सुप्रीम कोर्ट ने पत्नी की हत्या के लिए पति को ठहराया दोषी, महिलाओं को ज़बरदस्ती प्रताड़ना भरे विवाह में वापस भेजने के खिलाफ दी चेतावनी
Shahadat
25 May 2026 8:06 PM IST

अपनी पत्नी की हत्या और उसके साथ घरेलू क्रूरता करने के आरोप में पति की सज़ा बरकरार रखते हुए सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (25 मई) को उस सामाजिक विफलता की ओर ध्यान दिलाया, जिसमें विवाहित बेटियों को उनके ससुराल में होने वाली तकलीफ़ों को पहचाना नहीं जाता। कोर्ट ने पाया कि मृत पीड़िता की घरेलू हिंसा और दहेज उत्पीड़न की बार-बार की शिकायतों को नज़रअंदाज़ किया गया या उन्हें मामूली बात मान लिया गया, और उस पर अपने पति से सुलह करने और वैवाहिक जीवन फिर से शुरू करने का दबाव डाला गया।
जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस के.वी. विश्वनाथन की बेंच ने ऐसे मामले की सुनवाई की, जिसमें पीड़िता द्वारा अपने परिवार से बार-बार यह शिकायत करने के बावजूद कि उसका पति उसके साथ हिंसा कर रहा है, उसकी चिंताओं को उसके रिश्तेदारों और गाँव के बड़ों, दोनों ने नज़रअंदाज़ कर दिया; इन लोगों ने सुलह की उम्मीद में उसे उसके ससुराल वापस जाने के लिए मनाया। आखिरकार उसकी हत्या कर दी गई, हालांकि अपीलकर्ता ने उसकी मौत को आत्महत्या का मामला साबित करने की असफल कोशिश की।
पीड़िता के परिवार के सदस्यों और गाँव के लोगों की बार-बार की विफलता की निंदा करते हुए कोर्ट ने टिप्पणी की:
“हर बार जब उसने यह मुद्दा उठाया तो केवल सुलह कराने और उसे वापस उसके ससुराल भेजने के ही प्रयास किए गए। गांव के बड़ों को इसमें शामिल किया गया और यहां तक कि एक कथित समझौता कराने के बाद प्रस्ताव भी पारित किए गए। पीड़िता के अपने प्रियजनों ने भोलेपन में यह मान लिया कि किसी न किसी तरह स्थिति बेहतर हो जाएगी। झूठी आशावाद की भावना ने उन्हें घेर लिया था। उनकी उम्मीदें तब टूट गईं जब पीड़िता की उसके ससुराल में दुखद मौत हो गई। उम्मीद है कि उसके जीवन की यह कहानी कई लोगों के लिए आँखें खोलने वाली साबित होगी।”
मामला
अभियोजन पक्ष के अनुसार, पीड़िता की शादी अपीलकर्ता से 16 जून, 2007 को उसकी मृत्यु से लगभग पंद्रह महीने पहले हुई थी। उसके पिता (PW-7) ने बताया कि शादी के दो महीने के भीतर ही, उसने अपने पति और ससुराल वालों द्वारा मोटरसाइकिल और नकद पैसों की मांग को लेकर किए जा रहे उत्पीड़न की शिकायत की थी। परिवार द्वारा एक टेलीविज़न सेट और बाद में एक मोटरसाइकिल दिए जाने के बावजूद, कथित यातना जारी रही, जिसके चलते कई बार पंचायतें बुलाई गईं और एक लिखित प्रस्ताव भी पारित किया गया, जिसमें यह चेतावनी दी गई थी कि यदि उत्पीड़न जारी रहा तो कानूनी कार्रवाई की जाएगी।
घटना से दो दिन पहले, पड़ोसी PW-14 ने दावा किया कि पीड़िता ने उसे बताया था कि उसकी सास ने उसे खाना देने से मना कर दिया था। उसकी मौत से पिछली रात कथित तौर पर उसने उसे बरामदे में अकेले बैठे हुए देखा, जबकि घर के अंदर झगड़ा हो रहा था। अगली सुबह रोने की आवाज़ें सुनकर वह घर के अंदर गया और उसे छत से लटका हुआ पाया, जबकि अपीलकर्ता (पति) बिस्तर पर औंधे मुँह पड़ा था।
ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट ने अपीलकर्ता को IPC की धारा 302 के तहत हत्या और IPC की धारा 498-A के तहत क्रूरता के अपराध के लिए दोषी ठहराया, जिसके बाद उसने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।
फैसला
विवादित निष्कर्षों में दखल देने से इनकार करते हुए जस्टिस विश्वनाथन द्वारा लिखे गए फैसले में PW-14 की गवाही को विश्वसनीय और स्वाभाविक माना गया। फैसले में यह भी बताया गया कि पोस्टमार्टम रिपोर्ट में मृतक के शरीर पर मौत से पहले की कई चोटें पाई गईं, जिनमें छाती, जबड़ा और सिर के पिछले हिस्से (Occipital Region) पर लगी चोटें शामिल थीं। रिपोर्ट में यह भी सामने आया कि आत्महत्या के लिए फांसी लगाने से जुड़े खास लक्षण मृतक के शरीर पर मौजूद नहीं थे।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
"मेडिकल एविडेंट्स से संकेत मिलता है कि मृतक को उसकी मौत से पहले हिंसा का शिकार बनाया गया, जिससे यह सिद्धांत खारिज हो जाता है कि उसने अपनी मर्ज़ी से आत्महत्या की थी... इसलिए हमें ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट के इस निष्कर्ष की पुष्टि करने में कोई हिचकिचाहट नहीं है कि मौत सिर में लगी चोट के कारण हुई और मृतक को फांसी पर लटकाया गया था।"
इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी कहा कि अपीलकर्ता भारतीय साक्ष्य अधिनियम, 1872 की धारा 106 के तहत सबूत का बोझ उठाने में विफल रहा। कोर्ट ने कहा कि एक बार जब अभियोजन पक्ष ने यह साबित कर दिया कि वैवाहिक घर के अंदर हत्या हुई थी और अपीलकर्ता उस समय वहीं मौजूद था, तो मौत के कारणों और परिस्थितियों को स्पष्ट करने का बोझ पति पर आ गया था।
हालांकि, अपीलकर्ता ने केवल यह दावा किया कि मृतक ने आत्महत्या की थी, लेकिन वह उसके शरीर पर पाई गई चोटों के बारे में कोई स्पष्टीकरण नहीं दे पाया; यह बात उसके खिलाफ एक अतिरिक्त दोष सिद्ध करने वाला साक्ष्य (incriminating material) साबित हुई।
अदालत ने टिप्पणी करते हुए कहा,
“यह बात अच्छी तरह से तय है कि यदि कोई अपराध घर की चारदीवारी के अंदर होता है, तो भले ही केस साबित करने का शुरुआती बोझ अभियोजन पक्ष पर हो, लेकिन घर में रहने वालों पर भी यह ज़िम्मेदारी होती है कि वे एक ठोस स्पष्टीकरण दें कि पीड़ित की मृत्यु कैसे हुई।”
कोर्ट ने आगे यह जोड़ा,
“जब CrPC की धारा 313 के तहत परिस्थितियों का सामना कराया गया तो अपीलकर्ता ने कोई स्पष्टीकरण देना उचित नहीं समझा। अपीलकर्ता ने इस बोझ को उठाने और मृतक के शरीर पर लगी चोटों के बारे में कोई विश्वसनीय स्पष्टीकरण देने का कोई प्रयास नहीं किया। उसका यह बचाव कि यह आत्महत्या का मामला था, भारी मेडिकल सबूतों से गलत साबित हो गया। भले ही हम हथौड़ा मिलने वाली बात को नज़रअंदाज़ कर दें, तब भी इससे अपीलकर्ता के केस को कोई मदद नहीं मिलती।”
यह देखते हुए कि अपीलकर्ता फरार था, न्यायालय ने त्रिपुरा के पुलिस महानिदेशक को उसे पकड़ने के लिए तत्काल एक टीम गठित करने का निर्देश दिया।
तदनुसार, अपील खारिज की गई और IPC की धारा 302 के तहत आजीवन कारावास की सज़ा, साथ ही IPC की धारा 498A के तहत दी गई सज़ा बरकरार रखी गई।
Cause Title: Gour Acharjee Versus The State of Tripura & Ors.

