Evidence Act | धारा 69 का इस्तेमाल वसीयत साबित करने के लिए तभी किया जा सकता है जब धारा 68 के तहत गवाहों की पुष्टि साबित करना नामुमकिन हो: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

17 Aug 2026 7:38 PM IST

  • Evidence Act | धारा 69 का इस्तेमाल वसीयत साबित करने के लिए तभी किया जा सकता है जब धारा 68 के तहत गवाहों की पुष्टि साबित करना नामुमकिन हो: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि इंडियन एविडेंस एक्ट, 1872 की धारा 69 का इस्तेमाल धारा 68 के तहत वसीयत साबित करने के सामान्य तरीके के विकल्प के तौर पर नहीं किया जा सकता। कोर्ट ने कहा कि आम तौर पर वसीयत को धारा 68 के तहत साबित किया जाना चाहिए। इसे धारा 69 के तहत तभी साबित किया जा सकता है, जब वसीयत पेश करने वाला यह साबित कर दे कि धारा 68 के तहत वसीयत साबित करने के लिए कोई गवाह नहीं मिल रहा है।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने मद्रास हाईकोर्ट के उस फैसले को रद्द करते हुए यह बात कही, जिसमें हाईकोर्ट ने धारा 68 की ज़रूरत को नज़रअंदाज़ करते हुए सीधे एविडेंस एक्ट की धारा 69 का इस्तेमाल करके वसीयत को सही ठहराया था। कोर्ट ने साफ़ किया कि धारा 69 के तहत वसीयत साबित करने से पहले यह साबित करना ज़रूरी है कि दोनों गवाहों में से कोई भी नहीं मिल रहा है।

    एविडेंस एक्ट की धारा 68 वसीयत साबित करने का सामान्य कानूनी तरीका बताती है। वसीयत पेश करने वाले को आम तौर पर वसीयत साबित करने के लिए कम से कम एक गवाह से पूछताछ करनी होती है। धारा 69 वसीयत के निष्पादन (Execution) को साबित करने का एक तरीका देती है, जब धारा 68 के तहत सामान्य गवाहों के ज़रिए सबूत देना नामुमकिन हो जाता है। धारा 69 के अनुसार, वसीयत पेश करने वाले को यह साबित करना होगा कि कम-से-कम एक गवाही गवाह की लिखावट में है और वसीयत बनाने वाले के हस्ताक्षर उनकी अपनी लिखावट में हैं। धारा 68 की तुलना में धारा 69 वसीयत साबित करने का आसान तरीका है।

    संक्षेप में मामला

    फैसले का मतलब है कि धारा 69 वसीयत साबित करने का कोई वैकल्पिक तरीका नहीं है; बल्कि, यह एक असाधारण तरीका है, जिसका इस्तेमाल तभी किया जा सकता है, जब धारा 68 के तहत सामान्य तरीके से वसीयत साबित करना नामुमकिन हो जाए।

    मामले की पृष्ठभूमि

    यह विवाद 1976 में अरुकानियाम्मल नाम की महिला द्वारा बनाई गई रजिस्टर्ड वसीयत से जुड़ा था। इस वसीयत में खेती की ज़मीन अलामाथल की शाखा को देने की बात कही गई।

    वसीयत के गवाह के तौर पर नाम दर्ज दो लोगों - मरप्पा गौंडर और अवनाशी गौंडर - में से किसी से भी कोर्ट में पूछताछ नहीं की गई।

    मरप्पा गौंडर की मौत की बात तो उनके बेटे की गवाही से साबित हो गई, लेकिन प्रतिवादी (Respondents) यह साबित नहीं कर पाए कि अवनाशी गौंडर की मौत हो चुकी है या वह किसी वजह से उपलब्ध नहीं है।

    ट्रायल कोर्ट ने माना कि धारा 68 की शर्तों को पूरा न करने की वजह से धारा 69 के तहत वसीयत साबित नहीं हो पाई, क्योंकि दूसरे गवाह अवनाशी गौंडर की मौत या अनुपलब्धता के बारे में कोई ठोस सबूत पेश नहीं किया गया।

    हालांकि, हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के फैसले को पलट दिया और धारा 68 की शर्तों को पूरा किए बिना ही प्रतिवादी की धारा 69 पर आधारित दलील को मान लिया। दूसरे शब्दों में, हाईकोर्ट ने दोनों गवाहों को मृत मान लिया और वसीयत को सीधे धारा 69 के तहत साबित करने की ज़रूरत समझी।

    कोर्ट का फैसला

    हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए जस्टिस कोटिश्वर सिंह ने कहा कि हाईकोर्ट ने एविडेंस एक्ट की धारा 68 की ज़रूरत को नज़रअंदाज़ करके गलती की। कोर्ट के अनुसार, धारा 69 वसीयत साबित करने का कोई वैकल्पिक तरीका नहीं है, बल्कि यह एक खास तरीका है, जो तभी लागू होता है, जब कोई भी गवाह न मिल सके। इसका मतलब है कि जब तक यह पक्का न हो जाए कि दोनों गवाह नहीं मिल सकते, तब तक धारा 69 के तहत वसीयत साबित नहीं की जा सकती।

    कोर्ट ने कहा,

    "एविडेंस एक्ट की धारा 69 को सही तरीके से लागू नहीं किया गया, क्योंकि प्रतिवादी अवनाशी गौंडर की मौत या अनुपलब्धता को ठीक से साबित नहीं कर पाए।"

    कोर्ट ने यह भी बताया कि धारा 69 को गलत तरीके से लागू किया गया, क्योंकि दूसरे गवाह अवनाशी गौंडर की मौत को लेकर अनिश्चितता थी; उनकी मौत के बारे में ज़बानी गवाही को गौंडर के गाँव के किसी व्यक्ति का समर्थन नहीं मिला।

    कोर्ट ने कहा,

    “इसलिए हमारा मानना ​​है कि एविडेंस एक्ट की धारा 68 और 69 के बीच कानूनी प्रक्रिया का सही ढंग से पालन नहीं किया गया। मरप्पा गौंडर की मौत तो साबित हो गई, लेकिन अवनाशी गौंडर की मौत या उनके उपलब्ध न होने की बात साबित नहीं हो पाई। जब तक यह संभावना बनी हुई थी कि गवाह के तौर पर नाम दर्ज कोई व्यक्ति जीवित है और उसे अदालत में पेश किया जा सकता है, तब तक प्रतिवादी एविडेंस एक्ट की धारा 68 को नज़रअंदाज़ करके सीधे धारा 69 के तहत कार्रवाई नहीं कर सकते थे।”

    इसके बाद अपील मंज़ूर कर ली गई और इस तरह ट्रायल कोर्ट का फ़ैसला बहाल कर दिया गया।

    Cause Title: PAZHANATHAL (DEAD) THROUGH LRS. & ORS. VERSUS ALAMATHAL (DEAD) THROUGH LRS.

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