हर मोबाइल फ़ोन एक 'वर्चुअल गैंबलिंग हाउस' बन गया है, ऑनलाइन गेमिंग की लत सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए खतरा: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
3 Jun 2026 3:37 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए का व्यापक प्रसार सार्वजनिक व्यवस्था, सार्वजनिक शांति और सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक गंभीर खतरा पैदा करता है। कोर्ट ने यह भी कहा कि तकनीकी विकास ने हर मोबाइल फ़ोन को एक "वर्चुअल आम जुआ घर" में बदल दिया और सट्टेबाजी व जुए को पूरे समाज में ज़्यादा सामान्य और सुलभ बना दिया।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने कहा कि राज्य संविधान की सातवीं अनुसूची की सूची II की प्रविष्टि 1 के तहत "सार्वजनिक व्यवस्था" पर अपनी विधायी शक्ति का इस्तेमाल करके ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए की गतिविधियों को विनियमित और प्रतिबंधित कर सकते हैं। कोर्ट ने कहा कि ऐसी गतिविधियों से जुड़े सामाजिक नुकसानों का सार्वजनिक व्यवस्था से जुड़ी चिंताओं के साथ पर्याप्त संबंध है।
कोर्ट ने कहा कि ऑनलाइन मनी गेमिंग का जनता पर लत, वित्तीय नुकसान और उसके परिणामस्वरूप होने वाली आत्महत्याओं के मामले में निश्चित प्रभाव पड़ता है। कोर्ट ने ये टिप्पणियां तमिलनाडु और कर्नाटक के उन कानूनों को सही ठहराते हुए कीं, जो ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए पर प्रतिबंध लगाते हैं, यहां तक कि कौशल वाले खेलों पर भी।
कोर्ट ने कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था में समाज के सदस्यों के बीच शांति की स्थिति, शांतिपूर्ण और व्यवस्थित सामाजिक अस्तित्व, सामुदायिक जीवन की "सामान्य गति" का रखरखाव, सार्वजनिक सुरक्षा, सार्वजनिक हित और सामाजिक व आर्थिक उथल-पुथल से सुरक्षा शामिल है। कोर्ट ने आगे कहा कि सार्वजनिक व्यवस्था न केवल हिंसा या अव्यवस्था से बिगड़ती है, बल्कि उन गतिविधियों से भी बिगड़ती है जो सार्वजनिक स्वास्थ्य को नुकसान पहुंचाती हैं, व्यापक भय या घबराहट पैदा करती हैं, सामान्य जीवन को बाधित करती हैं या सामाजिक व आर्थिक अस्थिरता का कारण बनती हैं।
इन सिद्धांतों को लागू करते हुए कोर्ट ने जांच की कि क्या ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए के परिणाम इतने गंभीर होते हैं कि वे राज्यों को सार्वजनिक व्यवस्था पर कानून बनाने की शक्ति का इस्तेमाल करने के लिए प्रेरित कर सकें।
तमिलनाडु राज्य ने तर्क दिया था कि तेज़ी से हुए डिजिटलीकरण और तकनीकी विकास के कारण ऑनलाइन गेमिंग की लत, असहनीय कर्ज़, वित्तीय संकट और आत्महत्याओं में काफ़ी वृद्धि हुई।
राज्य ने विश्व स्वास्थ्य संगठन द्वारा 'इंटरनेशनल क्लासिफिकेशन ऑफ़ डिज़ीज़ेज़' (ICD-11) में "गेमिंग डिसऑर्डर" को मान्यता दिए जाने का हवाला दिया था। इसे गेमिंग व्यवहार के ऐसे लगातार या बार-बार होने वाले पैटर्न के रूप में परिभाषित किया गया, जिसमें व्यक्ति का गेमिंग पर नियंत्रण कमज़ोर हो जाता है और वह हानिकारक परिणामों के बावजूद गेमिंग जारी रखता है।
राज्य ने यह भी तर्क दिया था कि ऑनलाइन प्लेटफ़ॉर्म पारंपरिक भौतिक सीमाओं को पार कर जाते हैं और तत्काल, बड़े पैमाने पर भागीदारी को संभव बनाते हैं, जिससे लत, वित्तीय शोषण और सामाजिक उथल-पुथल के जोखिम बढ़ जाते हैं।
डिजिटल युग ने बदली जुए की प्रकृति
कोर्ट ने कहा कि तकनीकी विकास ने सट्टेबाजी और जुए की गतिविधियों के पैमाने और पहुंच को मौलिक रूप से बदल दिया है। कोर्ट ने कहा कि स्मार्टफ़ोन, इंटरनेट कनेक्टिविटी और डिजिटल पेमेंट सिस्टम की वजह से ऑनलाइन मनी गेमिंग तेज़ी से बढ़ा है। कोर्ट ने कहा कि लोग जितनी आसानी से गेमिंग प्लेटफ़ॉर्म तक पहुंच पाते हैं, उसकी वजह से सट्टेबाज़ी और जुआ काफ़ी हद तक आम बात बन गई।
कोर्ट ने कहा कि ऑनलाइन मनी गेमिंग में हिस्सा लेना अब सिर्फ़ कुछ खास लोगों तक ही सीमित नहीं रह गया। कोर्ट के सामने रखे गए आंकड़ों से पता चला कि बड़ी संख्या में खिलाड़ी गाँव के इलाकों और कम इनकम वाले ग्रुप से आते हैं।
कोर्ट ने कहा कि पारंपरिक जुआ कानूनों का मकसद आम जुआ घरों को फैलने से रोकना था, लेकिन डिजिटल ज़माने में यह मकसद काफ़ी हद तक कमज़ोर पड़ गया।
कोर्ट ने कहा,
"टेक्नोलॉजी के बढ़ने के साथ पब्लिक गैंबलिंग एक्ट जिस बुराई को रोकना चाहता था - यानी आम जुआ घरों को बढ़ने से रोकना - वह पूरी तरह से बेकार हो गया, क्योंकि अब हर मोबाइल फ़ोन एक वर्चुअल आम जुआ घर बन गया है, साथ ही गेम खेलने का ज़रिया भी।"
मात्र खिलाड़ियों तक ही सीमित नहीं प्रभाव
कोर्ट ने कहा कि ऑनलाइन सट्टेबाज़ी और जुआ के नतीजे सिर्फ़ इसमें हिस्सा लेने वाले लोगों तक ही सीमित नहीं रहते, बल्कि पूरे समाज पर असर डालते हैं।
कोर्ट ने कहा कि ऑनलाइन मनी गेमिंग से होने वाला बड़े पैमाने पर पैसों का नुकसान और इसकी लत अब सिर्फ़ इक्का-दुक्का घटनाएं नहीं रह गई हैं। कोर्ट ने कहा कि अब आबादी के एक बड़े हिस्से के पास मोबाइल फ़ोन और तुरंत पेमेंट करने के तरीके मौजूद हैं, जिससे सट्टेबाज़ी और जुआ की गतिविधियां पहले कभी न देखे गए पैमाने पर लोगों की रोज़मर्रा की ज़िंदगी में घुस गई हैं।
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि बहुत से लोग तुरंत पैसे कमाने की उम्मीद में झूठी उम्मीदों के जाल में फंस जाते हैं। कोर्ट ने कहा कि इस तरह की सोच से जोखिम उठाने का रवैया आम बात बन जाता है और यह आम सामाजिक ज़िंदगी पर इस तरह से असर डालता है, जो किसी एक व्यक्ति के निजी बर्ताव से कहीं ज़्यादा बड़ा होता है।
सामुदायिक जीवन की सामान्य गति में बाधा
कोर्ट ने इस संवैधानिक सिद्धांत पर भरोसा किया कि सार्वजनिक व्यवस्था तब प्रभावित होती है, जब कोई गतिविधि केवल किसी खास व्यक्ति को नुकसान पहुंचाने के बजाय सामुदायिक जीवन की "सामान्य गति" में बाधा डालती है।
इस कसौटी को लागू करते हुए कोर्ट ने यह निष्कर्ष निकाला कि ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए के प्रभाव इतने व्यापक हैं कि वे पूरे समुदाय को प्रभावित कर सकते हैं।
कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि ऑनलाइन मनी गेमिंग से जुड़ी लत और आर्थिक नुकसान अब आम सामाजिक घटनाएं बन गई हैं और इनका समाज के बड़े तबके पर गहरा असर पड़ रहा है। कोर्ट ने यह माना कि ऐसे परिणाम सार्वजनिक शांति के लिए खतरा पैदा करते हैं। इस तरह यह मुद्दा 'सूची II की प्रविष्टि 1' के तहत राज्यों के विधायी अधिकार क्षेत्र में आ जाता है।
लत, डिप्रेशन और आत्महत्या: ऑनलाइन जुए का सार्वजनिक स्वास्थ्य पर असर
कोर्ट ने यह भी राय दी कि ऑनलाइन मनी गेमिंग सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए एक बड़ी चिंता का विषय है। कोर्ट ने कहा कि ऑनलाइन मनी गेमिंग से पैदा होने वाली लत और डिप्रेशन, साथ ही जुए में हुए नुकसान के कारण आत्महत्याओं की ख़बरें, यह संकेत देती हैं कि यह एक व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या है। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि इन परिणामों का असर केवल खेलने वाले व्यक्तियों तक ही सीमित नहीं रहता, बल्कि ये उनके परिवारों और पूरे समाज को प्रभावित करते हैं। इसलिए इस मामले में राज्य का हस्तक्षेप पूरी तरह से उचित है।
कोर्ट ने यह फैसला सुनाया,
"इसके अलावा, ऑनलाइन मनी गेमिंग की लत और उससे होने वाला डिप्रेशन, तथा जुए से जुड़ी आत्महत्याओं की लगातार सामने आ रही ख़बरें, इस बात का स्पष्ट संकेत हैं कि यह एक व्यापक सार्वजनिक स्वास्थ्य समस्या भी है। जैसा कि ऊपर दिए गए निर्णयों से स्पष्ट है, कोई भी ऐसी गतिविधि जो सार्वजनिक स्वास्थ्य के लिए हानिकारक हो, उसे नुकसान पहुंचाती हो, या जिससे स्पष्ट रूप से कोई सार्वजनिक बाधा (Nuisance) उत्पन्न होती हो, वह 'सार्वजनिक व्यवस्था' के अंतर्गत राज्य के अधिकार क्षेत्र में ही आएगी।"
इंटरनेट जुए से जुड़े अनोखे खतरे
कोर्ट ने 'अमित एम. नायर बनाम गुजरात राज्य' मामले में गुजरात हाई कोर्ट द्वारा इंटरनेट जुए के संबंध में व्यक्त की गई चिंताओं का भी ज़िक्र किया।
हाईकोर्ट ने यह टिप्पणी की थी कि इंटरनेट जुए से वही पुरानी चिंताएं फिर से उभर आती हैं, जो पारंपरिक रूप से जुए से जुड़ी रही हैं—जैसे कि लत, धोखाधड़ी और नैतिक मुद्दे; इसके साथ ही इंटरनेट जुए से कुछ अतिरिक्त खतरे भी पैदा हो गए हैं, क्योंकि अब बच्चे भी बहुत आसानी से जुए से जुड़ी वेबसाइटों तक पहुंच बना सकते हैं।
कोर्ट ने यह भी बताया कि तमिलनाडु में इस कानून को लागू करने से पहले 'जस्टिस के. चंद्रू समिति' का गठन किया गया था, जिसने ऑनलाइन गेमिंग और सट्टेबाजी के प्रभावों का गहन अध्ययन किया।
कोर्ट ने यह पाया कि समिति की रिपोर्ट में ऑनलाइन गेमिंग प्लेटफॉर्म से जुड़ी सट्टेबाजी के कारण होने वाले व्यापक नुकसानों के संबंध में कई अनुभवजन्य (Empirical) निष्कर्ष शामिल थे। कोर्ट ने इस तर्क को सिरे से खारिज कर दिया कि राज्य सरकार ने बिना किसी ठोस तथ्यात्मक आधार के यह कदम उठाया है। इसके विपरीत, कोर्ट ने यह माना कि इस कानून को बनाने के लिए पर्याप्त और प्रासंगिक सामग्री उपलब्ध थी। अंततः न्यायालय ने यह निर्णय दिया कि ऑनलाइन सट्टेबाजी और जुए की व्यापक उपलब्धता, उससे होने वाले सामाजिक नुकसान और सामुदायिक जीवन पर पड़ने वाले प्रभाव, राज्यों के लिए सार्वजनिक व्यवस्था से संबंधित अपनी विधायी शक्तियों का प्रयोग करने हेतु एक पर्याप्त आधार प्रदान करते हैं।
Case Title – State of Tamil Nadu & Ors. v. Junglee Games India Pvt. Ltd. & Ors. and connected cases

