ज़रूरी पक्ष को शामिल किए बिना हासिल किया गया समझौता आदेश अमान्य: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
30 Sept 2026 7:52 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि संयुक्त परिवार की संपत्ति (Coparcenary Property) के बंटवारे के मुकदमे में ज़रूरी पक्ष को शामिल किए बिना हासिल किया गया समझौता आदेश अमान्य (Nullity) होता है। इसलिए, जिस ज़रूरी पक्ष को शामिल नहीं किया गया, वह उस कोर्ट में समझौता आदेश के खिलाफ 'रिकॉल एप्लीकेशन' (आदेश को वापस लेने की अर्ज़ी) दायर करने का हकदार है, जिसने वह आदेश पारित किया।
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने मामले की सुनवाई की। इसमें अपीलकर्ता संपत्ति के मालिक की दिवंगत बेटी के कानूनी वारिस हैं (मालिक की मृत्यु बिना वसीयत के हुई)। अपीलकर्ताओं ने हिंदू उत्तराधिकार अधिनियम के तहत अपने नाना की संपत्ति में 1/4 हिस्सा मांगा, क्योंकि संपत्ति उनके चार बच्चों (जिनमें अपीलकर्ताओं की दिवंगत मां भी शामिल थीं) के बीच समान रूप से बंटनी है।
ट्रायल कोर्ट में कई दौर की कानूनी कार्यवाही के बाद पक्षकारों के बीच हुए समझौते के आधार पर तेलंगाना हाईकोर्ट ने समझौता आदेश पारित किया। हालांकि, संपत्ति के मालिक की दिवंगत बेटी के कानूनी वारिस होने के बावजूद, अपीलकर्ताओं को पूरी कानूनी कार्यवाही के दौरान पक्षकार नहीं बनाया गया।
हाईकोर्ट द्वारा पारित समझौता आदेश से नाराज़ होकर और यह पाते हुए कि इस आदेश के खिलाफ उनके पास एकमात्र उपाय अलग से मुकदमा दायर करना या कोर्ट की अनुमति लेकर ऊपरी अदालत में अपील करना था, कानूनी वारिसों ने सुप्रीम कोर्ट में अपील दायर की। उन्होंने दावा किया कि वे मुकदमे के नतीजे के लिए एक ज़रूरी पक्ष थे, जिसे हाईकोर्ट ने नज़रअंदाज़ कर दिया।
अपील को मंज़ूरी देते हुए सुप्रीम कोर्ट ने पाया कि समझौता आदेश के खिलाफ अपीलकर्ताओं की 'रिकॉल एप्लीकेशन' को खारिज करने का हाईकोर्ट का तरीका गलत है।
कोर्ट ने कहा,
"दिवंगत श्रीमती बल्लो बाई या उनके कानूनी वारिसों को शामिल किए बिना वादी और प्रतिवादी बने भाइयों/कानूनी वारिसों द्वारा हासिल किया गया समझौता आदेश कानून की नज़र में अमान्य था, जबकि वे मुकदमे के लिए एक ज़रूरी पक्ष हैं।"
कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि कानून की अनदेखी करके पारित किए गए समझौता आदेश के खिलाफ CPC के ऑर्डर 23 नियम 3A के तहत लगी रोक भी लागू नहीं होगी। ऑर्डर 23 नियम 3A के तहत समझौते के आधार पर जारी डिक्री (फैसले) के खिलाफ नया मुकदमा करने पर रोक है, अगर वह समझौता ही गैर-कानूनी था जिस पर डिक्री आधारित है।
कोर्ट ने आगे कहा,
"किसी भी तरह से स्वर्गीय श्रीमती बल्लो बाई और उनके कानूनी वारिसों को इस मामले (मुकदमे) से अनजान या बाहरी नहीं माना जा सकता। इसलिए CPC के ऑर्डर 23 नियम 3A में दी गई रोक के आधार पर उन्हें समझौते को चुनौती देने और उनकी जानकारी के बिना हासिल की गई डिक्री को वापस लेने की मांग करने के अधिकार से वंचित नहीं किया जा सकता।"
नतीजतन, अपील मंजूर की गई और मामले को हाई कोर्ट वापस भेज दिया गया ताकि ऊपर बताई गई बातों को ध्यान में रखते हुए डिक्री वापस लेने की अर्जियों पर नए सिरे से विचार किया जा सके।
Cause Title: GEETA BAI & ORS. VERSUS K. ARJUN SINGH & ORS.

