बच्चों की तस्करी को हल्के में न लें, पूरे देश में गिरोह सक्रिय हैं: सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के गृह सचिवों से कहा

Shahadat

9 April 2026 9:12 AM IST

  • बच्चों की तस्करी को हल्के में न लें, पूरे देश में गिरोह सक्रिय हैं: सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों के गृह सचिवों से कहा

    सुप्रीम कोर्ट ने राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों से आग्रह किया कि वे बच्चों की तस्करी को हल्के में न लें। साथ ही इस बात पर ज़ोर दिया कि यह मुद्दा कानून-व्यवस्था से जुड़ी गंभीर चिंताओं वाला है और इस पर राज्य के अधिकारियों के स्तर पर तत्काल कार्रवाई की ज़रूरत है।

    जस्टिस जेबी पारदीवाला ने कहा,

    "कृपया इस मुद्दे को बहुत-बहुत गंभीरता से लें। बच्चों की तस्करी बेकाबू हो चुकी है। पूरे देश में गिरोह सक्रिय हैं। अगर आप सभी इस पर ध्यान नहीं देंगे तो हालात काबू से बाहर हो जाएंगे। इस मामले में केवल राज्य सरकार और उसका गृह विभाग ही पूरी मुस्तैदी से कार्रवाई कर सकता है। एक अदालत के तौर पर हम निगरानी कर सकते हैं, लेकिन आखिरकार कार्रवाई तो राज्य सरकार, पुलिस और अन्य एजेंसियों को ही करनी होगी। इसलिए यह हमारा विनम्र अनुरोध है।"

    जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस केवी विश्वनाथन की खंडपीठ ने ऑनलाइन पेश हुए गृह सचिवों से बातचीत करते हुए कहा कि तस्करी के नेटवर्क पूरे देश में सक्रिय हैं। इस बात पर ज़ोर दिया कि राज्य की मशीनरी को ही प्रभावी कार्रवाई करनी होगी।

    जस्टिस विश्वनाथन ने भी जस्टिस पारदीवाला की बात दोहराते हुए कहा,

    "यह बहुत ही गंभीर मामला है। हम रोज़ाना ऐसी रिपोर्टों में बढ़ोतरी देख रहे हैं। कभी-कभी हमें बच्चों को बचाए जाने की रिपोर्टें भी मिलती हैं। इसका मतलब है कि इस समस्या से निपटा जा सकता है। इसके लिए बस एक पक्के इरादे की ज़रूरत है। यह काम आप सभी को करना है, जो गृह विभाग के प्रमुख हैं। इसलिए कृपया इसे पूरी गंभीरता और लगन से करें। हम निगरानी करते रहेंगे और ज़रूरी निर्देश भी देंगे, लेकिन आखिरकार उन निर्देशों को लागू तो आपको ही अपने स्तर पर करना होगा।"

    अदालत ने कई राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को बच्चों की तस्करी से निपटने के लिए 15 अप्रैल, 2025 को दिए गए अपने फैसले में जारी निर्देशों का पालन करने का आखिरी मौका दिया। अदालत ने चेतावनी दी कि अगर उन्होंने निर्देशों के पालन की रिपोर्ट जमा नहीं की तो उन्हें "निर्देशों का पालन न करने वाले" (डिफॉल्टिंग) राज्यों की श्रेणी में रखा जाएगा।

    अदालत तस्करी के खिलाफ कानून को सख्ती से लागू करने के लिए कुछ खास संस्थागत उपाय करने के निर्देशों के पालन की निगरानी कर रही थी।

    अदालत ने 15 अप्रैल, 2025 को बच्चों की तस्करी से जुड़े एक मामले में आरोपी व्यक्तियों की ज़मानत रद्द कर दी थी। ऐसे अपराधों की समय-सीमा के भीतर जांच और सुनवाई सुनिश्चित करने के लिए पूरे देश पर लागू होने वाले निर्देश जारी किए। कोर्ट ने सभी हाई कोर्ट्स को निर्देश दिया कि वे लंबित ट्रायल्स का डेटा इकट्ठा करें और छह महीने के अंदर, हो सके तो रोज़ाना के आधार पर, उन्हें पूरा करने के लिए सर्कुलर जारी करें, और इसकी रिपोर्ट दें कि निर्देशों का पालन हुआ है या नहीं।

    कोर्ट ने सभी राज्यों को यह भी निर्देश दिया कि वे भारतीय इंस्टीट्यूट ऑफ़ रिसर्च एंड डेवलपमेंट (BIRD) की 12 अप्रैल, 2023 की रिपोर्ट की सिफ़ारिशों को लागू करें। इन सिफ़ारिशों में लापता बच्चों के मामलों को तब तक मानव तस्करी का मामला मानना ​​शामिल है, जब तक कि इसके विपरीत कुछ साबित न हो जाए। साथ ही मानव तस्करी विरोधी इकाइयों को मज़बूत करना, जांच के मानकों में सुधार करना और पीड़ितों की सुरक्षा सुनिश्चित करना भी शामिल है।

    जब इस मामले की पिछली सुनवाई 26 फरवरी, 2026 को हुई तो कोर्ट ने पाया कि इन निर्देशों का बड़े पैमाने पर पालन नहीं किया गया। कोर्ट ने यह भी पाया कि कई राज्यों ने निर्देशों के पालन से जुड़े हलफ़नामे (Affidavits) दाखिल नहीं किए। साथ ही कहा कि कुछ राज्यों द्वारा जमा की गई रिपोर्टें भी "सिर्फ़ दिखावा" थीं। इसके बाद कोर्ट ने निर्देशों का पालन न करने वाले राज्यों के गृह सचिवों को कोर्ट में पेश होने का निर्देश दिया और सभी राज्यों से कहा कि वे चार हफ़्तों के अंदर समीक्षा समितियाँ गठित करें और एक तय फ़ॉर्मेट में नई रिपोर्टें दाखिल करें।

    बुधवार को इसी प्रक्रिया को आगे बढ़ाते हुए कोर्ट ने ऑनलाइन पेश हुए गृह सचिवों को संबोधित किया और निर्देशों के पालन की गंभीरता पर ज़ोर दिया।

    शुरुआत में, कोर्ट ने पाया कि मध्य प्रदेश ने तय फ़ॉर्मेट में अपनी रिपोर्ट दाखिल नहीं की थी। राज्य के गृह सचिव ऑनलाइन पेश हुए थे। उन्होंने माफ़ी मांगी और कोर्ट को भरोसा दिलाया कि एक पूरी रिपोर्ट जल्द ही दाखिल कर दी जाएगी। कोर्ट ने उन्हें 18 अप्रैल, 2026 तक हलफ़नामा दाखिल करने का एक आख़िरी मौक़ा दिया।

    इसके बाद कोर्ट ने पाया कि गोवा, हरियाणा, लक्षद्वीप, मिज़ोरम, ओडिशा और पंजाब भी तय फ़ॉर्मेट में रिपोर्ट दाखिल करने में नाकाम रहे हैं।

    जस्टिस पारदीवाला ने कहा,

    "आप इस मुद्दे की गंभीरता को कम करके क्यों आँक रहे हैं?"

    यह भी कहा कि रिपोर्टें पहले ही दाखिल कर दी जानी चाहिए थीं।

    हरियाणा ने बताया कि उसने पहले ही अनुपालन रिपोर्ट दाखिल की और एक समीक्षा समिति का गठन भी किया। हालांकि, कोर्ट ने पाया कि निर्धारित प्रारूप का पालन नहीं किया गया।

    अंतिम अवसर देते हुए कोर्ट ने ऐसे सभी राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को निर्देश दिया कि वे 18 अप्रैल, 2026 को या उससे पहले निर्धारित प्रारूप में अनुपालन हलफनामे दाखिल करें, और उनकी प्रतियां एमिक्स क्यूरी को सौंपें। कोर्ट ने कहा कि यदि निर्धारित समय सीमा तक हलफनामे दाखिल नहीं किए जाते हैं तो संबंधित राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों को चूककर्ता माना जाएगा।

    कोर्ट ने अपने पिछले निर्देश के अनुपालन की भी समीक्षा की, जिसमें राज्यों को बाल तस्करी की आशंका वाले संवेदनशील क्षेत्रों की पहचान करने और उन पर निगरानी रखने के लिए समीक्षा समितियों का गठन करने को कहा गया था। एमिक्स क्यूरी ने कोर्ट को सूचित किया कि 15 राज्यों ने अभी तक ऐसी समितियों का गठन नहीं किया।

    कोर्ट ने इन राज्यों को भी अंतिम अवसर दिया और निर्देश दिया कि 18 अप्रैल तक दाखिल किए जाने वाले हलफनामों में इन समितियों के गठन और कामकाज का विस्तृत विवरण दिया जाए।

    कोर्ट 'असिस्टेड रिप्रोडक्टिव टेक्नोलॉजी (विनियमन) अधिनियम, 2021' के कार्यान्वयन के मुद्दे पर भी सुनवाई कर रहा है, जिसका उद्देश्य अंडे दान करने वाले उन अवैध गिरोहों पर नकेल कसना है, जो आर्थिक रूप से कमजोर महिलाओं को कानून का उल्लंघन करते हुए बार-बार यह प्रक्रिया करवाने के लिए उकसाते हैं। कोर्ट ने बुधवार को एमिक्स क्यूरी अपर्णा भट को इस संबंध में भारत संघ द्वारा दाखिल किए गए हलफनामे की जांच करने के लिए समय दिया।

    अब इस मामले की अगली सुनवाई 29 अप्रैल, 2026 को होगी।

    Case Title – Pinki v. State of Uttar Pradesh and Anr.

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