'होस्टाइल गवाह की गवाही का इस्तेमाल बरी करने के लिए भी किया जा सकता है, सिर्फ़ दोषी ठहराने के लिए नहीं': सुप्रीम कोर्ट ने हत्या की सज़ा रद्द की
Shahadat
13 May 2026 8:30 PM IST

यह देखते हुए कि होस्टाइल गवाहों के सबूतों का इस्तेमाल न सिर्फ़ दोषी ठहराने के लिए, बल्कि अभियोजन पक्ष के मामले को कमज़ोर करने और बरी करने में मदद के लिए भी किया जा सकता है, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (13 मई) को SC/ST श्रेणी के एक व्यक्ति की हत्या के आरोपी एक व्यक्ति को बरी किया।
कोर्ट ने पाया कि अभियोजन पक्ष के मामले की नींव ही अभियोजन पक्ष के गवाहों ने कमज़ोर कर दी थी, क्योंकि उन्होंने अपराध की जगह के बारे में अभियोजन पक्ष के रुख का समर्थन नहीं किया।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एनवी अंजारिया की बेंच ने यह टिप्पणी की,
"...जब किसी होस्टाइल गवाह की गवाही, अगर उसकी पुष्टि हो जाए तो स्वीकार्य होती है और उसके आधार पर दोषी ठहराया जा सकता है तो सबूतों के मूल्यांकन के नियम के तौर पर इसका उल्टा भी सच है। इसका सीधा मतलब यह है कि जिस तरह होस्टाइल गवाह के सबूतों का इस्तेमाल आरोपी को दोषी ठहराने के लिए किया जा सकता है। उसी तरह ऐसे सबूतों का इस्तेमाल आरोपी को बरी करने के लिए भी किया जा सकता है, जब होस्टाइल गवाह की गवाही, रिकॉर्ड पर मौजूद अन्य सबूतों (चाहे वे प्रत्यक्ष हों या दस्तावेज़ी) के साथ पढ़ने पर विश्वसनीय लगती हो। सिद्धांत यह है कि होस्टाइल गवाह की गवाही या बयान का इस्तेमाल अभियोजन पक्ष के मामले को कमज़ोर करने के लिए सही तरीके से किया जा सकता है। इसके ज़रिए बरी करने के निष्कर्ष का समर्थन किया जा सकता है। उसे इसी पर आधारित किया जा सकता है।"
बेंच ने अपीलकर्ता की सज़ा रद्द की, जिसे भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 302 और 323, और अनुसूचित जाति और अनुसूचित जनजाति (अत्याचार निवारण) अधिनियम, 1989 (SC/ST Act) की धारा 3(2)(v) और 3(1)(x) के तहत आजीवन कारावास की सज़ा सुनाई गई।
अपीलकर्ता को 12 मई, 2013 को शिवा शंकर नाम के व्यक्ति की हत्या के मामले में रंगा रेड्डी ज़िले के SC/ST Act के लिए स्पेशल सेशन जज-सह-VII एडिशनल ज़िला और सेशन जज द्वारा दोषी ठहराया गया। तेलंगाना हाईकोर्ट ने 4 फरवरी, 2025 को इस सज़ा की पुष्टि की थी, जिसके बाद यह अपील दायर की गई। अभियोजन पक्ष ने दावा किया कि मृतक 14 फरवरी, 2013 को अपीलकर्ता की छोटी बहन (उम्र 18 वर्ष) के साथ भाग गया। अभियोजन पक्ष के अनुसार, इसके बाद एक ग्राम पंचायत बुलाई गई, जिसने फैसला किया कि मृतक ओगीपुर गांव छोड़कर चला जाएगा, जबकि लड़की अपने माता-पिता के घर पर ही रहेगी।
कथित तौर पर यह घटना तब हुई, जब मृतक एक दोस्त की शादी में शामिल होने के लिए गांव वापस आया था। जब वह सुबह के समय अपीलकर्ता के घर के पास से गुजर रहा था तो अपीलकर्ता ने उसे रोका; दोनों के बीच कहा-सुनी हुई और अपीलकर्ता ने पत्थर से उस पर हमला कर दिया। हैदराबाद के एक अस्पताल में ले जाते समय रास्ते में ही मृतक ने अपनी चोटों के कारण दम तोड़ दिया।
विवादित आदेश रद्द करते हुए जस्टिस अंजारिया द्वारा लिखे गए फैसले में यह टिप्पणी की गई कि अभियोजन पक्ष का मामला इस बुनियादी सवाल पर ही पूरी तरह से ढह गया कि क्या यह घटना वास्तव में उसी तरह से घटित हुई, जैसा कि दावा किया गया था।
अदालत ने अभियोजन पक्ष के गवाहों के बयानों में मौजूद विरोधाभासों को भी रेखांकित किया। जब गवाह नंबर 1 (PW1) और 3 (PW3) के बयानों को गवाह संख्या 4 (PW4) और 5 (PW5) के बयानों के साथ मिलाकर पढ़ा गया तो अभियोजन पक्ष के मामले की पूरी नींव ही ध्वस्त हो गई; क्योंकि अपराध घटित होने के वास्तविक स्थान का पता ही नहीं लगाया जा सका। इसके परिणामस्वरूप, गवाह नंबर 1, 3, 4 और 5 को 'होस्टाइल विटनेस' (विरोधी गवाह) घोषित कर दिया गया।
अदालत ने अपने फैसले में कहा,
"गवाह नंबर 1 और 3 के बयानों को गवाह संख्या 4 और 5 के बयानों के साथ मिलाकर देखने पर अभियोजन पक्ष के मामले का मुख्य आधार ही पूरी तरह से समाप्त हो गया। ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि घटना के घटित होने की बात ही संदिग्ध हो गई और उस पर विश्वास करना संभव नहीं रहा। इस संदेह को इस तथ्य से और भी अधिक बल मिला कि, यद्यपि यह दावा किया गया कि घटना एक ऐसे खुले स्थान पर घटित हुई थी, जहां वाहनों की भारी आवाजाही रहती थी। फिर भी घटना की पुष्टि करने और उसे साबित करने के लिए आस-पास के किसी भी व्यक्ति को गवाह के तौर पर पेश नहीं किया गया।"
इसके अतिरिक्त, इस बात पर भी गौर करते हुए कि अपराध स्थल मुख्य सड़क पर स्थित था—जहां आस-पास पत्थर की खदानें थीं और दिन-रात ट्रकों व लॉरियों की आवाजाही बनी रहती थी—अदालत ने कहा कि, भारी यातायात वाला सार्वजनिक स्थान होने के बावजूद, अभियोजन पक्ष ने उस इलाके के किसी भी स्वतंत्र गवाह को जांच के लिए पेश नहीं किया।
अदालत ने टिप्पणी की,
“घटना के घटित होने की बात ही अविश्वसनीय हो गई और उस पर यकीन करना मुश्किल हो गया। इस बात से संदेह और भी गहरा गया कि, हालांकि यह दावा किया गया कि घटना ऐसी खुली जगह पर हुई थी, जहां वाहनों की भारी आवाजाही थी। फिर भी घटना की पुष्टि और उसे साबित करने के लिए आस-पास के किसी भी व्यक्ति को गवाह के तौर पर पेश नहीं किया गया। इस प्रकार, यह नहीं कहा जा सकता कि घटना का घटित होना अभियोजन पक्ष द्वारा साबित किया जा सका है।”
उपर्युक्त बातों के आधार पर अपील स्वीकार की गई।
अदालत ने आदेश दिया,
“ऐसे कमज़ोर, विरोधाभासी और टूटते हुए सबूतों के मद्देनज़र, जहां अभियोजन पक्ष ने बहुत संघर्ष किया लेकिन अंततः अपना मामला साबित करने में बुरी तरह विफल रहा, ट्रायल कोर्ट द्वारा दी गई सज़ा (दोषसिद्धि), जिसे हाई कोर्ट ने भी बरकरार रखा था, अब मान्य नहीं रह जाती। दोनों ही अदालतों ने अपीलकर्ता को दोषी ठहराने में एक जैसी ही गलती की। ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के फ़ैसले और आदेश को रद्द किया जाना उचित है।”
Cause Title: TALARI NARESH VERSUS THE STATE OF TELANGANA

