा 98(2) के तहत अगर ज़ब्त की गई शराब की मात्रा तय सीमा से ज़्यादा है तो बॉन्ड या ज़मानत पर गाड़ी छोड़ने पर कानूनी रोक है। सरकार ने कहा कि निचली अदालतों ने अंतरिम कस्टडी देने से इनकार करते हुए इस रोक को सही ढंग से लागू किया।
इन तर्कों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने धारा 98(2) की संरचना की जांच की, जो "लेकिन" (but) शब्द से दो हिस्सों में बंटी हुई है। पहला हिस्सा प्रतिबंधित सामान ले जाने में इस्तेमाल होने वाले कंटेनर, पैकेज और गाड़ियों को ज़ब्त करने से संबंधित है। वहीं, दूसरा हिस्सा (जिसे 2011 में जोड़ा गया) ऐसी गाड़ी को बॉन्ड या ज़मानत पर छोड़ने पर रोक लगाता है, जब ज़ब्त की गई मात्रा तय सीमा से ज़्यादा हो।
'खेंगरभाई लखाभाई डंभाला बनाम गुजरात राज्य' मामले में अपने पहले के फैसले का हवाला देते हुए कोर्ट ने दोहराया कि दूसरे हिस्से की "भाषा बहुत स्पष्ट नहीं है"। इसे कानून की व्यापक योजना—जिसमें प्रोहिबिशन एक्ट की धारा 132 और क्रिमिनल प्रोसीजर कोड, 1973 की धारा 451 (CrPC, जो अब भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धारा 497 है) शामिल हैं—को नज़रअंदाज़ करके पूरी तरह से रोक के तौर पर नहीं देखा जा सकता।
कोर्ट ने यह भी माना कि प्रोहिबिशन एक्ट की धाराएं 98 और 132, CrPC की धारा 451 से अलग दायरे में काम करती हैं। जहां धारा 98 संपत्ति को कलेक्टर के पास भेजे जाने के बाद उसे ज़ब्त करने से संबंधित है, वहीं धारा 451 कोर्ट की उन शक्तियों को नियंत्रित करती है, जब जांच या मुकदमे के दौरान ज़ब्त की गई संपत्ति कोर्ट के सामने पेश की जाती है और कोर्ट को कस्टडी के बारे में उचित आदेश देना होता है।
ज़ब्त की गई गाड़ियों से जुड़े व्यापक सिद्धांत पर बेंच ने 'सुंदरभाई अंबालाल देसाई बनाम गुजरात राज्य' मामले का हवाला दिया। इसमें कहा गया कि जब गाड़ियों को उनके मालिकों को नहीं सौंपा जाता तो वे केस के अंतिम निपटारे तक पुलिस स्टेशन या कोर्ट परिसर में पड़ी-पड़ी खराब हो जाती हैं। ऐसी स्थिति से "किसी को फ़ायदा नहीं होता और मालिक को भारी नुकसान होता है"।
कोर्ट ने 'बसव्वा कॉम द्यमंगौडा पाटिल बनाम मैसूर राज्य' मामले का भी हवाला दिया, जिसमें कहा गया कि ज़ब्त की गई संपत्ति को ज़रूरत से ज़्यादा समय तक पुलिस या कोर्ट की कस्टडी में नहीं रखा जाना चाहिए। कोर्ट ने 'जनरल इंश्योरेंस काउंसिल बनाम आंध्र प्रदेश राज्य' मामले का भी ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि अच्छी हालत वाली गाड़ियाँ भी पुलिस स्टेशन में कुछ हफ़्तों तक खड़ी रहने पर सड़क पर चलने लायक नहीं रहतीं, साथ ही उनके चोरी होने और पुर्ज़े निकाले जाने का भी खतरा रहता है।
कोर्ट ने आगे कहा कि CrPC की धारा 451 के तहत अंतरिम कस्टडी के आवेदनों का निपटारा तेज़ी और समझदारी से किया जाना चाहिए। इसमें मालिक के हितों और गाड़ी का इस्तेमाल न कर पाने से होने वाली परेशानी, अनिश्चित काल तक कस्टडी में रखने से बचने में जनहित, पंचनामा, फ़ोटोग्राफ़ी और वीडियोग्राफ़ी के ज़रिए सबूत सुरक्षित रखने की ज़रूरत और ट्रायल की निष्पक्षता के बीच संतुलन बनाना ज़रूरी है।
कोर्ट ने यह भी माना कि ट्रायल कोर्ट, सेशंस कोर्ट और हाईकोर्ट ने CrPC की धाराओं 451, 457, 458 और 459 (जो अब क्रमशः भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता, 2023 की धाराएं 497, 503, 504 और 505 हैं) के तहत अपनी शक्तियों को लेकर "संकीर्ण नज़रिया अपनाकर गंभीर गलती की"। इन धाराओं का मकसद कोर्ट को ज़ब्त की गई संपत्ति की कस्टडी या निपटारे का आदेश देने से पहले संबंधित पहलुओं पर विचार करने के लिए व्यापक अधिकार देना है।
अपीलकर्ता की आजीविका के लगातार नुकसान, पुलिस स्टेशन में ट्रक के बेकार पड़े रहने और खराब होने, चार्जशीट पहले ही दाखिल हो जाने और पंचनामा व वीडियोग्राफ़ी के ज़रिए सबूतों की अहमियत को सुरक्षित रखने की संभावना को देखते हुए कोर्ट ने माना कि गाड़ी को छोड़ने का फ़ैसला ही सही है।
हाईकोर्ट ने 'मध्य प्रदेश राज्य बनाम उदय सिंह' मामले में जिस पुराने फ़ैसले (Precedent) का हवाला दिया था, उसे इस आधार पर अलग माना गया कि वह फ़ॉरेस्ट एक्ट (वन अधिनियम) की कार्यवाही से संबंधित है।
ऊपर बताई गई बातों को ध्यान में रखते हुए अपील मंज़ूर कर ली गई और हाईकोर्ट व निचली अदालतों के आदेश रद्द कर दिए गए। कोर्ट ने यह भी निर्देश दिया कि ट्रक की अंतरिम कस्टडी अपीलकर्ता को सौंप दी जाए, बशर्ते वह ट्रायल कोर्ट की संतुष्टि के लिए ₹15,00,000 की सिक्योरिटी के साथ एक पर्सनल बॉन्ड जमा करे और यह अंडरटेकिंग दे कि जब भी निर्देश दिया जाएगा, वह ट्रक को जांच अधिकारी या ट्रायल कोर्ट के सामने पेश करेगा। इसके अलावा, कोर्ट ने ट्रायल के दौरान गाड़ी को किसी और को बेचने या उस पर किसी तीसरे पक्ष का अधिकार बनाने पर रोक लगाई। यह भी निर्देश दिया गया कि गाड़ी सौंपने से पहले अपीलकर्ता के प्रतिनिधि और दो स्वतंत्र गवाहों की मौजूदगी में गाड़ी की हालत की तस्वीरें और वीडियो बनाते हुए एक विस्तृत पंचनामा तैयार किया जाए।
साथ ही कोर्ट ने स्पष्ट किया कि उसकी टिप्पणियां केवल गाड़ी की अंतरिम कस्टडी के सवाल तक ही सीमित हैं और इनका ट्रायल के गुण-दोष पर कोई असर नहीं पड़ेगा; ट्रायल इस फैसले से प्रभावित हुए बिना आगे बढ़ना चाहिए।
Case Title: M/s ABC Express v State of Gujarat


