हाईकोर्ट बेबुनियाद या परेशान करने वाली आपराधिक कार्यवाही रद्द करने के लिए FIR/शिकायत से आगे भी देख सकते हैं: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
20 March 2026 8:34 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने 'कहानी-2' फ़िल्म के प्रोड्यूसर सुजॉय घोष के ख़िलाफ़ कॉपीराइट उल्लंघन का मामला रद्द करते हुए यह टिप्पणी की कि आपराधिक कार्यवाही रद्द करने के लिए CrPC की धारा 482 या संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते समय हाईकोर्ट को अपनी जांच को केवल मामले के मौजूदा चरण तक ही सीमित नहीं रखना चाहिए, बल्कि बेबुनियाद कार्यवाही रद्द करने के लिए समग्र परिस्थितियों और रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री पर भी विचार करना चाहिए।
जस्टिस पी.एस. नरसिम्हा और जस्टिस आलोक अराधे की पीठ ने मोहम्मद वाजिद बनाम उत्तर प्रदेश राज्य, 2023 LiveLaw (SC) 624 का हवाला देते हुए टिप्पणी की,
“कोर्ट को संहिता की धारा 482 या संविधान के अनुच्छेद 226 के तहत अपने अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते समय खुद को केवल मामले के मौजूदा चरण तक ही सीमित रखने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि उसे मामले की शुरुआत/पंजीकरण की ओर ले जाने वाली समग्र परिस्थितियों के साथ-साथ जांच के दौरान इकट्ठा की गई सामग्री को भी ध्यान में रखने का अधिकार है।”
कोर्ट ने टिप्पणी की कि जब बेबुनियाद या परेशान करने वाली कार्यवाही के आधार पर दर्ज FIR/शिकायतों को रद्द करने वाली याचिका पर सुनवाई हो रही हो तो “यह पता लगाने के लिए कि क्या कथित अपराध के लिए ज़रूरी तत्व सामने आए हैं या नहीं, (हाई) कोर्ट के लिए केवल FIR/शिकायत में किए गए दावों को देखना ही काफ़ी नहीं होगा। बेबुनियाद या परेशान करने वाली कार्यवाही में कोर्ट का यह फ़र्ज़ है कि वह दावों के अलावा, मामले के रिकॉर्ड से सामने आने वाली कई अन्य संबंधित परिस्थितियों पर भी नज़र डाले, और यदि ज़रूरी हो तो पूरी सावधानी और समझदारी के साथ 'पंक्तियों के बीच छिपे अर्थ' (यानी, अनकही बातों) को समझने की कोशिश करे।”
संक्षेप में कहें तो जब कोई आरोपी बेबुनियाद कार्यवाही से उत्पन्न FIR/शिकायत रद्द करने की मांग करता है तो हाईकोर्ट आस-पास की परिस्थितियों, जांच के दौरान इकट्ठा की गई सामग्री, और शिकायत दर्ज होने से पहले और बाद की घटनाओं पर भी विचार कर सकते हैं।
इस क़ानून को लागू करते हुए जस्टिस आलोक अराधे द्वारा लिखे गए फ़ैसले में यह माना गया कि हाई कोर्ट ने आस-पास की परिस्थितियों और जांच के दौरान इकट्ठा की गई प्रथम दृष्ट्या सामग्री पर विचार न करके ग़लती की। कोर्ट ने पाया कि न तो शिकायत में और न ही गवाहों के बयानों में शिकायतकर्ता की स्क्रिप्ट के किसी खास हिस्से की पहचान की गई, जिसे कथित तौर पर अपीलकर्ता ने कॉपी किया और SWA विवाद निपटान समिति की रिपोर्ट, जिसमें अपीलकर्ता को बरी किया गया, पर भी ध्यान नहीं दिया गया।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“शिकायतकर्ता और गवाहों, यानी अजय कुमार मेहता (शिकायतकर्ता के भाई) और जय किशोर मेहता (शिकायतकर्ता के चचेरे भाई) के बयानों में स्क्रिप्ट के किसी भी ऐसे फीचर की पहचान नहीं की गई, जिसे कथित तौर पर कॉपी किया गया हो। यह ध्यान देना ज़रूरी है कि SWA की विवाद निपटान समिति, जिसमें विशेषज्ञ शामिल थे, ने अपने 24.02.2018 के आदेश में फिल्म और स्क्रिप्ट के बीच कोई समानता नहीं पाई और शिकायत को खारिज कर दिया। यह आदेश गवाहों के बयान दर्ज होने से पहले और समन जारी होने से पहले पारित किया गया। हालांकि, शिकायतकर्ता और उसके गवाहों ने इस ज़रूरी तथ्य को छिपाया और इसे कोर्ट के संज्ञान में नहीं लाया।”
कोर्ट ने फैसला सुनाया,
“यह साफ़ है कि शिकायत में केवल बेबुनियाद और बिना किसी सबूत के आरोप लगाए गए हैं, और पहली नज़र में भी फिल्म और स्क्रिप्ट के बीच कोई समानता ज़ाहिर नहीं होती।”
तदनुसार, अपील स्वीकार कर ली गई।
Cause Title: SUJOY GHOSH VERSUS THE STATE OF JHARKHAND & ANR.

