बैंक बड़ी कंपनियों को भारी लोन देने में लापरवाह, लेकिन आम लोगों को मामूली लोन देने में भी बहुत सख़्त: सुप्रीम कोर्ट

Shahadat

20 May 2026 9:04 PM IST

  • बैंक बड़ी कंपनियों को भारी लोन देने में लापरवाह, लेकिन आम लोगों को मामूली लोन देने में भी बहुत सख़्त: सुप्रीम कोर्ट

    सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में टिप्पणी की कि आम तौर पर बैंक बड़ी कंपनियों को भारी रकम लोन के तौर पर देने में बहुत लापरवाह हो गए हैं, लेकिन जब आम लोगों की बात आती है तो वे बहुत ज़्यादा छानबीन करते हैं, जो अक्सर "उत्पीड़न की सीमा तक" पहुंच जाती है।

    ये टिप्पणियाँ जस्टिस अहसानुद्दीन अमनुल्लाह और जस्टिस आर. महादेवन की बेंच ने एक ऐसे मामले में कीं, जिसमें याचिकाकर्ता कंपनी भास्कर इंटरनेशनल प्राइवेट लिमिटेड को भारतीय स्टेट बैंक (SBI) ने बिना यह ठीक से जाँच किए कि लोन चुकाया जा पाएगा या नहीं, 8,90,000 रुपये का लोन दिया था।

    याचिकाकर्ता कंपनी लोन की पहली किस्त भी नहीं चुका पाई और छह साल तक डिफ़ॉल्ट करती रही, जिसके बाद SBI ने उनकी संपत्तियों पर कब्ज़ा करने की कार्रवाई शुरू की।

    बेंच ने कहा कि SBI याचिकाकर्ता की लोन चुकाने की क्षमता का आकलन करने में साफ़ तौर पर लापरवाह है, लेकिन उसने याचिका पर विचार करने से इनकार किया:

    "हम यह बताना चाहते हैं कि कोर्ट के संज्ञान में यह बात आ रही है कि आम तौर पर बैंक—जिसमें प्रतिवादी नंबर 1-SBI भी शामिल है—बड़े संस्थानों को भारी रकम के लोन देने में लापरवाह होते हैं। हालांकि, इसके साथ ही छोटे लोन के मामले में बहुत सख़्त होते हैं, जब आम लोग अपनी निजी ज़रूरतों के लिए आते हैं। ऐसे में वे उन पर ज़्यादा सख़्त शर्तें थोपते हैं और एक थकाने वाली प्रक्रिया से गुज़ारते हैं, जो कुछ मामलों में उत्पीड़न की सीमा तक पहुंच सकती है।"

    संक्षेप में मामला

    याचिकाकर्ता को 2019 में लोन दिया गया था, लेकिन उसने पहली ही किस्त चुकाने में डिफ़ॉल्ट कर दिया, जिसके बाद खाते को 'नॉन-परफ़ॉर्मिंग एसेट' (NPA) घोषित कर दिया गया।

    SBI ने याचिकाकर्ता की अचल संपत्तियों पर कब्ज़ा करने की कोशिश की। इस संबंध में 2024 में ज़िला मजिस्ट्रेट ने बैंक के पक्ष में एक आदेश पारित किया। इसके बाद बैंक ने आदेश को लागू करवाने के लिए हाईकोर्ट का दरवाज़ा खटखटाया, जिसने जनवरी 2025 में कानून के अनुसार इसकी अनुमति दी। इस आदेश के ख़िलाफ़ याचिकाकर्ता कंपनी ने सुप्रीम कोर्ट में अपील की।

    सुनवाई के दौरान, सीनियर एडवोकेट नचिकेता जोशी (कंपनी की ओर से) ने दलील दी कि अकाउंट को NPA घोषित करना मनमाना फ़ैसला है, क्योंकि याचिकाकर्ताओं ने पूरी मूल राशि चुकाने का प्रस्ताव दिया था, लेकिन उसे स्वीकार नहीं किया गया।

    इसका विरोध करते हुए एडिशनल सॉलिसिटर जनरल अर्चना पाठक दवे (SBI की ओर से) ने तर्क दिया कि याचिकाकर्ता का आचरण भरोसे लायक नहीं है। इसके अलावा, उन्होंने मजिस्ट्रेट के आदेश के पालन के खिलाफ़ कर्ज़ वसूली ट्रिब्यूनल (Debts Recovery Tribunal) में अर्ज़ी दी थी।

    बेंच ने याचिकाकर्ता के रवैये पर टिप्पणी करते हुए कहा कि 6 साल तक कर्ज़ न चुकाने (डिफ़ॉल्ट) के बाद अब मूल राशि चुकाने की पेशकश करना बहुत देर हो चुकी है। बेंच ने खास तौर पर यह भी कहा कि SBI के रवैये को भी नज़रअंदाज़ नहीं किया जा सकता, क्योंकि उन्होंने एक ऐसी कंपनी को कर्ज़ देने में लापरवाही बरती, जो कर्ज़ चुकाने में सक्षम नहीं थी।

    आगे कहा गया,

    "इस मामले में हमने पाया कि SBI और उसके अधिकारियों ने याचिकाकर्ता नंबर 1-कंपनी को 8,09,00,000 रुपये का भारी-भरकम कर्ज़ देने/मंज़ूर करने में लापरवाही बरती है। इसकी वजह यह है कि याचिकाकर्ता कर्ज़ चुकाना शुरू भी नहीं कर पाए और पहली ही बार में डिफ़ॉल्ट कर दिया। मोटे तौर पर यह इस बात का साफ़ संकेत है कि SBI के संबंधित अधिकारियों ने कर्ज़ लेने वाले याचिकाकर्ताओं की कर्ज़ चुकाने की क्षमता का ठीक से आकलन नहीं किया था।"

    बेंच ने SLP (विशेष अनुमति याचिका) खारिज की, लेकिन अंतिम रियायत के तौर पर याचिकाकर्ता को DRT के सामने अंतरिम राहत मांगने के लिए दो हफ़्तों तक संपत्तियों पर 'यथास्थिति' (status quo) बनाए रखने का आदेश दिया।

    बेंच ने आगे यह भी साफ़ किया कि उनकी टिप्पणियों को कर्ज़ देने के नियमों और शर्तों में ढील देने के सुझाव के तौर पर गलत नहीं समझा जाना चाहिए।

    हालांकि बेंच ने यह भी जोड़ा कि आम लोगों के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को थोड़ा आसान बनाया जा सकता है:

    "बैंकों के इस तरह के कामकाज पर अपनी नाराज़गी ज़ाहिर करते हुए हम इस मामले को किसी और ज़्यादा उपयुक्त मामले के लिए छोड़ देते हैं, जहां बैंकों (जिनमें प्रतिवादी नंबर 1-SBI भी शामिल है) की ऐसी कार्यप्रणालियों के खिलाफ़ खास आदेश देने की ज़रूरत पड़ सकती है। ताकि कोई गलतफ़हमी न हो, यह ध्यान रखा जाए कि हम किसी भी तरह से कर्ज़ सुविधाओं के नियमों और शर्तों में ढील देने का सुझाव नहीं दे रहे हैं। यह काम रिज़र्व बैंक ऑफ़ इंडिया और संबंधित बैंकों पर ही छोड़ देना बेहतर है। लेकिन, कर्ज़ चाहने वालों/आवेदकों के लिए अपनाई जाने वाली प्रक्रिया को निश्चित रूप से ज़्यादा आसान और निष्पक्ष बनाया जा सकता है। उसके बाद कर्ज़ वसूली के चरण में भी ऐसा किया जा सकता है।"

    अदालत ने कहा कि कर्ज़ पर रियायत और प्रोत्साहन से जुड़ी नीति इस तरह से बनाई जानी चाहिए, जिससे सामाजिक/आर्थिक रूप से सबसे निचले तबके के व्यक्ति को ज़्यादा से ज़्यादा फ़ायदा मिल सके। अदालत ने ASG दवे से कहा कि वे अपने पद का इस्तेमाल करते हुए इन सुझावों को SBI तक पहुंचाएं।

    Case Details: M/S BHASKAR INTERNATIONAL PRIVATE LIMITED & ORS. v STATE BANK OF INDIA & ORS.|Special Leave to Appeal (Civil) No.3313/2025

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