दोषसिद्धि संदेह पर आधारित नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल पुराने हत्या मामले में आरोपियों को बरी किया

  • दोषसिद्धि संदेह पर आधारित नहीं हो सकती: सुप्रीम कोर्ट ने 15 साल पुराने हत्या मामले में आरोपियों को बरी किया

    इस मुद्दे पर फैसला करते हुए कि क्या खून से सने हथियार की संदिग्ध एकमात्र बरामदगी दोषसिद्धि का आधार बन सकती है, सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (24 जनवरी) को यह कहते हुए नकारात्मक रुख अपनाया कि खून से सने हथियार की बरामदगी की एकमात्र परिस्थिति दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकती, जब तक कि वह आरोपी द्वारा मृतक की हत्या से जुड़ा न हो।

    जस्टिस बी.आर. गवई और जस्टिस संदीप मेहता की खंडपीठ ने हाईकोर्ट और ट्रायल कोर्ट के सहमत निष्कर्षों को खारिज करते हुए कहा कि किसी आरोपी को संदेह के आधार पर तब तक दोषी नहीं ठहराया जा सकता, जब तक कि आरोपी के अपराध को साबित करने वाला कोई पुष्ट साक्ष्य न मिल जाए।

    खंडपीठ ने कहा,

    “यह स्थापित कानून है कि संदेह, चाहे वह कितना भी मजबूत क्यों न हो, उचित संदेह से परे सबूत की जगह नहीं ले सकता। किसी आरोपी को संदेह के आधार पर दोषी नहीं ठहराया जा सकता, चाहे वह कितना भी मजबूत क्यों न हो। किसी आरोपी को तब तक निर्दोष माना जाता, जब तक कि वह उचित संदेह से परे दोषी साबित न हो जाए।''

    अभियोजन पक्ष का मामला यह था कि आरोपी ने 2009 में मृतक पर खंजर से वार करके हत्या का अपराध किया था। फिर अन्य आरोपी व्यक्तियों की मदद से शरीर को कंबल में लपेट दिया। आरोपी की निशानदेही पर कुछ बरामदगी की गई, जिससे पता चलता है कि खंजर पर मानव खून की मौजूदगी थी, जिसे आरोपी की निशानदेही पर बरामद किया गया। हालांकि, अभियोजन उचित आधार से परे यह साबित करने में सफल नहीं हो सका कि खंजर पर खून के धब्बे आरोपी के थे।

    ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को इस आधार पर दोषी ठहराया कि घटना स्थल से बरामद कंबल के टुकड़े और वह स्थान जहां बाद में शव को जलाने के लिए ले जाया गया, वहां आरोपी के समान पाए गए।

    हाईकोर्ट ने आरोपी की सजा की पुष्टि करते हुए कहा कि जब सीआरपीसी की धारा 313 के तहत सवाल पूछे गए तो आरोपी स्पष्टीकरण देने में विफल रहा। उसकी निशानदेही पर विभिन्न सामानों की बरामदगी के संबंध में और एफएसएल रिपोर्ट के संबंध में भी।

    अभियुक्त ने अभियुक्त के अपराध को साबित करने के लिए एकमात्र परिस्थितिजन्य साक्ष्य पर विचार करने के आधार पर दोषसिद्धि को चुनौती दी। अभियुक्त की ओर से यह प्रस्तुत किया गया कि पुलिस द्वारा की गई संदिग्ध बरामदगी के बहाने कोई भी दोषसिद्धि टिक नहीं सकती, यानी अभियोजन पक्ष उचित आधार से परे अभियुक्त के अपराध को स्थापित करने में विफल रहा।

    रिकॉर्ड पर रखे गए भौतिक सबूतों पर गौर करने के बाद अदालत ने अभियोजन पक्ष द्वारा पेश किए गए सबूतों के टुकड़े, खासकर एफएसएल रिपोर्ट को खारिज कर दिया।

    कोर्ट ने कहा,

    “एफएसएल रिपोर्ट के अनुसार, खंजर पर पाए गए खून के धब्बे मानव रक्त के थे। हालांकि, एफएसएल रिपोर्ट से यह पता नहीं चलता कि खंजर पर मिला खून मृतक के ब्लड ग्रुप का था।'

    अदालत ने कहा,

    “हालांकि, जैसा कि पहले ही यहां बताया गया, उक्त वसूली भी खुली जगह से होती है, जो सभी के लिए सुलभ होती है। किसी भी मामले में खंजर पर पाया गया खून मृतक के रक्त समूह से मेल नहीं खाता।”

    अदालत ने कहा कि खून से सने हथियार की बरामदगी की एकमात्र परिस्थिति दोषसिद्धि का आधार नहीं बन सकती, जब तक कि वह आरोपी द्वारा मृतक की हत्या से जुड़ी न हो।

    अदालत ने आगे कहा,

    "इस प्रकार, हम पाते हैं कि केवल खून से सने हथियार की बरामदगी की एकमात्र परिस्थिति के आधार पर यह नहीं कहा जा सकता कि अभियोजन पक्ष ने उचित संदेह से परे मामले को साबित करने के अपने बोझ का निर्वहन कर दिया है।"

    अदालत के मुताबिक, अभियोजन पक्ष उचित संदेह से परे आरोपी के अपराध को साबित करने में विफल रहा।

    अदालत ने इस संबंध में कहा,

    “जैसा कि यहां पहले ही चर्चा की जा चुकी है, केवल संदेह के आधार पर दोषसिद्धि मान्य नहीं होगी। अभियोजन पक्ष का यह कर्तव्य है कि वह सभी उचित संदेहों से परे यह साबित करे कि केवल अभियुक्त और अकेले अभियुक्त ने ही अपराध किया है। हमने पाया कि अभियोजन पक्ष ऐसा करने में पूरी तरह से विफल रहा है।''

    आरोपी सीआरपीसी की धारा 313 के तहत कोई भी स्पष्टीकरण देने में विफल रहा।

    हाईकोर्ट ने भी आरोपी की सजा को इस आधार पर बरकरार रखा कि जब आरोपी से सवाल पूछे गए तो वह सवालों का कोई स्पष्टीकरण नहीं दे पाया। हाईकोर्ट द्वारा अपनाए गए दृष्टिकोण से असहमति जताते हुए सुप्रीम कोर्ट ने माना कि सीआरपीसी की धारा 313 के तहत अभियुक्त की गैर-स्पष्टीकरण या गलत व्याख्या है। परिस्थितियों की श्रृंखला को पूरा करने के लिए अतिरिक्त कड़ी के रूप में उपयोग नहीं किया जा सकता है।

    कोर्ट ने कहा,

    “हम पाते हैं कि हाईकोर्ट इस मूल सिद्धांत की सराहना करने में विफल रहा है कि अभियोजन पक्ष द्वारा मामले को सभी उचित संदेह से परे साबित करने के अपने कर्तव्य का निर्वहन करने के बाद ही आरोपी के गलत स्पष्टीकरण या गैर-स्पष्टीकरण पर विचार किया जा सकता। ...इसका उपयोग केवल अन्य सिद्ध परिस्थितियों के आधार पर पहले ही आ चुके अपराध के निष्कर्ष को मजबूत करने के लिए किया जा सकता।

    तदनुसार, अपील की अनुमति देते हुए हाईकोर्ट द्वारा पारित आक्षेपित निर्णय और आदेश रद्द किया जाता है।

    केस टाइटल: राजा नायकर बनाम छत्तीसगढ़ राज्य

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