एग्जीक्यूटिंग कोर्ट व्यावहारिक मुश्किलों के आधार पर समझौते वाली डिक्री की शर्तों में बदलाव नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

20 April 2026 2:36 PM IST

  • एग्जीक्यूटिंग कोर्ट व्यावहारिक मुश्किलों के आधार पर समझौते वाली डिक्री की शर्तों में बदलाव नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने फिर दोहराया कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट डिक्री के पीछे जाकर उसकी जांच नहीं कर सकता, बल्कि उसे डिक्री को वैसे का वैसा ही लागू करना होता है।

    कोर्ट ने कहा,

    "(एग्जीक्यूटिंग कोर्ट) को डिक्री को बिना किसी बदलाव के, वैसे का वैसा ही लागू करना होता है। कानून में यह बात तय है कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट का अधिकार क्षेत्र सिर्फ़ पारित की गई डिक्री को प्रभावी बनाने तक ही सीमित है। उसे ट्रायल कोर्ट की भूमिका नहीं निभानी चाहिए, ताकि वह डिक्री में व्यक्त किए गए विचारों की जगह अपने खुद के विचार थोप सके।"

    जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस प्रसन्ना बी. वराले की बेंच ने बॉम्बे हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया, जिसमें एग्जीक्यूटिंग कोर्ट के उस फ़ैसले को सही ठहराया गया, जिसमें सिविल कोर्ट की समझौते वाली डिक्री में बदलाव किया गया। एक समझौते वाली डिक्री पारित की गई, जिसमें पक्षों ने ज़मीन के कुछ हिस्सों की अदला-बदली करने का समझौता किया था।

    एग्जीक्यूटिंग कोर्ट ने डिक्री में सिर्फ़ इसलिए बदलाव किया, क्योंकि ज़मीन के कुछ हिस्सों की अदला-बदली शायद व्यावहारिक न हो। इसका कारण यह था कि उन पर बना निर्माण स्वीकृत नक्शे के अनुसार नहीं था, या फिर उसका कुछ हिस्सा पहले ही बेचा जा चुका था।

    हाईकोर्ट के इस फ़ैसले ने कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट द्वारा समझौते वाली डिक्री में किया गया बदलाव सही है, वादी को सुप्रीम कोर्ट में अपील करने के लिए प्रेरित किया।

    अपील स्वीकार करते हुए जस्टिस मित्तल द्वारा लिखे गए फ़ैसले ने समझौते वाली डिक्री को बहाल कर दिया। इसमें यह बात नोट की गई कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट के पास डिक्री की शर्तों में बदलाव करने का कोई अधिकार नहीं है।

    कोर्ट ने कहा,

    "...एग्जीक्यूटिंग कोर्ट के पास डिक्री की शर्तों में बदलाव करने का कोई अधिकार क्षेत्र नहीं है। सिर्फ़ तभी, जब ज़मीन की पहचान को लेकर कोई विवाद खड़ा हो जाए - यानी वह ज़मीन जो दूसरे पक्ष को अपनी ज़िम्मेदारी के तौर पर दी जानी है - तो ही कोर्ट उस विवाद का फ़ैसला कर सकता है।"

    कोर्ट ने कहा कि इस मामले में चूंकि समझौते वाली डिक्री में यह साफ़ तौर पर बताया गया कि पक्षों के बीच ज़मीन का बँटवारा किस तरीके से और किस हिस्से का होगा। इसलिए एग्जीक्यूटिंग कोर्ट का यह कदम गलत था कि उसने समझौते वाली डिक्री के तहत पक्षों को आवंटित किए गए क्षेत्र में बदलाव कर दिया और उन्हें ज़मीन के कुछ अलग हिस्से आवंटित कर दिए। इस तरह उसने असल में समझौते वाली डिक्री में ही बदलाव कर दिया।

    कोर्ट ने यह माना कि एग्जीक्यूटिंग कोर्ट ने डिक्री की शर्तों को नज़रअंदाज़ करके गलती की। उसने ऐसा सिर्फ़ इस आधार पर किया कि निर्माण स्वीकृत योजना से अलग था, या ज़मीन का कुछ हिस्सा बेचा जा चुका था - जबकि पक्षों की पहचान और समझौते वाली डिक्री की शर्तों को लेकर कोई विवाद ही नहीं था।

    कोर्ट ने फ़ैसला सुनाया,

    “इस मामले में दोनों पक्षकारों के हिस्से में आने वाली ज़मीन की पहचान को लेकर कोई विवाद नहीं है। समझौते के आदेश में दोनों पक्षों के हिस्से में आने वाली ज़मीन के हिस्सों का साफ़-साफ़ ब्यौरा दिया गया। इसलिए एग्ज़ीक्यूटिंग कोर्ट को यह पक्का करना होगा कि दोनों पक्ष अपनी ज़िम्मेदारियां पूरी करें और आदेश के मुताबिक ज़मीन की अदला-बदली करें। साथ ही यह भी देखना होगा कि जैसा निर्देश दिया गया, वैसे ही बिक्रीनामा (Sale Deed) तैयार किया जाए। सिर्फ़ इस वजह से कि ज़मीन के कुछ हिस्सों की अदला-बदली शायद मुमकिन न हो—क्योंकि उन पर बना निर्माण मंज़ूरशुदा नक्शे के मुताबिक नहीं है, या उसका कुछ हिस्सा पहले ही बेचा जा चुका है—ये सभी बातें बेमानी हैं। चूंकि एग्ज़ीक्यूटिंग कोर्ट ने 19.07.2021 और 26.08.2021 के आदेश पारित करते समय अपने अधिकार क्षेत्र का उल्लंघन किया और आदेश को उसके मूल रूप में लागू करने का निर्देश देने के बजाय दोनों पक्षकारों को आवंटित ज़मीन के कुछ हिस्सों में बदलाव करके आदेश की शर्तों को ही बदल दिया, इसलिए ये आदेश कानून की नज़र में मान्य नहीं हैं।”

    उपरोक्त बातों को ध्यान में रखते हुए अपील मंज़ूर की गई और ट्रायल कोर्ट के समझौते का आदेश बहाल किया। साथ ही यह निर्देश दिया गया कि आदेश को उसके मूल रूप में ही लागू किया जाए।

    Cause Title: MAURICE W. INNIS VERSUS LILY KAZROONI @ LILY ARIF SHAIKH

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