'वयस्कों के फैसलों पर अदालत नैतिक टिप्पणी नहीं कर सकती': सुप्रीम कोर्ट

  • वयस्कों के फैसलों पर अदालत नैतिक टिप्पणी नहीं कर सकती: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि वयस्कों द्वारा अपने निजी रिश्तों में लिए गए फैसलों पर नैतिक टिप्पणी करना अदालत का काम नहीं है। कोर्ट ने आगे कहा कि ऐसे फैसलों के किसी भी बुरे नतीजे को अपने आप 'आपराधिक अपराध' नहीं माना जा सकता, जिसमें राज्य (सरकार/प्रशासन) को दखल देने की जरूरत पड़े।

    कोर्ट ने कहा,

    "यह दोहराना जरूरी है कि देश के नागरिकों द्वारा अपनी मर्जी, आजादी और स्वायत्तता से लिए गए फैसलों पर नैतिक टिप्पणी करना इस अदालत का काम नहीं है। वयस्क पुरुष और महिलाएं अपनी मर्जी से ऐसे फैसले ले सकते हैं जो समझदारी भरे हों या नासमझी वाले, सोच-समझकर लिए गए हों या जल्दबाजी में संवेदनशील हों या कठोर। ऐसे फैसलों के नतीजे भी हो सकते हैं - जो बुरे हो सकते हैं, अप्रत्याशित हो सकते हैं, या जिनसे बहुत गहरी चोट भी पहुंच सकती है। लेकिन, इन फैसलों और उनके नतीजों को अपने आप 'आपराधिक अपराध' नहीं माना जा सकता, जिसके लिए राज्य को दखल देना पड़े।"

    कोर्ट ने यह भी चेतावनी दी कि आपराधिक कानून का इस्तेमाल "निजी हिसाब-किताब बराबर करने, बदला लेने या किसी व्यक्ति को अपनी मर्जी के अनुसार काम करने के लिए मजबूर करने के हथियार" के रूप में नहीं किया जा सकता।

    जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने ये टिप्पणियां व्यक्ति को आपराधिक कार्यवाही से बरी करते हुए कीं। उस व्यक्ति पर झूठा वादा करके बलात्कार करने, धोखाधड़ी करने और दूसरी शादी (बिगेमी) करने का आरोप था। महिला ने आरोप लगाया कि उस व्यक्ति ने उससे शादी करने से पहले अपनी पहली शादी की बात छिपाई और खुद को कुंवारा बताया।

    कोर्ट ने गौर किया कि महिला को छह महीने के भीतर ही पता चल गया कि वह व्यक्ति शादीशुदा है और उसके बच्चे भी हैं, फिर भी वह सात साल तक उसके साथ रही। कोर्ट ने कहा कि इस व्यवहार से महिला का यह दावा कमजोर पड़ जाता है कि वह खुद को उसकी कानूनी पत्नी मानती थी।

    कोर्ट ने निष्कर्ष निकाला कि उनका रिश्ता और शारीरिक संबंध आपसी सहमति से थे, और उस व्यक्ति ने बस उस रिश्ते से अलग होने का फैसला किया। कोर्ट ने कहा कि इसे IPC की धारा 376(2)(n) के तहत बलात्कार नहीं माना जा सकता।

    कोर्ट ने इस बात पर भी चिंता जताई कि "आपसी सहमति वाले रिश्तों के टूटने पर उन्हें आपराधिक मामलों में बदलने का चलन बढ़ रहा है।" कोर्ट ने देखा कि ऐसे विवादों में अक्सर समझौता करने के लिए पुरुष आरोपी को बड़ी रकम देनी पड़ती है।

    फैसले में कहा गया,

    "यह दुर्भाग्यपूर्ण है कि अदालतों की कड़ी आलोचना के बावजूद, यह चलन बढ़ रहा है। यह अदालतों के लिए चिंता का विषय है, क्योंकि अक्सर विवादों के निपटारे में पुरुष आरोपी को भारी रकम चुकानी पड़ती है।"

    हालांकि, अदालत ने स्पष्ट किया कि उसकी इन टिप्पणियों का मतलब यह नहीं है कि यौन उत्पीड़न और बलात्कार के वास्तविक आरोपों की गंभीरता कम हो जाती है। अदालत ने जोर देकर कहा कि बलात्कार के मामलों की रिपोर्ट बहुत कम होती है, और जहां तथ्यों से यौन उत्पीड़न या हिंसा साबित होती है, वहां ऐसे मामलों में सख्त कार्रवाई की जानी चाहिए।

    अदालत ने यह भी माना कि भारत जैसे देश में यौन संबंध बनाने के लिए किसी महिला की सहमति इस भरोसे पर आधारित हो सकती है कि वह एक कानूनी रूप से मान्य विवाह में बंधने जा रही है।

    अदालत ने कहा,

    "हमारे देश में, जहां सामाजिक और सांस्कृतिक मूल्यों के कारण विवाह संस्था को बहुत महत्व दिया जाता है, वहां एक महिला अपने साथी पर पूरा भरोसा कर सकती है। वह इस आश्वासन पर शारीरिक संबंध बनाने के लिए सहमत हो सकती है कि उनका यह रिश्ता या तो आगे चलकर एक कानूनी और सामाजिक रूप से मान्य विवाह में बदल जाएगा, या फिर यह रिश्ता ही इसी आधार पर बना है। ऐसे में, यौन संबंध बनाने का उसका फैसला पूरी तरह से विवाह पर टिका होता है, जिसका मतलब है कि उसकी सहमति इस भरोसे पर निर्भर करती है कि उनका विवाह वैध होगा।"

    अदालत ने कहा कि अगर किसी महिला को उसके पार्टनर की पहले से मौजूद शादी के बारे में सचमुच अंधेरे में रखा गया हो, तो उसकी सहमति अमान्य हो सकती है। अदालत ने जोर देकर कहा कि इस सिद्धांत को लागू करना केवल आरोपों या नैतिक धारणाओं पर नहीं, बल्कि हर मामले के तथ्यों और सबूतों पर निर्भर होना चाहिए।

    अदालत ने कहा,

    "ऐसा हो सकता है कि महिला की सहमति अमान्य हो जाए, अगर बाद में पता चले कि उसे अपनी शादी की असल सच्चाई के बारे में पूरी तरह अंधेरे में रखा गया, और उसे यह बिल्कुल नहीं पता था कि उसके पति की पहले भी शादी हो चुकी है। ऐसे मामले वाकई हो सकते हैं, जहां भरोसे को तोड़ा गया हो और गरिमा को ठेस पहुंचाई गई हो; वरना, जिन महिलाओं के साथ सच में गलत हुआ है, उनके लिए IPC की धारा 376 के साथ-साथ धारा 493, 494 और 495 का सुरक्षा कवच बेमानी हो जाएगा। हालांकि, इस सिद्धांत को लागू करते समय केवल आरोपों या नैतिक धारणाओं को नहीं, बल्कि हर मामले के तथ्यों और सबूतों को आधार बनाना चाहिए।"

    इस मामले में, अदालत ने माना कि रिकॉर्ड पर मौजूद सामग्री से यह साबित नहीं होता कि शिकायतकर्ता खुद को उसकी कानूनी पत्नी मानती रही, या यह कि उस पर लगाए गए आरोपों के लिए जरूरी शर्तें पूरी होती हैं। अदालत ने यह भी कहा कि सिर्फ इसलिए कि उनके रिश्ते में खटास आ गई और वे एक-दूसरे के दुश्मन बन गए, इससे पहले की आपसी सहमति से बने शारीरिक संबंध अपने आप 'बलात्कार' (रेप) में नहीं बदल जाते।

    अपीलों को स्वीकार करते हुए अदालत ने केरल हाई कोर्ट और ट्रायल कोर्ट के आदेशों को रद्द किया और अपीलकर्ता को उन आरोपों से बरी किया, जो उस पर लगाए गए।

    Case Title : SANTHOSH KUMAR N.P Vs STATE-STATION HOUSE OFFICER

    अंग्रेज़ी में पढ़ने के लिए यहां क्लिक करें

    Next Story