सरकारी नौकरी में दया की कोई जगह नहीं, फिजिकल टेस्ट में शामिल न होने वाले उम्मीदवार को दूसरा मौका नहीं: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

5 April 2026 6:27 PM IST

  • सरकारी नौकरी में दया की कोई जगह नहीं, फिजिकल टेस्ट में शामिल न होने वाले उम्मीदवार को दूसरा मौका नहीं: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने फैसला सुनाया कि पुलिस भर्ती प्रक्रिया में तय फिजिकल टेस्ट में शामिल न हो पाने वाला उम्मीदवार सिर्फ इसलिए टेस्ट को दोबारा कराने का अधिकार नहीं मांग सकता कि टेस्ट टालने की उसकी अर्जियों का जवाब नहीं दिया गया। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि सरकारी नौकरी के मामलों में दया और अपनी मर्ज़ी से फैसले लेने की गुंजाइश बहुत कम होती है।

    जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने दिल्ली हाईकोर्ट का फैसला रद्द किया, जिसमें एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल के उस फैसले को सही ठहराया गया कि दिल्ली पुलिस कांस्टेबल भर्ती के लिए फिजिकल एंड्योरेंस और मेज़रमेंट टेस्ट (PE&MT) में शामिल होने के लिए उम्मीदवार को दूसरा मौका दिया जाए। इसका आधार यह था कि तय तारीख को उम्मीदवार बीमार था।

    मामले की पृष्ठभूमि

    उम्मीदवार ने दिल्ली पुलिस में कांस्टेबल के पद पर भर्ती प्रक्रिया का पहला चरण पास कर लिया था। उसे 14 जनवरी, 2024 को PE&MT के लिए उपस्थित होना था, लेकिन वह टेस्ट में शामिल नहीं हुआ। उसने इसकी वजह सर्दी, खांसी, बुखार, सिरदर्द, बदन दर्द और चक्कर आना जैसी बीमारियां बताईं।

    बाद में उसने दावा किया कि उसने टेस्ट को दोबारा कराने के लिए तीन अर्जियां दी थीं। ट्रिब्यूनल ने अधिकारियों को निर्देश दिया कि उसे अगले बैच के साथ टेस्ट में शामिल होने की अनुमति दी जाए और हाईकोर्ट ने इस निर्देश में दखल देने से इनकार किया।

    इन आदेशों को चुनौती देते हुए दिल्ली पुलिस सुप्रीम कोर्ट पहुंची।

    दिल्ली पुलिस की अपील स्वीकार करते हुए बेंच ने टिप्पणी की कि सरकारी नौकरी के मामलों में, जहाँ लाखों उम्मीदवार मुकाबला करते हैं, जब भी मौका मिले उसे तुरंत भुना लेना चाहिए, क्योंकि आमतौर पर दूसरा मौका मिलने की कोई गुंजाइश नहीं होती।

    कोर्ट ने कहा कि भर्ती के विज्ञापन में साफ तौर पर बताया गया कि PE&MT का शेड्यूल अंतिम है और किसी भी हाल में इसे बदला नहीं जा सकता। कोर्ट ने यह भी पाया कि भर्ती प्रक्रिया के लिए लगभग एक लाख उम्मीदवारों ने रजिस्ट्रेशन कराया और उम्मीदवार अकेला ऐसा व्यक्ति था, जिसने टेस्ट को दोबारा कराने की मांग की थी।

    बेंच ने उम्मीदवार के इस दावे को संदिग्ध पाया कि उसकी अर्जियों को नज़रअंदाज़ किया गया, क्योंकि इस बात का कोई सबूत नहीं था कि अर्जियां मिली थीं।

    कोर्ट ने कहा कि सर्दी, खांसी और बुखार जैसी बीमारियों से पीड़ित होने के बावजूद, उम्मीदवार कम से कम टेस्ट वाली जगह पर जाकर अधिकारियों को अपनी असमर्थता के बारे में बता सकता था और टेस्ट को दोबारा कराने का अनुरोध कर सकता था; कोर्ट ने फैसला सुनाया कि ऐसा न करना उसकी ओर से पहल और गंभीरता की कमी को दर्शाता है।

    अदालत ने टिप्पणी की,

    “जब बात सरकारी नौकरी की आती है तो दांव बहुत ऊंचे होते हैं। इस तरह के मौके युवाओं की ज़िंदगी बदल सकते हैं। जब मौके कम मिलते हैं तो उन्हें दोनों हाथों से लपक लेना चाहिए। जिस बीमारी से प्रतिवादी पीड़ित था, वह ऐसी नहीं थी कि वह हिल-डुल भी न सके; उससे कम से कम इतनी उम्मीद तो की ही जा सकती थी कि वह 'शारीरिक सहनशक्ति और माप परीक्षण' (PE & MT) के लिए उपस्थित हो, अपनी असमर्थता बताए और परीक्षा में शामिल होने के लिए उसे दोबारा निर्धारित करने का अनुरोध करे। इससे कम से कम अपीलकर्ताओं या परीक्षा आयोजित करने वाले अधिकारियों को यह तय करने का मौका तो मिल जाता कि क्या प्रतिवादी को वास्तव में किसी विशेष सुविधा (Accommodation) की ज़रूरत थी या नहीं। उपस्थित न होना और दूसरे मौके की उम्मीद करना, प्रतिवादी की ओर से लगन और पहल की कमी को साफ तौर पर दर्शाता है।”

    अदालत ने प्रतिवादी के इस तर्क को खारिज कर दिया कि आरक्षित श्रेणी से संबंधित होने के नाते वह सहानुभूति के आधार पर एक और मौका पाने का हकदार है।

    इसके बजाय, अदालत ने कहा,

    “सिर्फ इसलिए कि कोई पिछड़े समुदाय से आता है, यह फैसला पलटने का निर्णायक कारक नहीं हो सकता। विवेकाधिकार के प्रयोग की सीमाएं स्पष्ट रूप से निर्धारित हैं, जिनसे आगे न्यायिक मंचों को नहीं जाना चाहिए।”

    अदालत ने आगे कहा,

    “यदि सभी के लिए समान अवसर सुनिश्चित करना है, तो सरकारी नौकरी से जुड़े मामलों में कृपा, दान या सहानुभूति को दूर ही रखना चाहिए।”

    परिणामस्वरूप, अपील स्वीकार की गई।

    Cause Title: COMMISSIONER, DELHI POLICE & ANR. VS. UTTAM KUMAR

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