सरकारी कर्मचारी अंतर-जिला ट्रांसफर को अधिकार के तौर पर नहीं मांग सकते: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
2 Nov 2026 12:16 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने उत्तर प्रदेश की सरकारी शिक्षिका का उनके ससुराल वाली जगह पर स्थानांतरण करने से इनकार किया। कोर्ट ने कहा कि केवल परिवार से दूर रहने के आधार पर कोई कर्मचारी अंतर-जिला स्थानांतरण को अपने अधिकार के रूप में नहीं मांग सकता।
जस्टिस जे.बी. पारदीवाला और जस्टिस के. विनोद चंद्रन की बेंच ने यह टिप्पणी की। बेंच ने बेसिक शिक्षा बोर्ड के सचिव के खिलाफ चल रही अवमानना (Contempt) की कार्यवाही को भी रद्द कर दिया। यह कार्यवाही संबंधित शिक्षिका ने शुरू की थी, उनका आरोप था कि बोर्ड ने हाईकोर्ट के उस फैसले का पालन नहीं किया, जिसमें बोर्ड को शिक्षिका के बहराइच जिले से लखनऊ जिले में अंतर-जिला स्थानांतरण के दावे पर विचार करने का निर्देश दिया गया। यह निर्देश 'यू.पी. बेसिक शिक्षा (शिक्षक) (तैनाती) नियमावली, 2008' के नियम 8(2)(d) के तहत दिया गया था, जो महिला शिक्षकों को कुछ विशेष छूट देता है।
अपीलकर्ता (जिसके खिलाफ अवमानना की कार्यवाही चल रही थी) ने नियमों का हवाला देते हुए इस कार्यवाही का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि शिक्षिका अंतर-जिला स्थानांतरण के लिए पात्र नहीं हैं, क्योंकि उन्हें निर्धारित न्यूनतम कट-ऑफ से कम अंक मिले हैं। साथ ही यह भी कहा गया कि यदि उनका स्थानांतरण किया जाता है तो संबंधित स्कूल में शिक्षकों की कमी हो जाएगी। इससे 'बच्चों का निःशुल्क और अनिवार्य शिक्षा का अधिकार अधिनियम, 2009' (RTE Act) का उल्लंघन होगा, जिसके तहत हर स्कूल में छात्रों और शिक्षकों का निश्चित अनुपात बनाए रखना अनिवार्य है।
अपीलकर्ता के तर्कों में दम पाते हुए कोर्ट ने कहा कि नियम 8(2)(d) के तहत महिला कर्मचारियों को केवल कुछ छूट दी गई, लेकिन इसका मतलब यह नहीं है कि इससे छात्रों की पढ़ाई पर कोई बुरा असर पड़े।
कोर्ट के अनुसार, यदि किसी स्थानांतरण से शिक्षकों की कमी होती है तो उसे अपने अधिकार के तौर पर नहीं मांगा जा सकता। कोर्ट ने इस बात पर जोर दिया कि शिक्षा का उद्देश्य शिक्षकों के करियर को आगे बढ़ाना या उन्हें अपनी सुविधानुसार तैनाती दिलाना नहीं है।
अदालत ने कहा,
"हर शिक्षक को यह याद रखना चाहिए कि शिक्षा व्यवस्था मुख्य रूप से छात्रों के लिए है, न कि शिक्षकों के करियर को आगे बढ़ाने या उन्हें अपनी सुविधानुसार पोस्टिंग दिलाने के लिए।"
परिणामस्वरूप, अपील स्वीकार कर ली गई; वह फैसला रद्द कर दिया गया, जिसमें अपीलकर्ता को प्रथम दृष्टया अवमानना का दोषी माना गया।
Case Title : Pratap Singh Baghel Versus Akanksha Shukla

