डिफ़ॉल्ट के कारण किसी मुक़दमे का खारिज होना 'रेस ज्यूडिकाटा' के तौर पर काम नहीं करता: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
27 March 2026 9:08 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने फैसला दिया कि डिफ़ॉल्ट के कारण किसी मुक़दमे का खारिज होना 'रेस ज्यूडिकाटा' (Res Judicata) के तौर पर काम नहीं करता, क्योंकि इसमें मामले के गुण-दोष पर कोई निर्णय नहीं होता। हालांकि, कोर्ट ने स्पष्ट किया कि कोई ऐसा वादी जिसे अपना दावा आगे बढ़ाने का अवसर मिला था, लेकिन जिसने बार-बार कार्यवाही को खारिज होने दिया, उसे न्यायसंगत सिद्धांतों के आधार पर राहत से वंचित किया जा सकता है, क्योंकि ऐसा आचरण कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जा सकता है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की खंडपीठ ने एक संपत्ति विवाद में अपील खारिज करते हुए यह फैसला दिया कि हालांकि इस मामले में 'रेस ज्यूडिकाटा' का सिद्धांत लागू नहीं होता, फिर भी पिछली मुक़दमेबाज़ी को बीच में ही छोड़ देने के कारण अपीलकर्ताओं को अब निष्पादन (Execution) की कार्यवाही के माध्यम से डिक्री को लागू करने से रोक दिया गया।
तथ्यात्मक पृष्ठभूमि
सुप्रीम कोर्ट के समक्ष अपीलकर्ता वे मूल वादी और डिक्री-धारक थे, जिन्होंने 1988 में 'विशिष्ट पालन' (Specific Performance) के लिए एक मुक़दमा दायर किया था। उन्होंने 15 दिसंबर, 1986 को हैदराबाद स्थित एक अचल संपत्ति के कुछ हिस्से के संबंध में संपत्ति के मालिक के बेटे के साथ एक 'बिक्री का समझौता' (Agreement for Sale) किया था। फिर जब विक्रेता ने कथित तौर पर अपने दायित्वों को पूरा नहीं किया तो उन्होंने उस समझौते को लागू करवाने की मांग की।
ट्रायल कोर्ट ने अक्टूबर, 1998 में 'विशिष्ट पालन' के मुक़दमे को वादी के पक्ष में डिक्री करते हुए बिक्री विलेख (Sale Deed) के निष्पादन और संपत्ति पर कब्ज़ा सौंपने का निर्देश दिया। यह डिक्री अंतिम रूप से मान्य हो गई और वादियों ने संपत्ति पर कब्ज़ा प्राप्त करने के लिए निष्पादन की कार्यवाही शुरू की।
निष्पादन के चरण में कुछ ऐसे तीसरे पक्ष (Third Parties)—जो मूल मुक़दमे में पक्षकार नहीं थे—ने जुलाई 1990 में निष्पादित बिक्री विलेखों के आधार पर उसी संपत्ति के कुछ हिस्सों पर अपना स्वतंत्र स्वामित्व (Title) होने का दावा करते हुए आपत्तियां दायर कीं और संपत्ति पर कब्ज़ा सौंपने का विरोध किया। उन्होंने तर्क दिया कि उनका स्वामित्व मूल मालिक द्वारा किए गए एक कथित 'मौखिक उपहार' (Oral Gift) से प्राप्त हुआ है, और यह दावा किया कि वादियों द्वारा प्राप्त की गई डिक्री उन पर बाध्यकारी नहीं है।
महत्वपूर्ण बात यह है कि वादियों (जो बाद में सुप्रीम कोर्ट में अपीलकर्ता बने) ने पहले उन्हीं बिक्री विलेखों को रद्द करवाने के लिए अलग से मुक़दमे दायर किए। हालांकि, दोनों ही मुक़दमे कोर्ट में उपस्थित न होने के कारण 'डिफ़ॉल्ट' की श्रेणी में आते हुए खारिज कर दिए गए। यहाँ तक कि उन्हें फिर से बहाल (Restoration) करने के लिए दायर किए गए उनके आवेदन भी खारिज हो गए।
परिणामस्वरूप, स्वामित्व (Title) से संबंधित विरोधी दावों पर गुण-दोष के आधार पर कोई निर्णय नहीं हो पाया। निष्पादन न्यायालय ने तीसरे पक्षों की आपत्तियों को खारिज कर दिया, लेकिन अपीलीय न्यायालय ने उस आदेश को रद्द कर दिया और यह माना कि डिक्री-धारकों को आपत्तिकर्ताओं के खिलाफ अपने अधिकारों को स्थापित करने के लिए एक अलग मुकदमा दायर करना होगा। हाईकोर्ट ने इस दृष्टिकोण की पुष्टि की। इससे व्यथित होकर डिक्री-धारक अपीलकर्ताओं के रूप में सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
सुप्रीम कोर्ट का निष्कर्ष
सुप्रीम कोर्ट ने यह टिप्पणी की कि यद्यपि वादी की अनुपस्थिति के कारण चूक (default) के आधार पर किसी मुकदमे की बर्खास्तगी, किसी नए मुकदमे को रोकने के लिए 'रेस ज्यूडिकाटा' (Res Judicata) के रूप में कार्य नहीं करती। फिर भी एक ऐसा वादी जिसे मुकदमा बहाल करवाने या नया मुकदमा दायर करने का अवसर मिलने के बावजूद, वह उन उपायों को आगे बढ़ाने में विफल रहता है या उन्हें छोड़ देता है, उसे बाद में उसी 'कॉज़ ऑफ़ एक्शन' (मुकदमे के आधार) पर निष्पादन कार्यवाही में उस उपाय को फिर से उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती है।
न्यायालय ने टिप्पणी की,
“यद्यपि चूक के आधार पर बर्खास्तगी CPC की धारा 11 के तहत कड़े अर्थों में 'रेस ज्यूडिकाटा' का गठन नहीं कर सकती। फिर भी अपीलकर्ताओं का पहले के मुकदमों को छोड़ देने का आचरण—जबकि उन्होंने उन मुकदमों में अपना पक्ष मजबूती से रखा था—कुछ व्यापक सिद्धांतों को आकर्षित करता है, जो 'नेमो डेबेट बिस वेक्सारी, सी कॉन्स्टेट क्यूरियाए क्वॉड सिट प्रो उना एट ईडेम कॉज़ा' (किसी भी व्यक्ति को एक ही कारण के लिए दो बार परेशान नहीं किया जाना चाहिए) के सिद्धांत के समान हैं। कोई भी वादी, जिसने किसी मुद्दे पर निर्णय के लिए प्रक्रिया शुरू की हो। बाद में उसे आगे न बढ़ाने का निर्णय लिया हो, उसे बाद के चरण में—विशेषकर संपार्श्विक (Collateral) या निष्पादन कार्यवाही में—उसी विवाद को फिर से उठाने की अनुमति नहीं दी जा सकती। वह भी तब, जब वह विरोधी पक्षों की पीठ पीछे कोई आदेश प्राप्त करने का प्रयास कर रहा हो।”
जस्टिस दीपांकर दत्ता द्वारा लिखे गए इस निर्णय में, उस निष्कर्ष से असहमति व्यक्त की गई कि अपीलकर्ता को विक्रय-पत्रों (Sale Deeds) को चुनौती देने के लिए एक अलग मुकदमा दायर करने की आवश्यकता थी—विशेषकर CPC के आदेश XXI नियम 101 के आलोक में, जो निष्पादन न्यायालय को अधिकार, हक या हित से संबंधित सभी प्रश्नों का निर्णय करने का अधिकार देता है। इसके बावजूद, न्यायालय ने निष्पादन कार्यवाही में अपीलकर्ता की आपत्तियों की बर्खास्तगी को इस आधार पर सही ठहराया कि अपीलकर्ता ने प्रतिवादियों के पक्ष में किए गए विक्रय-पत्रों को रद्द करवाने के लिए उपलब्ध पहले के उपायों को आगे बढ़ाने में जानबूझकर चूक की थी।
अदालत ने टिप्पणी की,
“इसके अलावा, अपीलकर्ताओं के आचरण की आलोचना करना भी गलत नहीं होगा, क्योंकि यह अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जा सकता है। बिक्री-पत्रों (Sale Deeds) के खिलाफ अपनी पिछली चुनौती को अंतिम रूप लेने देने के बाद वे अब निष्पादन (Execution) के चरण में उसी मुद्दे को फिर से उठाने की कोशिश नहीं कर सकते। ऐसा प्रयास अस्वीकार्य है। अदालत की प्रक्रिया का उपयोग उस चीज़ को फिर से जीवित करने के लिए नहीं किया जा सकता, जिसे पहले ही जान-बूझकर छोड़ दिया गया हो।”
अदालत ने अपीलकर्ता के आचरण और उसकी नेकनीयती (Bona Fides) पर यह देखते हुए सवाल उठाया कि मुकदमों का विरोध करने और बहाली की कार्यवाही को आगे बढ़ाने के पर्याप्त अवसर होने के बावजूद, अपीलकर्ता बार-बार उन्हें आगे बढ़ाने में विफल रहा। इसलिए वह अब निष्पादन की कार्यवाही के दौरान प्रतिवादियों के पक्ष में बिक्री-पत्र के निष्पादन को चुनौती नहीं दे सकता।
अदालत ने टिप्पणी की,
“पिछली मुकदमों को ठीक से आगे न बढ़ाना, या कानून में उपलब्ध आगे के उपायों का पालन करके खारिज होने के बाद उनकी बहाली की मांग न करना, अपीलकर्ताओं की नेकनीयती और समग्र आचरण का आकलन करते समय एक प्रासंगिक परिस्थिति है... बार-बार मुकदमों को आगे न बढ़ाना (Non-Prosecution) को केवल कार्यवाही को आगे बढ़ाने की पहल की कमी के रूप में खारिज नहीं किया जा सकता। इसके विपरीत, यह दर्शाता है कि अपीलकर्ता संदिग्ध तरीकों का सहारा लेकर (ऐसे मुकदमों में प्रतिवादियों पर) बढ़त बनाना चाहते थे, जान-बूझकर सीधी कार्यवाही से बचते रहे और इसके बजाय ऐसी कार्यवाही के माध्यम से आदेश प्राप्त किए जिनमें वे पक्षकार नहीं थे।”
यह फैसला अमरुद्दीन अंसारी बनाम अफजल अली 2025 LiveLaw (SC) 488 के फैसले को स्पष्ट करता है, जिसमें अदालत ने माना कि चूक (Default) के कारण किसी मुकदमे की बर्खास्तगी, एक नया मुकदमा दायर करने से नहीं रोकती, क्योंकि यह गुणों (Merits) पर आधारित निर्णय नहीं है। इस पर 'रेस ज्यूडिकाटा' (Res Judicata) का सिद्धांत लागू नहीं होता।
हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि यह सिद्धांत वहां लागू नहीं होगा, जहां वादी जान-बूझकर उपलब्ध उपायों, जैसे कि बहाली या फिर से फाइल करने का पालन करने में विफल रहता है और बार-बार कार्यवाही को आगे न बढ़ाने के कारण खारिज होने देता है।
तदनुसार, यह मानते हुए अपील खारिज की गई कि “अपीलकर्ता निष्पादन की कार्यवाही के माध्यम से डिक्री (आदेश) का लाभ उठाने से वंचित हैं, क्योंकि उन्होंने (मूल मुकदमों को) आगे न बढ़ाने का विकल्प चुना था... अपीलीय अदालत द्वारा इसे सही ढंग से रोका और विफल किया गया।”
यह मानते हुए कि अपीलकर्ताओं का आचरण अदालत की प्रक्रिया का दुरुपयोग था, सुप्रीम कोर्ट ने अपीलीय अदालत और हाईकोर्ट का अंतिम निष्कर्ष बरकरार रखा- हालांकि उनके द्वारा दिए गए कारणों से अलग कारणों के आधार पर- और अपील खारिज की। साथ ही पक्षों को निर्देश दिया कि वे अपना-अपना खर्च स्वयं वहन करें।
Cause Title: SHARADA SANGHI & ORS. VS. ASHA AGARWAL & ORS.

