चुने हुए प्रतिनिधि पुलिस या कोर्ट की भूमिका नहीं निभा सकते, जनता का जनादेश बेरोकटोक ताकत का ज़रिया नहीं: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
3 Oct 2026 1:56 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि चुने हुए प्रतिनिधि पुलिस, एडमिनिस्ट्रेटर या कोर्ट की भूमिका नहीं निभा सकते। कोर्ट ने ज़ोर दिया कि जनता के जनादेश को निजी अधिकार या दूसरों को आदेश देने या डराने-धमकाने की बेरोकटोक ताकत का ज़रिया नहीं माना जा सकता।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने कहा,
"लोकतंत्र वोट के ज़रिए ताकत देता है, लेकिन उस ताकत का इस्तेमाल कानून के दायरे में रहकर ही किया जा सकता है।"
बेंच ने कल्याण डोंबिवली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के एक कॉर्पोरेटर और तीन अन्य लोगों की ज़मानत रद्द करते हुए यह टिप्पणी की। इन लोगों पर म्युनिसिपल अस्पताल में डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ़ के साथ मारपीट करने का आरोप है।
जुलाई 2026 में कल्याण डोंबिवली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के चुने हुए कॉर्पोरेटर रमेश सुक्रिया म्हात्रे (प्रतिवादी नंबर 1/R1) ने तीन अन्य लोगों के साथ मिलकर लेबर वार्ड में ड्यूटी पर मौजूद तीन डॉक्टरों (जिनमें एक महिला डॉक्टर भी शामिल थीं) के साथ मारपीट की और उन्हें अपशब्द कहे। यह घटना लेबर पेन से गुज़र रही एक गर्भवती मरीज़ को दूसरी जगह ले जाने को लेकर हुए विवाद के कारण हुई।
म्हात्रे की ज़मानत रद्द करते हुए कोर्ट ने कहा कि यह गंभीर चिंता का विषय है, जब चुने हुए पदों पर बैठे लोग जनता के जनादेश को निजी अधिकार का ज़रिया मानते हैं और आदेश देने, डराने-धमकाने या अपनी मर्ज़ी थोपने की स्थिति में आ जाते हैं।
बेंच ने कहा कि एक चुने हुए प्रतिनिधि की ज़िम्मेदारी जनता की सेवा करना और उन संस्थाओं को मज़बूत करना है जिनके ज़रिए शिकायतों का समाधान किया जाता है और न्याय दिया जाता है। ऐसा प्रतिनिधि "पुलिस, एडमिनिस्ट्रेटर या कोर्ट की भूमिका निभाकर उन संस्थाओं की जगह नहीं ले सकता।"
कोर्ट ने आगे कहा कि डर या धमकी के ज़रिए अपनी बात मनवाने के लिए निजी प्रभाव का इस्तेमाल करने के नतीजे सिर्फ़ पीड़ित तक ही सीमित नहीं रहते, बल्कि इससे कानून के शासन में जनता का भरोसा कम होने का भी खतरा होता है।
बेंच ने इस बात पर ज़ोर दिया कि यह चिंता तब और भी अहम हो जाती है जब पीड़ित मेडिकल प्रोफ़ेशनल हों, जो नाज़ुक हालत वाले मरीज़ों, मेडिकल इमरजेंसी और तुरंत पेशेवर फ़ैसले लेने की ज़रूरत वाली स्थितियों में अपनी ड्यूटी निभाते हैं। लोकतंत्र में वोट के ज़रिए सत्ता मिलती है, लेकिन उस सत्ता का इस्तेमाल कानून के दायरे में रहकर ही किया जा सकता है। इसलिए यह गंभीर चिंता का विषय है जब चुने हुए पदों पर बैठे लोग जनता से मिले जनादेश को अपनी निजी सत्ता और बेलगाम ताकत का ज़रिया समझने लगते हैं और खुद को आदेश देने, डराने-धमकाने या अपनी मर्ज़ी थोपने की स्थिति में मान लेते हैं।
संवैधानिक व्यवस्था कानून से मिली सत्ता और किसी व्यक्ति के निजी प्रभाव के बीच एक स्पष्ट रेखा खींचती है। एक चुने हुए प्रतिनिधि को जनता की सेवा करने और उन संस्थाओं को मज़बूत करने की ज़िम्मेदारी सौंपी जाती है जिनके ज़रिए शिकायतों का समाधान होता है और न्याय मिलता है। वह पुलिस, प्रशासक या अदालत की भूमिका अपनाकर उन संस्थाओं की जगह नहीं ले सकता। डर या धमकी के ज़रिए अपनी बात मनवाने के लिए निजी प्रभाव का इस्तेमाल करने के नतीजे सिर्फ़ उस पीड़ित व्यक्ति तक सीमित नहीं रहते, बल्कि इससे कानून के शासन में जनता का भरोसा भी कम हो सकता है।
कोर्ट ने कहा कि ड्यूटी पर मौजूद मेडिकल प्रोफेशनल्स को डराने-धमकाने या उन पर हमला करने की कोशिशों को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता, खासकर तब जब ऐसे काम किसी चुने हुए पद पर बैठे व्यक्ति ने किए हों।
बेंच ने कहा,
"चुने हुए पद से मिली ताकत किसी भी नागरिक पर लागू होने वाले कानूनी नियमों को नजरअंदाज करने का आधार नहीं बन सकती।"
कॉर्पोरेटर और तीन अन्य की जमानत रद्द
इन बातों को ध्यान में रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने बॉम्बे हाई कोर्ट के उस आदेश को रद्द कर दिया जिसमें मजिस्ट्रेट द्वारा चार आरोपियों को दी गई जमानत बहाल की गई। कोर्ट ने उन्हें 5 अक्टूबर, 2026 तक या उससे पहले ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया। साथ ही हालात में कोई बड़ा बदलाव होने पर जमानत की अर्जी दोबारा दाखिल करने की छूट भी दी।
यह मामला जुलाई 2026 की एक घटना से जुड़ा है, जब कॉर्पोरेटर रमेश सुक्रिया म्हात्रे और तीन अन्य लोगों ने कथित तौर पर म्युनिसिपल अस्पताल के लेबर वार्ड में ड्यूटी पर मौजूद तीन डॉक्टरों (जिनमें एक महिला डॉक्टर भी शामिल थीं) के साथ मारपीट और बदसलूकी की। बताया जाता है कि यह घटना लेबर पेन से गुजर रही एक गर्भवती मरीज को शिफ्ट करने को लेकर हुए विवाद के बाद हुई।
महाराष्ट्र सरकार ने आरोपियों को जमानत देने के हाईकोर्ट के फैसले को चुनौती दी थी, जबकि शुरुआत में हाई कोर्ट ने मजिस्ट्रेट के जमानत आदेश पर रोक लगाई थी। राज्य सरकार का तर्क था कि हाईकोर्ट ने ऐसी कोई नई बात या हालात नहीं बताए, जो उसके पहले के शुरुआती आकलन (प्राइमा फेसी असेसमेंट) से अलग फैसला लेने का कारण बनते।
सुप्रीम कोर्ट ने माना कि हाईकोर्ट ने दोनों आदेशों में विरोधाभासी रवैया अपनाया और यह नहीं बताया कि हालात में क्या बदलाव आया। कोर्ट ने म्हात्रे के आपराधिक इतिहास पर भी गौर किया, जिसमें 18 मामले दर्ज थे, और इस आशंका पर भी ध्यान दिया कि उनके प्रभाव से मुख्य गवाह प्रभावित हो सकते हैं, भले ही वे 16 मामलों में बरी या डिस्चार्ज हो चुके हों।
बेंच ने इस बात पर भी चिंता जताई कि म्हात्रे अपनी पुलिस और न्यायिक हिरासत के दौरान जिला सिविल अस्पताल के जेल वार्ड में भर्ती रहे, जिससे वे जेल में बंद रहने से काफी हद तक बचते रहे।
पीड़ित डॉक्टरों के डर के कारण इस्तीफा देने या ड्यूटी से दूर रहने की खबरों पर ध्यान देते हुए कोर्ट ने कहा कि मेडिकल बिरादरी पर इस कथित व्यवहार का असर, डराने-धमकाने की आशंका का आकलन करने के लिए सीधे तौर पर अहम है। कोर्ट ने पालघर में डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों पर कथित हमले की एक अलग घटना का भी ज़िक्र किया और कहा कि इससे मेडिकल प्रोफेशनल्स के बीच असुरक्षा की भावना को लेकर चिंता और बढ़ गई।
कोर्ट ने महाराष्ट्र सरकार को निर्देश दिया कि वह स्वतंत्र रूप से जांच करे कि क्या लागू निवारक हिरासत कानूनों (Preventive Detention Laws) के प्रावधान इस मामले में लागू होते हैं या नहीं।
कोर्ट ने स्पेशल फास्ट ट्रैक कोर्ट को मुकदमे की सुनवाई जल्द पूरी करने की कोशिश करने का निर्देश दिया और अभियोजन पक्ष से कहा कि वह 64 गवाहों की अपनी सूची की समीक्षा करे और उन गवाहों को हटा दे, जिनकी गवाही ज़रूरी नहीं है। ट्रायल कोर्ट को यह भी निर्देश दिया गया कि वह महाराष्ट्र गवाह संरक्षण और सुरक्षा अधिनियम, 2017 के तहत अहम गवाहों, खासकर डॉक्टरों और अस्पताल के कर्मचारियों की पर्याप्त सुरक्षा सुनिश्चित करे।
यह स्पष्ट करते हुए कि उसकी टिप्पणियों से मेडिकल प्रोफेशनल्स को लापरवाही या कर्तव्य में कोताही बरतने की कोई छूट नहीं मिलती, कोर्ट ने कहा कि ऐसी किसी भी घटना से भी कानून के अनुसार सख्ती से निपटा जाना चाहिए।
Case Title : State of Maharashtra v. Ramesh Sukrya Mhatre & Ors

