सरकारी कर्मचारी के परिवार को दी जाने वाली दया सहायता मोटर एक्सीडेंट मुआवज़े से काटी जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

25 Feb 2026 8:20 PM IST

  • सरकारी कर्मचारी के परिवार को दी जाने वाली दया सहायता मोटर एक्सीडेंट मुआवज़े से काटी जा सकती है: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने फिर से कहा कि किसी मृत कर्मचारी के आश्रित को मिली दया सहायता मोटर व्हीकल एक्ट के तहत मिले मुआवज़े से काटी जा सकती है।

    हरियाणा मृतक सरकारी कर्मचारियों के आश्रितों को दया सहायता नियम, 2006 का ज़िक्र करते हुए जस्टिस संजय करोल और जस्टिस ऑगस्टीन जॉर्ज मसीह की बेंच ने रिलायंस जनरल इंश्योरेंस की अपील मान ली और हाईकोर्ट का फ़ैसला रद्द किया, जिसमें कहा गया कि दया सहायता मोटर एक्सीडेंट मुआवज़े से काटी नहीं जाएगी।

    यह मामला 2 नवंबर, 2009 को हुए एक सड़क हादसे से जुड़ा है, जिसमें हरियाणा सरकार की एक कर्मचारी, जो मल्टी-पर्पस हेल्थ वर्कर के तौर पर तैनात थी, की जान चली गई। उसके आश्रितों ने मोटर व्हीकल एक्ट के तहत दावा किया। मोटर एक्सीडेंट क्लेम ट्रिब्यूनल ने ₹8.8 लाख दिए, जबकि पंजाब एंड हरियाणा हाईकोर्ट ने सितंबर, 2019 में मुआवज़ा बढ़ाकर ₹29.09 लाख किया और निर्देश दिया कि 2006 के नियमों के तहत मिली रकम काट ली जाए।

    क्लेमेंट-रिस्पॉन्डेंट्स ने 2006 के नियमों के अनुसार मिली रकम की कटौती के आदेश के बारे में क्लैरिफिकेशन के लिए एप्लीकेशन फाइल की। ​​क्लैरिफिकेशन ऑर्डर के ज़रिए ऐसा लगता है कि हाईकोर्ट ने अपने रिव्यू अधिकार क्षेत्र का इस्तेमाल करते हुए मेन ऑर्डर की स्थिति को उलट दिया। साथ ही यह माना कि 2006 के नियमों के तहत मिली करुणा सहायता कटौती योग्य नहीं थी। इससे इंश्योरेंस कंपनी, रिलायंस जनरल इंश्योरेंस कंपनी लिमिटेड को सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने के लिए मजबूर होना पड़ा।

    विवादित रिव्यू ऑर्डर रद्द करते हुए जस्टिस करोल के लिखे फैसले ने हाईकोर्ट के मुख्य ऑर्डर को बहाल किया, जिसमें उसने रिलायंस जनरल इंश्योरेंस बनाम शशि शर्मा (2016) 9 SCC 627 का ज़िक्र करते हुए कहा कि सिर्फ़ वही फ़ायदे जो सीधे उसी तरह के नुकसान की भरपाई करते हैं, जैसे इनकम का नुकसान, दिए गए करुणा के मुआवज़े से काटे जा सकते हैं।

    कोर्ट ने रिलायंस जनरल इंश्योरेंस बनाम शशि शर्मा (ऊपर) में कहा,

    “2006 के नियमों के तहत मिलने वाले फ़ायदे जो मृतक को मिलने वाले वेतन और भत्तों से जुड़े होते हैं, उन्हें MVA के तहत दिए गए मुआवज़े से ऑफ़सेट किया जाना चाहिए ताकि डबल रिकवरी न हो। 2006 के नियमों के दूसरे हिस्से, जैसे पेंशन, लाइफ़ इंश्योरेंस, या अलग-अलग भत्ते, पर कोई असर नहीं पड़ता और उन्हें काटा नहीं जा सकता।”

    कोर्ट ने कहा कि हाईकोर्ट ने अपने मुख्य ऑर्डर का रिव्यू करके गलती की, जिससे क्लेम करने वालों को डबल फ़ायदा होता।

    कोर्ट ने आगे कहा,

    “MVA के तहत मुआवज़ा शुरू में पूरा दिया जाना चाहिए। अगर कानूनी प्रतिनिधियों को असल में 2006 के नियमों के तहत रकम मिलती है तो बाद में एडजस्टमेंट किया जाना चाहिए। इससे यह पक्का होता है कि आश्रितों को उनका सही मुआवज़ा मिले, बिना दोहरे फ़ायदे मिलने के जोखिम के।”

    इसलिए अपील मंज़ूर की गई और हाईकोर्ट का मुख्य आदेश बहाल किया गया।

    Cause Title: RELIANCE GENERAL INSURANCE COMPANY LIMITED VERSUS KANIKA & ORS.

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