Bar Council Elections : सुप्रीम कोर्ट ने हाईकोर्ट चीफ जस्टिस को पूर्व जजों या वकीलों में से 2 महिला सदस्यों को को-ऑप्ट करने की इजाज़त दी
Shahadat
4 Aug 2026 4:24 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने मंगलवार को निर्देश दिया कि स्टेट बार काउंसिल में शामिल की जाने वाली दो महिला सदस्यों को हाईकोर्ट की पूर्व महिला जजों या बार में अच्छी प्रतिष्ठा वाली सीनियर महिला वकीलों में से चुना जाए। कोर्ट का मानना है कि इस तरीके से काउंसिल के कामकाज में "निष्पक्षता, स्वतंत्रता और पारदर्शिता" आएगी।
कोर्ट ने संबंधित हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को इन दो सदस्यों को नॉमिनेट करने की इजाज़त दी।
चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया (CJI) सूर्यकांत, जस्टिस जॉयमाल्य बागची और जस्टिस वी. मोहना की बेंच स्टेट बार काउंसिल चुनावों से जुड़े कई मामलों की सुनवाई कर रही थी। इन मामलों में महिलाओं का प्रतिनिधित्व, सदस्यों को शामिल करने (को-ऑप्शन) का तरीका और ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम जैसे मुद्दे शामिल थे।
कोर्ट ने पहले ही बार काउंसिल में महिलाओं के लिए 30% आरक्षण अनिवार्य किया था और यह भी साफ किया था कि 10% सदस्यों को को-ऑप्ट किया जा सकता है। हालांकि, को-ऑप्शन को कैसे लागू किया जाए, इसे लेकर उलझन बनी हुई थी। कोर्ट ने BCI को निर्देश दिया था कि वह सभी संबंधित पक्षों की राय लेने के बाद इस पर एक प्रस्ताव को अंतिम रूप दे।
कोर्ट ने विचार के लिए दो मुख्य सवाल तय किए: पहला, स्टेट बार काउंसिल में महिला सदस्यों को को-ऑप्ट करने के लिए सही "विचार का दायरा" (Zone of Consideration) क्या हो, और दूसरा, बार काउंसिल चुनावों में ट्रांसफरेबल वोटों की गिनती का सही तरीका क्या हो।
को-ऑप्शन के मुद्दे पर बेंच ने गौर किया कि अलग-अलग स्टेट बार काउंसिल का प्रतिनिधित्व करने वाले बार सदस्यों के साथ खुली अदालत में व्यापक चर्चा हुई थी। बेंच ने यह भी दर्ज किया कि संबंधित हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को को-ऑप्ट की जाने वाली महिला सदस्यों को नॉमिनेट करने का अधिकार देने पर आम सहमति बनी थी।
कोर्ट ने अपने आदेश में दर्ज किया,
"इस बात पर आम सहमति है कि संबंधित हाईकोर्ट के चीफ जस्टिस को हाईकोर्ट की पूर्व महिला जज या बार की सीनियर प्रैक्टिसिंग महिला वकील को स्टेट बार काउंसिल की को-ऑप्टेड महिला सदस्य के तौर पर नॉमिनेट करने का अधिकार दिया जा सकता है।"
सुझाव को मानते हुए बेंच ने निर्देश दिया:
"हमारी राय में इससे स्टेट बार काउंसिल के कामकाज में निष्पक्षता, स्वतंत्रता और पारदर्शिता आएगी। इसलिए हम निर्देश देते हैं कि स्टेट बार काउंसिल में शामिल की जाने वाली दो महिला सदस्यों को संबंधित हाई कोर्ट की पूर्व महिला जजों या बार में अच्छी प्रतिष्ठा रखने वाली वरिष्ठ महिला सदस्यों में से चुना जाए।"
कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि स्टेट बार काउंसिल चुनाव में असफल रहने वाले उम्मीदवार को को-ऑप्शन (सह-चयन) के लिए विचार किए जाने से अयोग्य नहीं माना जाएगा।
बार काउंसिल की सीटों में बढ़ोतरी पर
सुनवाई के दौरान, कुछ याचिकाकर्ताओं की ओर से सीनियर एडवोकेट गोपाल शंकरनारायणन ने स्टेट बार काउंसिल की सीटों को बढ़ाने के बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) के हालिया प्रस्ताव का मुद्दा उठाया। बाद में चुनाव पर्यवेक्षण समिति ने BCI के प्रस्ताव पर रोक लगाई। शंकरनारायणन ने कहा कि BCI सीटों की कानूनी सीमा में बदलाव नहीं कर सकता। साथ ही तर्क दिया कि ऐसा उन लोगों को शामिल करने के लिए किया जा रहा था जो महिलाओं के लिए आरक्षण लागू होने के कारण बाहर हो गए।
उन्होंने कहा,
"BCI वकीलों के लिए देश की सर्वोच्च नियामक संस्था है। मुझे हैरानी है कि यह संसदीय कानून के खिलाफ प्रस्ताव पारित कर सकती है, जो सीटों की सीमा 25 तय करता है।"
हालांकि, सीनियर एडवोकेट एस कन्नन ने तर्क दिया कि महिलाओं का आरक्षण सीटों की कानूनी सीमा से ऊपर ही हो सकता है, क्योंकि एडवोकेट्स एक्ट में 'सिंगल ट्रांसफरेबल वोट' की व्यवस्था है।
उन्होंने कहा,
"कोई भी महिला सदस्यों को प्रतिनिधित्व देने का विरोध नहीं कर रहा है। हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि धारा 3(2) के तहत कानूनी प्रक्रिया को खत्म कर दिया जाए। किसी को 2000 से ज़्यादा वोट मिले हैं और एक महिला को 46 वोट मिले हैं। उसे प्राथमिकता दें लेकिन उसके दूसरे ट्रांसफरेबल वोट की गिनती न करें। ऐसा कैसे हो सकता है? मैं 30% आरक्षण का विरोध नहीं कर रहा हूं। यह 25 सदस्यों से ज़्यादा हो सकता है या 25 सदस्यों के भीतर ही, यह विचार करने का विषय है।"
सुनवाई के दौरान, CJI सूर्य कांत ने कहा कि महिलाओं के लिए 30% प्रतिनिधित्व का निर्देश देते समय कोर्ट ने कभी भी स्टेट बार काउंसिल की कानूनी संख्या बढ़ाने के बारे में नहीं सोचा था।
CJI ने कहा,
"जब हमने प्रतिनिधित्व की बात की, तो हमने कभी नहीं सोचा था कि स्टेट बार काउंसिल की संख्या बढ़ाई जाएगी। हमारे दिमाग में 25 की संख्या थी। तीस प्रतिशत का मतलब आठ था। अगर कल स्टेट बार काउंसिल की संख्या बढ़ाई जाती है तो महिलाएं उस बढ़ी हुई संख्या में भी हिस्सेदारी की हकदार होंगी।"
गौरतलब है कि इससे पहले की सुनवाई में भी चीफ जस्टिस ने ऐसी ही राय जाहिर की थी कि अगर सीटें बढ़ाई जाती हैं तो महिलाओं के आरक्षण को भी उसी अनुपात में बढ़ाना होगा।
CJI सूर्य कांत ने कहा कि इस मुद्दे पर अलग-अलग राय सामने आई हैं और बार के सदस्यों से कहा कि वे जस्टिस सुधांशु धूलिया की अध्यक्षता वाली हाई-पावर्ड कमेटी के सामने अपने सुझाव रखें।
सुनवाई के दौरान CJI ने कहा,
"विवाद ट्रांसफरेबल वोट (हस्तांतरणीय वोट) के तरीके को लेकर भी है। जस्टिस धूलिया की कमेटी को कागज पर अपनी राय या सुझाव दें। उन्होंने कहा है कि अगर 20 राय हैं, तो वे सभी लिखित में होनी चाहिए। इसलिए इस मुद्दे को वहीं सुलझाया जाए।"
बेंच ने सुपरवाइजरी कमेटी के सदस्य सीनियर एडवोकेट वी गिरी से भी बात की, जिन्होंने BCI के सीटें बढ़ाने के कदम पर आपत्ति जताई। उन्होंने कहा कि यह उस स्थापित नियम का उल्लंघन है कि "खेल शुरू होने के बाद खेल के नियम नहीं बदले जा सकते।"
सीनियर एडवोकेट शोभा गुप्ता, विभा दत्ता मखीजा आदि भी अन्य याचिकाकर्ताओं की ओर से पेश हुए।
BCI की ओर से एडवोकेट राधिका गौतम ने बताया कि काउंसिल ने भी एक रिपोर्ट सौंपी।
कोर्ट ने अपने आदेश में कहा कि ट्रांसफरेबल वोट पर अलग-अलग राय पर जस्टिस धूलिया कमेटी को विस्तार से विचार करने की जरूरत है। कोर्ट ने बार के सदस्यों को लिखित सुझाव देने की इजाजत दी और निर्देश दिया कि कमेटी अंतिम फैसला लेने से पहले मौखिक सुनवाई का मौका भी दे सकती है।
Case Title – M. Varadhan v. Union of India


