शर्तें स्पष्ट हों तो पक्षकारों के बाद के व्यवहार के आधार पर डीड का दोबारा मतलब नहीं निकाला जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
27 Feb 2026 10:00 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने लीज़ डीड की शर्तों के साफ़ और साफ़ होने पर पक्षकारों के बाद के व्यवहार पर भरोसा करने के खिलाफ चेतावनी दी। कोर्ट ने कहा है कि डीड पर सही तरीके से बनी लीज़ को पक्षकारों के बाद के व्यवहार के आधार पर बदला या कमज़ोर नहीं किया जा सकता।
कोर्ट ने कहा,
“शर्तें बनने के बाद पैदा हुए हालात से पक्षकारों के इरादे का अंदाज़ा लगाते समय कोर्ट को बहुत ज़्यादा संयम बरतना चाहिए। क्योंकि, व्यवहार न तो डॉक्यूमेंट के असल मतलब से मेल खाता है और न ही उसके मकसद से।”
जस्टिस पंकज मित्तल और जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी की बेंच एक ऐसे मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें उड़ीसा हाईकोर्ट ने पार्टियों के बाद के व्यवहार, खासकर क्रॉस-एग्जामिनेशन के दौरान दिए गए बयानों, जिनसे पता चलता है कि लीज़ देने वाले का प्रॉपर्टी पर असरदार कंट्रोल और कब्ज़ा बना हुआ, उस पर भरोसा करते हुए यह नतीजा निकाला कि रजिस्टर्ड लीज़ डीड असल में एक लाइसेंस है।
हाईकोर्ट के फैसले से सहमत न होते हुए कोर्ट ने कहा कि जब डीड की शर्तें साफ़ और बिना किसी शक के इसे लीज़ डीड बताती थीं तो हाईकोर्ट ने पक्षकारों के बाद के व्यवहार के आधार पर डीड के नेचर को बदलने में गलती की, बिना डीड के टेक्स्ट और कॉन्टेक्स्ट पर ध्यान दिए, जिसने डीड को लीज़ डीड के तौर पर साबित किया।
कोर्ट ने कहा,
“इसमें कोई शक नहीं है कि सिर्फ़ डॉक्यूमेंट का नाम ही डॉक्यूमेंट के नेचर का फैसला करने वाला फैक्टर नहीं है; यह टेक्स्ट और कॉन्टेक्स्ट ही हैं, जो पक्षकारों द्वारा लिखे गए डॉक्यूमेंट के लिए उठाए गए दायित्वों को दिखाते हैं।”
इसलिए अपील मंज़ूर की गई।
Cause Title: THE GENERAL SECRETARY, VIVEKANANDA KENDRA VERSUS PRADEEP KUMAR AGARWALLA AND OTHERS

