वादी ने जब ऐसी कोई मांग नहीं की हो तो कोर्ट उसे 'इंजंक्शन' के बदले मुआवज़ा लेने के लिए मजबूर नहीं कर सकता: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
22 Jun 2026 3:38 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अपीलीय कोर्ट के लिए कानूनी तौर पर यह सही नहीं है कि वह ऐसी राहत दे, जिसके लिए याचिका में कोई मांग नहीं की गई हो। साथ ही अपीलीय कोर्ट डिक्री रद्द करने के बाद मामले को एग्जीक्यूटिंग कोर्ट (फैसला लागू करने वाली अदालत) के पास ऐसे मुद्दों पर फैसले के लिए नहीं भेज सकता जो किसी मौजूदा डिक्री से पैदा नहीं हुए हों।
जस्टिस एस.वी.एन. भट्टी और जस्टिस अतुल एस. चंदुरकर की बेंच ने पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया। हाईकोर्ट ने कथित अतिक्रमण हटाने के आदेश वाली डिक्री को बदलकर वादियों को मुआवज़ा देने का आदेश दिया था।
यह विवाद वादी द्वारा प्रतिवादियों के खिलाफ दायर दो सिविल मुकदमों से शुरू हुआ था। इसमें कथित तौर पर अतिक्रमण करने वाली दीवार और उसके घर की दीवार पर बने लिंटेल को हटाने की मांग की गई। ट्रायल कोर्ट ने दोनों मुकदमों में डिक्री जारी करते हुए ढांचे को हटाने और आगे निर्माण पर रोक लगाने का आदेश दिया। पहली अपीलीय अदालत ने इन डिक्री को बरकरार रखा।
दूसरी अपील में, पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने प्रतिवादियों को मुआवज़ा देने और विवादित दीवार को 'कॉमन वॉल' (साझा दीवार) मानने का आदेश देकर डिक्री में बदलाव किया। 2013 में सुप्रीम कोर्ट ने CPC की धारा 100 के तहत कानून के अहम सवालों को तय न करने के कारण उन फैसलों को रद्द किया और मामलों को वापस भेज दिया।
मामला वापस भेजे जाने पर हाईकोर्ट ने फिर से डिक्री रद्द की और एग्जीक्यूटिंग कोर्ट को निर्माण की कीमत का आकलन करने और वादियों को मुआवज़ा देने का आदेश दिया। इससे असंतुष्ट होकर मूल वादी के कानूनी उत्तराधिकारी एक बार फिर सुप्रीम कोर्ट पहुंचे।
अपील को मंज़ूरी देते हुए जस्टिस चंदुरकर द्वारा लिखे गए फैसले में कहा गया कि हाईकोर्ट ने दो मामलों में गलती की। पहला, उसने अपीलकर्ता-वादियों को पैसे के रूप में मुआवज़ा लेने के लिए मजबूर किया, जबकि याचिका में ऐसी कोई राहत नहीं मांगी गई। दूसरा, उसने वादियों के पक्ष में डिक्री रद्द करने के बाद मुआवज़ा तय करने के लिए दीवार की कीमत का आकलन करने का गलत आदेश एग्जीक्यूटिंग कोर्ट को दिया।
कोर्ट ने कहा कि एक बार डिक्री रद्द हो जाने के बाद कोई भी लागू करने योग्य डिक्री नहीं बची, इसलिए एग्जीक्यूटिंग कोर्ट के लिए ऐसी कोई कार्रवाई करने का कोई आधार नहीं रह गया।
कोर्ट ने कहा,
“मूल वादी ने प्रतिवादियों द्वारा किए गए अतिक्रमण के लिए उनसे किसी भी तरह के हर्जाने या मुआवज़े की मांग नहीं की थी। जब मूल वादी ने ऐसी कोई राहत नहीं मांगी तो हाईकोर्ट उसके कानूनी उत्तराधिकारियों को मुआवज़ा लेने के लिए मजबूर करके उसके पक्ष में पारित डिक्री रद्द नहीं कर सकता। यह मुआवज़ा किसी वैल्यूअर द्वारा तय किया जाना था। वादी के कानूनी उत्तराधिकारियों ने इस तरीके को अपनाने के लिए सहमति नहीं दी थी। इसलिए हाईकोर्ट बिना किसी ऐसी मांग के एक पक्ष को मुआवज़ा दिलाने के लिए दूसरे पक्ष को नुकसान पहुँचाने वाला ऐसा कदम नहीं उठा सकता।”
कोर्ट ने आगे कहा,
“एक बार जब ट्रायल कोर्ट द्वारा वादी के पक्ष में पारित डिक्री को (हाईकोर्ट द्वारा) रद्द कर दिया गया तो एग्जीक्यूटिंग कोर्ट के लिए निष्पादन की कार्यवाही को आगे बढ़ाने का कोई कारण नहीं रह जाता, क्योंकि निष्पादन के लिए कोई डिक्री मौजूद नहीं थी। ऐसी स्थिति में एग्जीक्यूटिंग कोर्ट को संबंधित दीवार की कीमत का आकलन करने का निर्देश देना, उससे ऐसा काम करवाना होगा जिसके लिए किसी डिक्री का आधार नहीं है। वास्तव में हाईकोर्ट द्वारा अपनाया गया तरीका सिविल प्रक्रिया संहिता, 1908 के ऑर्डर XXI के तहत समर्थित नहीं है।”
साथ ही कोर्ट ने पाया कि चूंकि दूसरी अपील में हाईकोर्ट का निर्णय मेरिट पर आधारित नहीं था (क्योंकि कानून का कोई महत्वपूर्ण प्रश्न तैयार नहीं किया गया), इसलिए उसने हाईकोर्ट से अनुरोध किया कि वह संहिता की धारा 100 के अनुसार दोनों अपीलों पर पुनर्विचार करे और उन्हें जल्द से जल्द मेरिट के आधार पर तय करे, क्योंकि ये दूसरी अपीलें 2008 की हैं।
Cause Title: RAJAT KUMAR AND OTHERS VERSUS S D ADARSH JAIN KANYA MAHA VIDYALAYA SADHAURA AND OTHERS

