'चुनावों में काला धन लोकतंत्र को भ्रष्ट करता है': सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों के दौरान बिना हिसाब-किताब वाले कैश पर रोकने के लिए जारी किए निर्देश

Shahadat

17 Aug 2026 10:31 PM IST

  • चुनावों में काला धन लोकतंत्र को भ्रष्ट करता है: सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों के दौरान बिना हिसाब-किताब वाले कैश पर रोकने के लिए जारी किए निर्देश

    सुप्रीम कोर्ट ने सोमवार (17.08.2026) को चुनावों में काले धन के इस्तेमाल को रोकने के लिए निर्देश जारी किए। कोर्ट ने कहा कि वोटरों को प्रभावित करने के लिए इस्तेमाल किया जाने वाला बिना हिसाब-किताब का कैश स्वतंत्र और निष्पक्ष चुनावों की नींव पर चोट करता है और "लोकतंत्र की मूल भावना" से समझौता करता है।

    जस्टिस संजय करोल और जस्टिस नोंगमेइकापम कोटिश्वर सिंह की बेंच ने कर्नाटक हाईकोर्ट के 2015 के एक आदेश के खिलाफ अपील पर सुनवाई करते हुए ये निर्देश जारी किए। हाईकोर्ट ने उस आदेश में प्रतिवादी के खिलाफ दर्ज FIR रद्द की। प्रतिवादी प्रतीक पारसरामपुरिया, 2014 में बेल्लारी से लोकसभा उपचुनाव में उम्मीदवार थे और उन पर आरोप था कि उन्होंने वोटरों को रिश्वत देने के लिए भारी मात्रा में कैश जमा किया। हाईकोर्ट ने इस आधार पर FIR रद्द की कि शिकायत में यह नहीं बताया गया कि आरोपी किसे रिश्वत देना चाहता था या उसने रिश्वत देने का क्या तरीका सोचा था।

    अपील पर सुनवाई करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने चुनावों में काले धन के बड़े सिस्टम से जुड़े मुद्दे की जांच करने के लिए कार्यवाही का दायरा बढ़ाया और भारत के चुनाव आयोग, केंद्र सरकार और सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को नोटिस जारी किया। सीनियर एडवोकेट गौरव अग्रवाल और एडवोकेट (डॉ.) स्वप्निल त्रिपाठी को 'अमिकस क्यूरी' (न्यायालय के मित्र) के तौर पर नियुक्त किया गया।

    कोर्ट ने कहा,

    "अगर अपनी बात कहने का यह एकमात्र मौका ही दागदार हो तो यह कहना गलत नहीं होगा कि लोकतंत्र की मूल भावना - जो लोगों का, लोगों द्वारा और लोगों के लिए शासन है - खतरे में पड़ जाती है।"

    कोर्ट ने आगे कहा,

    "बाहरी कारकों से प्रभावित होकर किया गया चुनाव, लोगों का अपना चुनाव नहीं रह जाता। यह किसी और की पसंद होती है जो उन पर थोपी जाती है।"

    बेंच ने प्राचीन एथेंस से लेकर आज के प्रतिनिधि स्वरूप तक लोकतंत्र के विकासक्रम को देखा और कहा कि लोकतंत्र, कानून का शासन और चुनावी प्रक्रिया - ये तीनों विचार "एक-दूसरे से अटूट रूप से जुड़े हुए हैं," और अगर इनमें से किसी एक से भी समझौता किया जाता है, तो इसका असर तीनों पर पड़ता है।

    जस्टिस संजय करोल द्वारा लिखे गए फैसले में इंदिरा नेहरू गांधी बनाम राज नारायण मामले में जस्टिस एच.आर. खन्ना की सहमति वाली राय का हवाला दिया गया, जिसमें कहा गया कि लोकतंत्र "वास्तव में तभी काम कर सकता है जब यह भरोसा हो कि चुनाव स्वतंत्र और निष्पक्ष हैं, न कि उनमें धांधली या हेरफेर की गई।"

    अनूप बरनवाल बनाम भारत संघ मामले में संविधान पीठ के फ़ैसले का भी ज़िक्र किया गया, जिसमें कोर्ट ने कहा कि "बैलेट (मतपत्र) सबसे शक्तिशाली बंदूक से भी ज़्यादा ताकतवर होता है।"

    भारत के संविधान के अनुच्छेद 324 के तहत भारत निर्वाचन आयोग की संवैधानिक भूमिका पर चर्चा करते हुए पीठ ने आयोग की शक्तियों से जुड़े स्थापित सिद्धांतों को दोहराया और कहा कि उसका अधिकार क्षेत्र "चुनावों को सुचारू रूप से कराने के लिए ज़रूरी सभी शक्तियों को शामिल करने के लिए काफ़ी व्यापक है।"

    कोर्ट ने 1975 में कंवर लाल गुप्ता बनाम अमर नाथ चावला मामले में जस्टिस पीएन भगवती की इस टिप्पणी से लेकर आगे के घटनाक्रमों पर गौर किया कि उम्मीदवारों के बीच बेहिसाब आर्थिक असमानता "लोकतंत्र-विरोधी असर" पैदा करती है। इसमें 1990 की गोस्वामी समिति की रिपोर्ट, अपराध सिंडिकेट और राजनीति के बीच सांठगांठ पर 1993 की वोहरा समिति की रिपोर्ट और 255वीं विधि आयोग की रिपोर्ट (2015) शामिल हैं। विधि आयोग की रिपोर्ट में कहा गया कि "नोट पहले कंटेनरों में आते हैं, फिर ट्रकों में भरकर आते हैं, उसके बाद थोक या छोटे खुदरा रूपों में बंटते हैं और आखिर में सूटकेस और लोगों की जेबों तक पहुँचते हैं।"

    पीठ ने भारत निर्वाचन आयोग द्वारा पेश किए गए आंकड़ों पर भी ध्यान दिया। इन आंकड़ों से पता चला कि 2024 के लोकसभा चुनावों के दौरान 3,87,430 FIR दर्ज की गईं, लेकिन उनमें से केवल लगभग 42.9% (1,66,044) मामलों में ही सज़ा हो पाई, जबकि बाकी मामले अभी भी ट्रायल या जांच के चरण में हैं।

    इसके अलावा, कोर्ट ने आयोग की उस चिंता का भी ज़िक्र किया, जिसमें कहा गया कि सत्ता बदलने के बाद सरकार चुनाव से जुड़े मुकदमों को एकतरफा तौर पर वापस ले लेती है। इसके लिए आयोग द्वारा मुख्य सचिवों को भेजे गए उस संदेश का हवाला दिया गया जिसमें कहा गया कि ऐसे मामलों को वापस लेने से "गलत संदेश जाता है कि उपद्रवी बिना किसी डर के चुनावी गड़बड़ी और अपराध कर सकते हैं, क्योंकि उन मामलों को बाद में वापस लिया जा सकता है।"

    एमिक्स क्यूरी (डॉ.) स्वप्निल त्रिपाठी ने कोर्ट के सामने 'चुनाव मामलों में वैश्विक तौर-तरीके' पर एक नोट पेश किया, जिसमें ऑस्ट्रेलिया, बांग्लादेश, कनाडा और इंडोनेशिया सहित सोलह देशों/क्षेत्रों की स्थिति की तुलना की गई। इसमें बताया गया कि ज़्यादातर जगहों पर चुनाव-अपराध के मामलों में मुकदमा चलाने या उन्हें वापस लेने का फ़ैसला पूरी तरह से सरकारी वकीलों (पब्लिक प्रॉसिक्यूटर) का होता है और इसमें चुनाव प्रबंधन संस्था की कोई भूमिका नहीं होती।

    निर्देश जारी किए गए

    एमिक्स क्यूरी (न्यायालय के सहयोगी) और चुनाव आयोग के सुझावों पर विचार करते हुए सुप्रीम कोर्ट ने निम्नलिखित निर्देश जारी किए:

    1. कैश या संपत्ति ज़ब्त करने वाली किसी भी अथॉरिटी को 24 घंटे के भीतर संबंधित ज़िला मजिस्ट्रेट, अतिरिक्त ज़िला मजिस्ट्रेट या कोर्ट को इसकी सूचना देनी होगी। साथ ही, लिखित कारण भी बताने होंगे जिनसे यह पता चले कि इसका किसी संदिग्ध चुनावी अपराध से प्रथम दृष्टया (prima facie) संबंध है।

    2. जांच अधिकारियों को FIR दर्ज होने के एक साल के भीतर जांच पूरी करने की हर संभव कोशिश करनी चाहिए। किसी भी देरी को लिखित रूप में दर्ज किया जाना चाहिए और भारत के चुनाव आयोग को इसकी सूचना दी जानी चाहिए।

    3. संबंधित सीनियर सुपरिटेंडेंट या डिप्टी कमिश्नर ऑफ़ पुलिस की मंज़ूरी के बाद नोडल अधिकारी के ज़रिए चुनाव आयोग को जांच की तिमाही स्टेटस रिपोर्ट सौंपी जानी चाहिए।

    4. जब स्टैटिक सर्विलांस टीम (SST) को 10 लाख रुपये से ज़्यादा कैश मिलता है तो इसकी सूचना इनकम टैक्स अधिकारियों को दी जानी चाहिए।

    5. हर पांच साल में होने वाले चुनाव चक्र को देखते हुए हाईकोर्ट को उम्मीदवारों और मौजूदा सांसदों या विधायकों के ख़िलाफ़ दर्ज मामलों के तेज़ी से निपटारे के लिए स्पेशल कोर्ट तय करने चाहिए।

    'केरल राज्य बनाम के. अजित' और 'अश्विनी कुमार उपाध्याय बनाम भारत संघ' के मामलों के अनुसार, चुनाव चक्र के दौरान उम्मीदवारों के ख़िलाफ़ मुक़दमा वापस लेने के लिए संबंधित हाईकोर्ट की मंज़ूरी ज़रूरी है।

    2024 के लोकसभा चुनाव और 2019-25 के विधानसभा चुनावों से जुड़े मामलों के बड़ी संख्या में लंबित होने पर ध्यान देते हुए कोर्ट ने संबंधित अदालतों को निर्देश दिया कि वे मामलों को जल्द से जल्द तार्किक निष्कर्ष तक पहुँचाने की पूरी कोशिश करें।

    सुप्रीम कोर्ट ने भारत के चुनाव आयोग और संबंधित सरकारों को 18 नवंबर, 2026 को या उससे पहले अनुपालन रिपोर्ट (Compliance Report) दाखिल करने का निर्देश दिया।

    Case Title: State of Karnataka & Anr. v Prathik Parasrampuria

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