लंबी सेवा के आधार पर अवैध नियुक्ति को नियमित नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

18 Aug 2026 10:44 PM IST

  • लंबी सेवा के आधार पर अवैध नियुक्ति को नियमित नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को कहा कि किसी अवैध नियुक्ति को सिर्फ़ इसलिए वैध नहीं माना जा सकता, क्योंकि कर्मचारी लंबे समय से सेवा में है। कोर्ट ने कहा कि "समय बीतने से अवैधता को ठीक करके वैध और मान्य नहीं बनाया जा सकता।"

    यह फ़ैसला हरियाणा विकास और पंचायत विभाग के चार अधिकारियों के डेपुटेशन (प्रतिनियुक्ति) और उसके बाद पब्लिक वर्क्स डिपार्टमेंट (बिल्डिंग एंड रोड्स) में उनके एब्जॉर्प्शन (विलय/समावेशन) से जुड़ी अपीलों पर आया। इन अधिकारियों प्रदीप अत्री, प्रवीण चौधरी, पंकज गौड़ और अरुण भाटिया - को PW(B&R) विभाग में असिस्टेंट इंजीनियर/सब-डिविजनल इंजीनियर के तौर पर शामिल किया गया।

    कोर्ट ने माना कि जहां अत्री और चौधरी का डेपुटेशन अवैध है, वहीं गौड़ और भाटिया का डेपुटेशन अनियमित था; लेकिन चारों अधिकारियों का एब्जॉर्प्शन अवैध, अमान्य और शून्य है। नतीजतन, कोर्ट ने उनके एब्जॉर्प्शन को रद्द कर दिया और उन्हें विकास और पंचायत विभाग वापस भेजने का आदेश दिया, जहाँ लागू नियमों के अनुसार उनके कैडर और सीनियरिटी (वरिष्ठता) तय की जाएगी।

    प्रक्रिया में राजनीतिक दखल की निंदा

    कोर्ट ने चारों अधिकारियों के डेपुटेशन और एब्जॉर्प्शन में "खुलेआम राजनीतिक दखल" की भी निंदा की।

    जस्टिस मनोज मिश्रा और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट के फ़ैसले को पलट दिया। हाईकोर्ट ने राजनीतिक दखल से PWD विभाग में अधिकारियों के एब्जॉर्प्शन पर सवाल तो उठाए, लेकिन लंबे समय तक सेवा में बने रहने के आधार पर उनकी सेवा में दखल देने से इनकार किया।

    'सेक्रेटरी, स्टेट ऑफ़ कर्नाटक बनाम उमादेवी (2006)' मामले का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि अवैध नियुक्तियों को सिर्फ़ समय बीतने के आधार पर नियमित नहीं किया जा सकता।

    कोर्ट ने कहा,

    "हमें लगता है कि हाईकोर्ट ने उन चार अधिकारियों को PW(B&R) डिपार्टमेंट में अपनी सर्विस जारी रखने की इजाज़त देकर बड़ी गलती की, जबकि उनके डेप्युटेशन और एब्ज़ॉर्प्शन (विलय) को गैर-कानूनी और कानून के खिलाफ़ घोषित किया गया। गैर-कानूनी होने का मतलब है कानून के खिलाफ़ होना; ऐसी चीज़ जो शुरू से ही गलत हो। यह 'शुरू से ही शून्य' (void ab initio) होता है। गैर-कानूनी काम को समय बीतने के साथ कानूनी और वैध नहीं बनाया जा सकता। गैर-कानूनी काम, जो अनियमितता (irregularity) से अलग होता है, उसे लंबे समय तक सर्विस में रहने के आधार पर सहानुभूतिपूर्ण नज़रिया अपनाकर नियमित (regularize) नहीं किया जा सकता। इस स्थिति को इस कोर्ट की एक संविधान पीठ ने 'उमा देवी' मामले में समझाया है। अगर नियुक्ति ही नियमों (इस मामले में 1965 के नियमों) का उल्लंघन करके की गई है, तो यह गैर-कानूनी है। ऐसी गैर-कानूनी नियुक्ति को एब्ज़ॉर्प्शन के नए तरीके से ठीक नहीं किया जा सकता, जिसे 'ट्रांसफर के ज़रिए नियुक्ति' बताया गया।"

    यह विवाद चार अधिकारियों - प्रदीप अत्री, प्रवीण चौधरी, पंकज गौड़ और अरुण भाटिया - से जुड़ा है। इन्हें शुरू में डेवलपमेंट और पंचायत डिपार्टमेंट में सब-डिविजनल ऑफिसर के तौर पर नियुक्त किया गया, लेकिन बाद में डेप्युटेशन पर भेजा गया और फिर PW(B&R) डिपार्टमेंट में एब्ज़ॉर्ब (विलय) कर लिया गया। दिलचस्प बात यह है कि इन अधिकारियों का PW(B&R) डिपार्टमेंट में डेप्युटेशन और एब्ज़ॉर्प्शन राजनीतिक दखलअंदाज़ी से किया गया।

    इसके अलावा, इनमें से तीन अधिकारी उसी पद के लिए सीधी भर्ती परीक्षा में फेल हो गए, जिसे बाद में उन्होंने एब्ज़ॉर्प्शन के ज़रिए हासिल किया। चौथे अधिकारी, प्रवीण चौधरी, तो कभी परीक्षा में शामिल ही नहीं हुए।

    पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने डेप्युटेशन पर उनकी लंबी सर्विस को देखते हुए सहानुभूतिपूर्ण नज़रिया अपनाया, लेकिन उनके डेप्युटेशन और एब्ज़ॉर्प्शन को कानून के खिलाफ़ माना। इसके बाद अधिकारियों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की।

    राज्य ने 1965 के नियमों के नियम 10 के तहत "खास हालात" का हवाला देते हुए एब्ज़ॉर्प्शन को सही ठहराने की कोशिश की। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि बताए गए कारण - अधिकारियों की कमी, M.Tech डिग्री और अच्छा परफॉर्मेंस - "सामान्य बातें" थीं और किसी भी तरह से "खास" नहीं थीं।

    हाईकोर्ट के सहानुभूतिपूर्ण नज़रिए को दरकिनार करते हुए, जस्टिस भुइयां के लिखे फ़ैसले में कहा गया कि बिना परीक्षा पास किए PWD में अपील करने वाले अधिकारियों की डेपुटेशन और एब्ज़ॉर्प्शन (स्थायी नियुक्ति) में जो गैर-कानूनीपन था, उसे समय बीत जाने के कारण ठीक नहीं किया जा सकता। इसके अलावा, कोर्ट ने राज्य की इस दलील को भी खारिज कर दिया कि विभाग में अधिकारियों की कमी के कारण डेपुटेशन और एब्ज़ॉर्प्शन ज़रूरी हो गया।

    कोर्ट ने कहा,

    "हमारी राय है कि विभाग में अधिकारियों की कमी को 1965 के नियमों के नियम 10 के तहत 'विशेष परिस्थिति' नहीं माना जा सकता।"

    कोर्ट ने आगे कहा,

    "1965 के नियमों का नियम 10 यह बताता है कि ट्रांसफर के ज़रिए नियुक्ति किसी खास स्थिति से निपटने के लिए होती है, जैसे कि पब्लिक सर्विस की कोई ऐसी ज़रूरत जिसके लिए सीधी भर्ती या प्रमोशन से नियुक्ति का इंतज़ार नहीं किया जा सकता—क्योंकि ये दोनों ही रेगुलर भर्ती के तरीके हैं (जिनका ज़िक्र नियम 6(1) में है) और इनमें ज़्यादा समय लगता है। ऐसा हो सकता है कि किसी खास प्रोजेक्ट के लिए ऐसे लोगों की ज़रूरत हो जिनके पास खास योग्यता, टैलेंट या स्किल हो। नियम 10 ऐसी ही ज़रूरतों के लिए है और इसका मकसद नियम 6 की बाधा को दूर करना है, जिसके तहत 100 प्रतिशत खाली पद या तो सीधी भर्ती से या प्रमोशन से भरे जाने होते हैं (50-50 प्रतिशत, जो कुल मिलाकर 100 प्रतिशत होते हैं)।"

    हाईकोर्ट ने अधिकारियों को उनके मूल विभाग में वापस न भेजकर गलती की

    कोर्ट ने कहा,

    “हालांकि हाईकोर्ट ने प्रदीप अत्री, प्रवीण चौधरी, पंकज गौड़ और अरुण भाटिया की प्रतिनियुक्ति (Deputation) और समावेशन (Absorption) को कानून की नज़र में गलत माना, फिर भी उसने उन्हें उनके मूल विभाग में वापस नहीं भेजा। ऐसा इसलिए किया गया, क्योंकि उनका अपने मूल विभाग पर कोई अधिकार (lien) नहीं था। हाईकोर्ट ने उनकी सेवाएं भी समाप्त नहीं कीं, क्योंकि उन्होंने 2005 से 18 साल से ज़्यादा समय तक सेवा की थी और इस चरण में उनकी सेवाएं समाप्त करने से उन्हें परेशानी होती। इसलिए सहानुभूतिपूर्ण दृष्टिकोण अपनाते हुए हाईकोर्ट ने PW(B&R) विभाग में असिस्टेंट इंजीनियर (सिविल) के तौर पर उनकी प्रतिनियुक्ति और समावेशन में कोई बदलाव नहीं किया, लेकिन उन्हें सरकार द्वारा दी गई वरिष्ठता (seniority) नहीं दी।”

    उपरोक्त के आधार पर अपीलों का निपटारा कर दिया गया।

    Cause Title: HEMANT KUMAR & ORS. VERSUS STATE OF HARYANA (with connected appeals)

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