विभागीय जांच में कर्मचारी द्वारा स्वीकार न किए गए दस्तावेज़ों को गवाह के ज़रिए साबित करना ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट

  • विभागीय जांच में कर्मचारी द्वारा स्वीकार न किए गए दस्तावेज़ों को गवाह के ज़रिए साबित करना ज़रूरी: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (1 अप्रैल) को यह टिप्पणी की कि जब कोई कर्मचारी अपने ऊपर लगे आरोपों को स्वीकार नहीं करता है तो उसे नियोक्ता के बिना साबित हुए दस्तावेज़ी सबूतों के आधार पर नौकरी से नहीं निकाला जा सकता। कोर्ट ने ज़ोर देकर कहा कि नियोक्ता को ऐसे दस्तावेज़ी सबूतों को गवाहों के ज़रिए साबित करना होगा ताकि कर्मचारी को गवाह से जिरह करने का मौका मिल सके।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस मनोज मिश्रा की बेंच ने यह टिप्पणी तब की, जब वे यूपी कोऑपरेटिव फेडरेशन लिमिटेड के कर्मचारी की बर्खास्तगी रद्द कर रहे थे। उस कर्मचारी को नौकरी से निकाल दिया गया था।

    बेंच ने कहा,

    "भले ही कोई मामला पूरी तरह से दस्तावेज़ी सबूतों पर आधारित हो, जब तक कि जिन दस्तावेज़ों पर भरोसा किया गया है, उन्हें आरोपी कर्मचारी स्वीकार न कर ले, तब तक उन दस्तावेज़ों को साबित करने के लिए एक गवाह की जांच करनी होगी। साथ ही, जब ऐसा किया जाएगा, तो उस गवाह को जिरह के लिए पेश करना होगा।"

    कोर्ट ने प्रतिवादी-नियोक्ता की इस दलील को खारिज किया कि अपीलकर्ता-कर्मचारी द्वारा आरोपों से टालमटोल भरा इनकार करना, आरोपों को स्वीकार करने जैसा ही है।

    इसके बजाय, कोर्ट ने कहा,

    "विभागीय जांच में जब तक आरोप स्वीकार न कर लिया जाए, आरोप साबित करने का बोझ नियोक्ता/विभाग पर होता है।"

    कोर्ट ने यह भी कहा कि जब कर्मचारी ने आरोपों को स्वीकार नहीं किया तो दोषी कर्मचारी के खिलाफ सबूत साबित करने की नियोक्ता की ज़िम्मेदारी को नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता।

    यह मामला अपीलकर्ता के खिलाफ शुरू की गई अनुशासनात्मक कार्यवाही से जुड़ा है। अपीलकर्ता यूपी कोऑपरेटिव फेडरेशन के तहत एक धान खरीद केंद्र के प्रभारी के तौर पर काम कर रहा था।

    उस पर 2,00,850 रुपये के गबन और एक मिल को 1000 क्विंटल से ज़्यादा धान की डिलीवरी में कमी के आरोप लगाए गए। हालांकि, अपीलकर्ता ने आरोप-पत्र के अपने जवाब में दोनों आरोपों से इनकार किया था।

    इनकार के बावजूद, विभाग ने पूरी तरह से दस्तावेज़ी रिकॉर्ड पर भरोसा करते हुए जांच आगे बढ़ाई। उन्होंने उन दस्तावेज़ों को साबित करने के लिए किसी भी गवाह की जांच नहीं की, जिससे अपीलकर्ता को उन सबूतों के संबंध में किसी भी व्यक्ति से जिरह करने का मौका नहीं मिला।

    अनुशासनात्मक कार्यवाही और नौकरी से बर्खास्तगी को सही ठहराने वाले हाईकोर्ट के फैसले से दुखी होकर अपीलकर्ता ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया। विवादित आदेश रद्द करते हुए जस्टिस मिश्रा द्वारा लिखे गए फ़ैसले में यह कहा गया कि पूरी जांच प्रक्रिया की निष्पक्षता का उल्लंघन करते हुए की गई; क्योंकि जब अपीलकर्ता ने आरोपों से इनकार किया तो यह नियोक्ता की ज़िम्मेदारी थी कि वह उन आरोपों को साबित करे।

    अदालत ने कहा,

    “हमने पाया कि विभाग ने जांच के दौरान कोई भी गवाह पेश नहीं किया, जबकि अपीलकर्ता ने अपने ऊपर लगाए गए आरोपों से इनकार किया। इसलिए हमारी राय में यह जांच ही दोषपूर्ण हो गई। फिर एक बार जब जांच ही दोषपूर्ण हो गई तो उसके आधार पर दिया गया सज़ा या वसूली का आदेश भी मान्य नहीं रह सकता।”

    तदनुसार, अदालत ने कर्मचारी को नौकरी से निकालने के आदेश और उस पर लगाई गई वसूली रद्द की।

    हालांकि, नियोक्ता को यह छूट दी गई कि वह इस आदेश की तारीख से छह महीने के भीतर कानून के अनुसार, एक नई सिरे से (de novo) जांच कर सकता है।

    अदालत ने कहा,

    “यदि फ़ेडरेशन ऊपर दी गई अनुमति के अनुसार नई सिरे से जाँच नहीं करता है, तो अपीलकर्ता को नौकरी में वापस लिए जाने (Reinstatement) का अधिकार होगा, और उसे सेवा की निरंतरता का लाभ भी मिलेगा—जिसमें वेतन का बकाया भी शामिल है, बशर्ते पहले से दिए गए निलंबन भत्ते (Suspension Allowance) को उसमें से समायोजित कर लिया जाए। यदि फ़ेडरेशन जाँच करने का फ़ैसला करता है तो उसे अपीलकर्ता को नौकरी में वापस लेना होगा और जाँच पूरी होने तक उसे निलंबित (Suspended) रखना होगा। इस अवधि के दौरान उसे कानून के अनुसार देय निलंबन भत्ते का भुगतान करना होगा। यदि नई सिरे से जांच की जाती है तो वेतन के बकाया सहित अन्य सेवा लाभ, और साथ ही सेवा की निरंतरता के लाभ जांच के नतीजों पर निर्भर करेंगे।”

    Cause Title: JAI PRAKASH SAINI VERSUS MANAGING DIRECTOR U.P. COOPERATIVE FEDERATION LTD. & ORS.

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