सिर्फ इसलिए ज़मीन के मुआवज़े का दावा खारिज नहीं किया जा सकता कि दावा करने वाला संन्यासी है: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
28 May 2026 8:23 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि किसी व्यक्ति का ज़मीन या पैसे के मुआवज़े का दावा सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वह खुद को संन्यासी बताता है।
जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की बेंच ने यह बात तब कही, जब उन्होंने उत्तर प्रदेश के व्यक्ति द्वारा मुआवज़े और ज़मीन के आवंटन को लेकर शुरू की गई एक और कानूनी लड़ाई को खारिज किया। यह मामला तब शुरू हुआ था, जब उस व्यक्ति की ज़मीन पर एक सड़क बना दी गई थी।
कोर्ट ने कहा,
"संन्यास पारंपरिक हिंदू जीवन-पद्धति का चौथा और आखिरी चरण है। इसमें आम तौर पर सांसारिक इच्छाओं, पारिवारिक रिश्तों और दुनियावी महत्वाकांक्षाओं को त्याग दिया जाता है। आवेदक, हालांकि खुद को संन्यासी बताता है, फिर भी वह ज़मीन और पैसे के मुआवज़े की मांग कर रहा है। ज़मीन और मुआवज़े का दावा करने के उसके अधिकार को सिर्फ इसलिए खारिज नहीं किया जा सकता कि वह खुद को संन्यासी बता रहा है।"
आवेदक सत्य नारायण शुक्ला ने विविध आवेदन (Miscellaneous Application) के ज़रिए कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया था। यह आवेदन उत्तर प्रदेश के बाराबंकी ज़िले में ज़मीन अधिग्रहण से जुड़ी कार्यवाही से जुड़ा था। कोर्ट में दर्ज मामले के इतिहास के मुताबिक, साल 2002 में ग्राम पंचायत ने आवेदक की ज़मीन पर एक सार्वजनिक सड़क बना दी थी।
कोर्ट ने पाया कि यह विवाद पहले की कानूनी कार्यवाहियों के ज़रिए पहले ही पूरी तरह सुलझ चुका था। साल 2021 में सुप्रीम कोर्ट ने आवेदक की विशेष अनुमति याचिका (SLP) खारिज की थी। कोर्ट ने राज्य सरकार की इस दलील को रिकॉर्ड पर लिया था कि मुआवज़े के अलावा, आवेदक को साल 2005 में मलोली गांव में 0.202 हेक्टेयर ज़मीन भी आवंटित की गई।
इसके बाद आवेदक ने कई कानूनी रास्ते अपनाए, लेकिन उसे सफलता नहीं मिली। इनमें एक रिकॉल आवेदन, इलाहाबाद हाईकोर्ट में एक रिट याचिका, एक अवमानना याचिका और एक पुनर्विचार याचिका शामिल थी।
आवेदक को दिए गए मुआवज़े का ब्योरा देते हुए कोर्ट ने दर्ज किया कि उसे साल 2005 से 2023 के बीच अलग-अलग किस्तों में लगभग 7.58 लाख रुपये मिले थे। कोर्ट ने यह भी पाया कि उसे लगभग 0.202 हेक्टेयर का एक वैकल्पिक भूखंड आवंटित किया गया, जो सड़क निर्माण से प्रभावित उसकी मूल ज़मीन से काफी बड़ा था।
बेंच ने आगे कहा कि आवेदक ने आवंटित ज़मीन पर एक आश्रम और मंदिर बना लिया था, और वह उस पर पूरे मालिकाना हक का इस्तेमाल कर रहा था। बार-बार मुक़दमेबाज़ी की आलोचना करते हुए, कोर्ट ने कहा कि आवेदक को ज़मीन और मुआवज़ा पहले ही मिल चुका था, इसके बावजूद वह बार-बार कोर्ट आ रहा था। बेंच ने टिप्पणी की कि यह कार्यवाही "इस कोर्ट के कीमती समय की सरासर बर्बादी" थी।
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि यह मामला भारी जुर्माने के साथ खारिज किए जाने लायक है, लेकिन उसने यह देखते हुए जुर्माना लगाने से परहेज़ किया कि आवेदक खुद पेश हुआ था और "अब एक संन्यासी बन गया था।"
आखिरकार कोर्ट ने विविध अर्जी खारिज की और निर्देश दिया कि भविष्य में इसी विषय पर किसी भी कोर्ट द्वारा कोई मुक़दमा स्वीकार नहीं किया जाएगा। कोर्ट ने यह भी टिप्पणी की कि आवेदक एक "आदतन मुक़दमेबाज़" बन गया था।
Case : Satya Narayan Shukla v.State of Uttar Pradesh

