DDA के पास मामलों की स्क्रीनिंग के लिए लिटिगेशन पॉलिसी होनी चाहिए ताकि बेवजह की फाइलिंग से बचा जा सके: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
21 Jan 2026 4:18 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (DDA) पर यह देखते हुए 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया कि इस मामले में DDA की तरफ से आदेशों को चुनौती देने में लगातार देरी हो रही है। कोर्ट ने यह भी कहा कि DDA से उम्मीद की जाती है कि उसके पास एक लिटिगेशन पॉलिसी हो, जहां मामलों की स्क्रीनिंग हो सके, ताकि मामलों की ऐसी देरी से फाइलिंग से बचा जा सके और न्यायिक समय बचाया जा सके।
जस्टिस बीवी नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की बेंच रोहिणी रेजिडेंशियल स्कीम के तहत MIG प्लॉट के अलॉटमेंट से जुड़े एक मामले की सुनवाई कर रही थी, जिसमें DDA ने 235 दिनों की देरी के बाद स्पेशल लीव पिटीशन दायर की। कोर्ट ने पाया कि दिल्ली हाई कोर्ट ने भी उसकी लेट पेटेंट अपील को 685 दिनों की देरी के कारण खारिज किया और सिंगल जज के सामने रिव्यू पिटीशन दायर करने में 577 दिनों की देरी हुई।
बेंच ने कहा कि देरी माफ करने के लिए DDA द्वारा दिया गया स्पष्टीकरण न तो "संतोषजनक" है और न ही "कानून के अनुसार पर्याप्त" है।
"इस मामले में याचिकाकर्ता/दिल्ली डेवलपमेंट अथॉरिटी (DDA) की तरफ से आदेशों को चुनौती देने में लगातार देरी हो रही है। हमें नहीं लगता कि याचिकाकर्ता को सिर्फ इसलिए कोई रियायत दी जानी चाहिए, क्योंकि वह एक डेवलपमेंट अथॉरिटी है। हम पाते हैं कि इस मामले में देरी उसके तर्कों के संबंध में घातक है। इसलिए स्पेशल लीव पिटीशन को देरी के आधार पर खारिज किया जाता है और याचिकाकर्ता को आज से छह सप्ताह के भीतर सुप्रीम कोर्ट लीगल सर्विसेज कमेटी को 10,000 रुपये का जुर्माना देना होगा।"
इसलिए कोर्ट ने देरी माफ करने के लिए उसकी अर्जी खारिज की। कोर्ट ने यह भी पाया कि इस मामले में देरी घातक है, इसलिए 10,000 रुपये का जुर्माना लगाया।
कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि DDA को कुछ लिटिगेशन पॉलिसी अपनानी चाहिए ताकि ऐसी देरी से फाइलिंग से बचा जा सके:
"यह उम्मीद की जाती है कि DDA के पास एक लिटिगेशन पॉलिसी और मामलों की स्क्रीनिंग होनी चाहिए, जिन्हें संबंधित फोरम के सामने उठाया जाना है ताकि सीधे तौर पर ऐसे मामलों को देरी से फाइल करके मामलों की संख्या बढ़ने और न्यायिक समय की बर्बादी से बचा जा सके।"
पिछले कुछ महीनों में सुप्रीम कोर्ट की बेंचों ने केंद्र सरकार को बार-बार चेतावनी दी है कि वे तय समय सीमा के अंदर कोर्ट में आएं।
शिवम्मा मामले में जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस आर महादेवन की बेंच ने हाईकोर्ट्स को चेतावनी दी कि वे प्रशासनिक सुस्ती और लापरवाही के आधार पर राज्य एजेंसियों की बहुत ज़्यादा देरी को माफ़ न करें। इस मामले में उन्हें कर्नाटक हाईकोर्ट का आदेश रद्द करना पड़ा, जिसने कर्नाटक हाउसिंग बोर्ड द्वारा एक फैसले के खिलाफ दूसरी अपील दायर करने में 11 साल की देरी को माफ़ कर दिया था।
Case Details: DELHI DEVELOPMENT AUTHORITY v. SHILYA & ORS|SPECIAL LEAVE PETITION (CIVIL) Diary No(s). 74139/2025

