जीवंत लोकतंत्र में न्यायपालिका की रचनात्मक आलोचना ज़रूरी, लेकिन इसे सही मंच पर ही उठाया जाना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
10 Sept 2026 9:47 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि एक संस्था के तौर पर न्यायपालिका की आलोचना हो सकती है और न्यायिक कामकाज की निष्पक्ष, जानकारीपूर्ण और रचनात्मक आलोचना एक जीवंत संवैधानिक लोकतंत्र की जायज़ और ज़रूरी विशेषता है।
हालांकि, चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्य कांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच ने कहा कि ऐसी आलोचना सही मंच और निष्पक्ष, तर्कसंगत तरीके से की जानी चाहिए। कोर्ट ने कहा कि बिना पुष्टि वाली आलोचना बच्चों के लिए बने स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल नहीं की जानी चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"एक संस्था के तौर पर न्यायपालिका आलोचना के खिलाफ नहीं है और न ही हो सकती है। न्यायिक कामकाज की निष्पक्ष, जानकारीपूर्ण और रचनात्मक आलोचना एक जीवंत संवैधानिक लोकतंत्र की जायज़ और ज़रूरी विशेषता है, जो संस्थागत जवाबदेही और आत्म-सुधार में योगदान देती है। हालांकि, ज़रूरी यह है कि ऐसी आलोचना सही मंच और निष्पक्ष, तर्कसंगत तरीके से की जाए, और बिना पुष्टि के कोमल मन वाले बच्चों के लिए बने स्कूल के पाठ्यक्रम में शामिल न हो। फर्क आलोचना और चुप्पी के बीच नहीं, बल्कि ज़िम्मेदार बातचीत और बिना जानकारी के किए गए दावों के बीच है।"
कोर्ट ने NCERT की कक्षा 8 की सामाजिक विज्ञान की पाठ्यपुस्तक में "न्यायपालिका में भ्रष्टाचार" चैप्टर से जुड़ी स्वतः संज्ञान (suo motu) वाली कार्यवाही को बंद करते हुए यह बात कही।
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि पाठ्यक्रम तैयार करने में शामिल तीन शिक्षाविदों के बारे में पहले की गई टिप्पणी कोर्ट का कोई निष्कर्ष नहीं है।
यह स्पष्टीकरण कोर्ट के 22 मई, 2026 के आदेश पर स्पष्टीकरण मांगने वाली अर्जी पर दिया गया। उस पैराग्राफ में सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता की बात दर्ज थी कि आवेदकों द्वारा तैयार पाठ्यक्रम को सभी स्तरों पर समिति के सामने नहीं लाया गया, इसलिए इसे सामूहिक निर्णय नहीं कहा जा सकता।
कोर्ट ने स्पष्ट किया कि यह "केवल इस कोर्ट द्वारा दर्ज किया गया बयान" है और यह कोर्ट की कोई टिप्पणी या आदेश नहीं है।
मुख्य कार्यवाही पर कोर्ट ने गौर किया कि पूर्व सुप्रीम कोर्ट जज जस्टिस इंदु मल्होत्रा, पूर्व अटॉर्नी जनरल के.के. वेणुगोपाल और प्रोफेसर प्रकाश सिंह वाली विशेषज्ञ समिति ने चैप्टर और उसके सामने लाए गए अन्य मटीरियल की समीक्षा पूरी कर ली है। समिति ने नेशनल ज्यूडिशियल एकेडमी, भोपाल और दोबारा बनाई गई नेशनल सिलेबस एंड टीचिंग लर्निंग मटीरियल कमिटी के साथ मिलकर, न्यायपालिका की भूमिका और कामकाज पर एक संशोधित टेक्स्ट सौंपा।
कोर्ट ने देखा कि संशोधित चैप्टर को मंज़ूरी मिल गई, इसे छात्रों के बीच बांटा गया और क्लासरूम में इसका इस्तेमाल हो रहा था। इसे देखने के बाद कोर्ट ने माना कि इसमें न्यायपालिका के बारे में निष्पक्ष, तथ्यों के आधार पर सही और संतुलित जानकारी दी गई। इसमें संस्था की तारीफ़ किए बिना या उसे गलत तरीके से कमतर दिखाए बिना, उसकी संवैधानिक भूमिका और आज़ादी व जवाबदेही के सुरक्षा उपायों के बारे में बताया गया।
NCERT के डायरेक्टर और स्कूल शिक्षा और साक्षरता विभाग के सेक्रेटरी द्वारा बिना शर्त माफ़ी मांगने, आपत्तिजनक पब्लिकेशन को वापस लेने, NSTC को दोबारा बनाने और एक्सपर्ट कमिटी की समीक्षा पूरी होने को देखते हुए, कोर्ट ने माना कि स्वतः संज्ञान (suo motu) वाली कार्यवाही का मकसद काफ़ी हद तक पूरा हो गया।
सेक्रेटरी और NCERT डायरेक्टर को जारी किए गए कारण बताओ नोटिस (show-cause notices) वापस ले लिए गए। कोर्ट ने भारत सरकार, NCERT और संबंधित अधिकारियों को निर्देश दिया कि वे भविष्य के संस्करणों और पाठ्यक्रम में न्यायपालिका सहित सार्वजनिक संस्थाओं से जुड़ी शैक्षिक सामग्री के कंटेंट और उसकी जांच-परख के बारे में दिए गए अपने आश्वासनों का पालन करें।
कोर्ट ने पाठ्यक्रम की समीक्षा करने में एक्सपर्ट कमिटी और दोबारा बनाई गई NSTC के काम की भी सराहना की। आखिर में, स्वतः संज्ञान वाली रिट याचिका का निपटारा कर दिया गया और उसे बंद कर दिया गया।
Case Title – In Re: Social Science Textbook for Grade–8 (Part-2) Published by NCERT and Ancillary Issues


