पीड़ित के साथ समझौते के आधार पर आपराधिक केस रद्द करने के लिए शिकायतकर्ता की सहमति ज़रूरी नहीं: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
31 Aug 2026 8:33 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (31 अगस्त) को कहा कि भले ही FIR में ऐसे अपराध शामिल हों, जिनमें समझौता नहीं हो सकता (Non-Compoundable Offences), फिर भी अगर असली पीड़ित ने आरोपी के साथ विवाद को साफ़ तौर पर सुलझा लिया है तो समझौते के आधार पर आपराधिक कार्यवाही रद्द की जा सकती है; और ऐसे शिकायतकर्ता की सहमति ज़रूरी नहीं है जो पीड़ित नहीं है।
जस्टिस के.वी. विश्वनाथन और जस्टिस अरुण पल्ली की बेंच ने कहा,
"अगर ऐसे शिकायतकर्ताओं (जो पीड़ित नहीं हैं) को समझौता करने की इजाज़त दी जाती है और असली पीड़ित को अधर में छोड़ दिया जाता है तो इसके बुरे नतीजे होंगे। इसलिए कानून का मकसद यह है कि असली पीड़ित ही उस समझौते का पक्षकार होना चाहिए, जिसके आधार पर धारा 482 के तहत कार्यवाही रद्द करने की मांग की जा रही है।"
बेंच ने मध्य प्रदेश हाईकोर्ट के उस फ़ैसले को रद्द किया, जिसमें अपीलकर्ता के ख़िलाफ़ आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार किया गया था, सिर्फ़ इसलिए कि शिकायतकर्ता उस समझौते का पक्षकार नहीं था, जो अपीलकर्ता और असली पीड़ित के बीच आपराधिक कार्यवाही रद्द करने को लेकर हुआ।
हाईकोर्ट के नज़रिए से असहमति जताते हुए कोर्ट ने कहा कि हालांकि पीड़ित के अलावा कोई अन्य व्यक्ति आपराधिक कानून की प्रक्रिया शुरू कर सकता है, लेकिन ऐसे शिकायतकर्ता को इस तरह से समझौता करने या रोकने की इजाज़त नहीं दी जा सकती जिससे असली पीड़ित की कोई बात ही न सुनी जाए।
कोर्ट ने कहा,
"...कानून का मकसद यह है कि असली पीड़ित ही उस समझौते का पक्षकार होना चाहिए, जिसके आधार पर धारा 482 के तहत कार्यवाही रद्द करने की मांग की जा रही है। साथ ही, जिस मामले में कार्यवाही रद्द करने की मांग की जा रही है, वह उन श्रेणियों के मामलों के दायरे में आना चाहिए, जिन्हें पार्टियों के बीच समझौते के आधार पर रद्द किया जा सकता है।"
मामले की पृष्ठभूमि
यह मामला 2011 में सुभाष चंद्र लालवानी (शिकायतकर्ता) द्वारा दर्ज कराई गई शिकायत से शुरू हुआ। इसमें आरोप लगाया गया कि अपीलकर्ता और तीन अन्य लोगों ने असली पीड़ित प्रदीप सिंह मेहता की लगभग 54.48 एकड़ ज़मीन हड़पने की साज़िश रची थी।
आरोपों में 'जनरल पावर ऑफ़ अटॉर्नी' पर मेहता के हस्ताक्षर में धोखाधड़ी और 'मैसर्स पैराडाइज़ फ़ार्म्स' के लिए पार्टनरशिप डीड बनाना शामिल था। शिकायतकर्ता ने ज़मीन के उस हिस्से में भी अपना हक जताया, जिसे कथित तौर पर पार्टनरशिप में लगाया गया। मजिस्ट्रेट ने IPC की धाराओं 466, 467, 468, 471, 420, 406 और 120B के तहत अपराधों का संज्ञान लिया।
2018 में हाईकोर्ट द्वारा धारा 482 के तहत दायर याचिका खारिज किए जाने के बाद अपीलकर्ता ने विवादित संपत्ति के मालिक मेहता के साथ हुए समझौते के आधार पर फिर से हाईकोर्ट का रुख किया।
मेहता ने एक हलफनामा दायर कर कहा कि ज़मीन उनके निर्देश पर पार्टनरशिप में दी गई, ज़रूरी औपचारिकताएं उसी के अनुसार पूरी की गईं, और उन्हें आरोपी से कोई शिकायत नहीं है और वे शिकायत को आगे नहीं बढ़ाना चाहते हैं।
इसके बावजूद हाईकोर्ट ने कार्यवाही रद्द करने से यह कहते हुए इनकार किया कि चूंकि मूल शिकायतकर्ता समझौते में शामिल नहीं था, इसलिए कार्यवाही खत्म नहीं की जा सकती।
हाईकोर्ट के फैसले से असंतुष्ट होकर अपीलकर्ता सुप्रीम कोर्ट पहुंचा।
फैसला
अपील स्वीकार करते हुए जस्टिस विश्वनाथन द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि हाईकोर्ट ने आपराधिक कार्यवाही रद्द करने से इनकार करके गलती की, सिर्फ़ इसलिए कि पीड़ित और आरोपी व्यक्तियों के बीच हुए समझौते में शिकायतकर्ता शामिल नहीं था।
कोर्ट ने ज्ञान सिंह बनाम पंजाब राज्य (2012) के अपने फैसले - जिसका बाद में नौशे अली और अन्य बनाम यूपी राज्य और अन्य (2025 LiveLaw (SC) 190) मामले में पालन किया गया - का हवाला देते हुए कहा कि ऐसे अपराध जिनमें सिविल प्रकृति का पहलू हो, जहां नुकसान मुख्य रूप से पीड़ित को हुआ हो और जहां पीड़ित ने सभी विवाद सुलझा लिए हों, वहां हाईकोर्ट कार्यवाही रद्द कर सकता है, भले ही अपराध समझौता-योग्य (कंपाउंडेबल) न हों।
संक्षेप में, कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि अपीलकर्ता और आरोपी व्यक्तियों तथा पीड़ितों के बीच हुए समझौते में शिकायतकर्ता के शामिल न होने से कार्यवाही रद्द करने की प्रक्रिया पर कोई बुरा असर नहीं पड़ेगा।
कोर्ट ने कहा,
“आरोप सिविल प्रकृति के हैं और इनमें कमर्शियल पहलू भी शामिल हैं। समझौता हो जाने के कारण दोषी ठहराए जाने की संभावना बहुत कम है। अगर इन मामलों को रद्द नहीं किया गया तो यह एक और ऐसा मामला बन जाएगा, जो न्यायिक व्यवस्था पर बोझ डालेगा और न्याय का इंतज़ार कर रहे अन्य महत्वपूर्ण मामलों के लिए बाधा बनेगा। न्याय के हित में यही होगा कि ऐसी कानूनी कार्यवाही को खत्म कर दिया जाए, जिसमें शामिल मुख्य पक्ष - जो पहले एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन थे - अब अपने मतभेद भुलाकर समझौता कर चुके हैं और आगे बढ़ चुके हैं।”
नतीजतन, अपील स्वीकार की गई और पीड़ित के साथ हुए समझौते के आधार पर अपीलकर्ताओं के खिलाफ लंबित आपराधिक कार्यवाही रद्द की गई।
Cause Title: Anand Kumar @ Sanjay Lalwani Versus The State of Madhya Pradesh And Ors.


