बस ड्राइवर से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह पीछे मुड़कर देखे कि यात्री उतर गए या नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने लापरवाही से हुई मौत के मामले में सज़ा रद्द की

Shahadat

28 May 2026 1:02 PM IST

  • बस ड्राइवर से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह पीछे मुड़कर देखे कि यात्री उतर गए या नहीं: सुप्रीम कोर्ट ने लापरवाही से हुई मौत के मामले में सज़ा रद्द की

    सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार (27 मई) को कर्नाटक राज्य सड़क परिवहन निगम (KSRTC) के एक बस ड्राइवर को बरी किया। इस ड्राइवर को एक यात्री की मौत का दोषी ठहराया गया था, जो बस से उतरते समय गिर गया था। कोर्ट ने अपने फैसले में कहा कि कंडक्टर के इशारे पर गाड़ी आगे बढ़ाने वाले ड्राइवर को अपने आप आपराधिक रूप से लापरवाह नहीं माना जा सकता।

    जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा और जस्टिस एन.वी. अंजारिया की बेंच ने भारतीय दंड संहिता (IPC) की धारा 279 और 304A के तहत अपील करने वाले ड्राइवर की सज़ा रद्द की। कोर्ट ने कहा कि अभियोजन पक्ष यह साबित करने में नाकाम रहा कि ड्राइवर की ओर से कोई जल्दबाजी या लापरवाही भरा काम किया गया था।

    कोर्ट ने कहा,

    "जब अपील करने वाले आरोपी ने बस को रोकने और चलाने के मामले में कंडक्टर के निर्देशों का पालन किया, जो करना उसकी ड्यूटी थी, तो उसकी ओर से किसी भी तरह की लापरवाही मानना ​​न तो उचित होगा और न ही तार्किक।"

    कोर्ट ने आगे कहा,

    "अपील करने वाले ड्राइवर से यह उम्मीद नहीं की जा सकती कि वह अपना सिर पीछे घुमाकर खुद देखे कि यात्री उतर गए हैं या नहीं। बस शुरू करने के लिए सीटी के इशारे पर उसका निर्भर रहना एक सामान्य और स्वाभाविक व्यवहार है।"

    मामले की पृष्ठभूमि

    यह मामला 17 अप्रैल, 2011 को हुई एक घटना से जुड़ा है। इस घटना में कर्नाटक में अथानी से मंगसूली जा रही KSRTC की एक बस शामिल थी।

    अभियोजन पक्ष के अनुसार, मृत यात्री शोभा मल्लैया मंदिर के पास बस से उतरने की कोशिश कर रही थी। उसी समय ड्राइवर ने कथित तौर पर गाड़ी को जल्दबाजी और लापरवाही से आगे बढ़ा दिया, जिससे वह गिर गई और उसके सिर में गंभीर चोटें आईं, जिसके कारण उसकी मौत हो गई।

    ट्रायल कोर्ट ने ड्राइवर को IPC की धारा 279 और 304A के साथ-साथ मोटर वाहन अधिनियम की धारा 134 (धारा 187 के साथ पठित) के तहत दोषी ठहराया। बाद में अपीलीय कोर्ट ने इस सज़ा की पुष्टि की और कर्नाटक हाईकोर्ट ने भी इसे काफी हद तक बरकरार रखा। हाईकोर्ट ने IPC की धारा 304A के तहत दी गई छह महीने की सज़ा कायम रखी थी।

    इससे असंतुष्ट होकर ड्राइवर ने सुप्रीम कोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया।

    फैसला

    विवादित आदेश रद्द करते हुए जस्टिस अंजारिया द्वारा लिखे गए फैसले में बस कंडक्टर (PW6) की गवाही पर काफी भरोसा किया गया, जिसने कहा था कि उसने पहले ड्राइवर को बस रोकने का इशारा किया और बाद में उसे तभी आगे बढ़ने का निर्देश दिया था जब यात्री उतर चुके थे।

    इस गवाही को अहम मानते हुए कोर्ट ने कहा कि पब्लिक बसों के संचालन में कंडक्टर और ड्राइवर के बीच ज़िम्मेदारियों का बँटवारा ज़रूरी होता है।

    कोर्ट ने कहा,

    "यह कंडक्टर ही होता है जो ड्राइवर को सही तरीके से इशारा करता है कि बस शुरू करे या रुकने के बाद फिर से शुरू करे, जब यात्री बस से उतर चुके हों। बस का ड्राइवर, जो आम तौर पर ड्राइविंग पर ध्यान दे रहा होता है, बस की गति को मॉनिटर और कंट्रोल करने के लिए कंडक्टर के इशारों, संकेतों या सीटी पर निर्भर रहता है। ड्राइवर का ध्यान सुरक्षा के लिहाज़ से बस चलाने पर ही रहना चाहिए, जबकि वह बस को शुरू करने, रोकने और आगे बढ़ाने के लिए कंडक्टर के इशारों का पालन करेगा।"

    कोर्ट ने आगे कहा कि महज़ किसी दुर्घटना को 'लापरवाही और असावधानी' भरा काम नहीं कहा जा सकता, जब तक कि अभियोजन पक्ष खास सबूतों के ज़रिए जानबूझकर की गई लापरवाही या असावधानी को साबित न कर दे।

    कोर्ट ने कहा,

    "आखिरकार, यह कंडक्टर ही था, जिसे बस की सही गति सुनिश्चित करनी थी और जो, जैसा भी मामला हो, बस के अंदर कदम रखता या बस से उतरता। सबूतों से यह ज़ाहिर नहीं होता कि ड्राइवर लापरवाह था और उसकी लापरवाही के कारण ही उक्त यात्री - शोभा - बस से उतरते समय बस से गिर गई।"

    Cause Title: MOHAMMAD HANIF JAINUM KHALIFA VERSUS THE STATE OF KARNATAKA

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