मेडिकल प्रोफेशनल्स को डराने या उन पर हमला करने की किसी भी कोशिश को बर्दाश्त नहीं किया जा सकता: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
3 Oct 2026 9:27 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने हाल ही में कहा कि शारीरिक हिंसा, डराने-धमकाने या ज़बरदस्ती के डर के बीच डॉक्टरों से सही और स्वतंत्र पेशेवर फ़ैसला लेने की उम्मीद नहीं की जा सकती। कोर्ट ने इस बात पर ज़ोर दिया कि मेडिकल प्रोफेशनल्स की सुरक्षा और सम्मान, सही तरीके से हेल्थकेयर देने के लिए ज़रूरी सुरक्षा उपाय हैं।
कोर्ट ने यह भी कहा कि इलाज को लेकर शिकायतें, चाहे कितनी भी सही क्यों न हों, हिंसा का सहारा लेने को सही नहीं ठहरा सकतीं। कोर्ट ने ज़ोर दिया कि ऐसे व्यवहार की इजाज़त देने से उन हालात पर बुरा असर पड़ेगा, जिनमें मेडिकल प्रोफेशनल्स को मरीज़ों की ज़िंदगी और सेहत से जुड़े फ़ैसले लेने होते हैं।
कोर्ट ने बताया कि डॉक्टर की ज़िम्मेदारी सिर्फ़ पेशेवर सेवा देने तक सीमित नहीं है, क्योंकि मरीज़ अपनी सेहत और गंभीर मामलों में अपनी ज़िंदगी डॉक्टर के हाथों में सौंपते हैं। कोर्ट ने कहा कि डॉक्टर-मरीज़ का रिश्ता भरोसे, विश्वास और भरोसा दिलाने पर टिका होता है।
मेडिकल प्रैक्टिस, खासकर अस्पतालों और इमरजेंसी की ज़रूरतों पर बात करते हुए कोर्ट ने कहा कि डॉक्टरों को अक्सर कुछ ही पलों में मरीज़ों का आकलन करना होता है। अहम फ़ैसले लेने होते हैं, कभी-कभी तो पूरी जानकारी के बिना भी। ऐसे फ़ैसले लेने के लिए उन्हें शांत, फ़ोकस्ड और स्वतंत्र पेशेवर फ़ैसला लेने के लिए आज़ाद रहने की ज़रूरत होती है।
कोर्ट ने कहा,
"इसलिए ऐसी ज़िम्मेदारी निभाने के लिए सही माहौल मेडिकल प्रोफेशनल के लिए सिर्फ़ सुविधा की बात नहीं है। यह सही तरीके से मेडिकल केयर देने के लिए ज़रूरी शर्त है। शारीरिक हिंसा, डराने-धमकाने या ज़बरदस्ती के डर के बीच डॉक्टर से सही और स्वतंत्र फ़ैसला लेने की उम्मीद नहीं की जा सकती। नतीजतन, मेडिकल प्रोफेशनल की सुरक्षा और सम्मान कोई निजी विशेषाधिकार नहीं हैं। ये वे सुरक्षा उपाय हैं, जो बड़े जनहित में यह पक्का करते हैं कि मेडिकल केयर उसी एकाग्रता, शांति और समझदारी के साथ दी जाए, जिसकी यह पेशा मांग करता है।"
जस्टिस विक्रम नाथ और जस्टिस संदीप मेहता की बेंच ने ये बातें तब कहीं जब उन्होंने कल्याण-डोंबिवली म्युनिसिपल कॉर्पोरेशन के कॉर्पोरेटर रमेश म्हात्रे और तीन अन्य लोगों की ज़मानत रद्द की। इन लोगों पर इस साल जुलाई में महाराष्ट्र के डोंबिवली में शास्त्री नगर म्युनिसिपल हॉस्पिटल में डॉक्टरों और मेडिकल स्टाफ़ के साथ मारपीट करने का आरोप है।
कोर्ट ने कहा कि बॉम्बे हाईकोर्ट ने आरोपियों की ज़मानत बहाल करते समय कुछ ज़रूरी बातों पर ध्यान नहीं दिया, जैसे कि म्हात्रे का आपराधिक इतिहास, उसका प्रभाव और कथित हमले का मेडिकल जगत पर असर।
कोर्ट ने म्हात्रे और तीन अन्य आरोपियों को 5 अक्टूबर, 2026 तक ट्रायल कोर्ट के सामने सरेंडर करने का निर्देश दिया। हालांकि, कोर्ट ने यह भी साफ़ किया कि अगर हालात में कोई बड़ा बदलाव होता है, तो वे अपनी ज़मानत की अर्ज़ी फिर से दाखिल कर सकते हैं।
सुप्रीम कोर्ट ने राज्य सरकार को यह भी निर्देश दिया कि वह स्वतंत्र रूप से जांच करे कि क्या इस मामले में प्रिवेंटिव डिटेंशन (एहतियाती हिरासत) कानूनों के प्रावधान लागू होते हैं या नहीं।
यह मामला 6 जुलाई, 2026 को डोंबिवली के शास्त्री नगर म्युनिसिपल हॉस्पिटल में तीन डॉक्टरों (जिनमें एक महिला डॉक्टर भी शामिल थीं) पर हुए कथित हमले से जुड़ा है। अभियोजन पक्ष के अनुसार, रमेश म्हात्रे और तीन अन्य लोगों ने लेबर पेन से गुज़र रही एक गर्भवती महिला को शिफ्ट करने को लेकर हुए विवाद के बाद डॉक्टरों के साथ मारपीट और बदसलूकी की थी। अगले दिन भारतीय न्याय संहिता (BNS) और महाराष्ट्र मेडिकेयर एक्ट की विभिन्न धाराओं के तहत FIR दर्ज की गई।
एक मजिस्ट्रेट ने 14 जुलाई को म्हात्रे को और 17 जुलाई को तीन अन्य आरोपियों को ज़मानत दी थी। घटना को लेकर जनता की चिंता के बाद बॉम्बे हाईकोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया और ज़मानत के आदेशों पर रोक लगाते हुए म्हात्रे को सरेंडर करने का निर्देश दिया। हालांकि, 7 अगस्त को कोर्ट ने उनकी ज़मानत बहाल की, लेकिन कुछ शर्तें भी लगाईं, जैसे कि ट्रायल शुरू होने तक महाराष्ट्र से बाहर रहना और गवाहों से संपर्क न करना। राज्य सरकार ने इस फ़ैसले को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी।
Case Title : STATE OF MAHARASHTRA vs. RAMESH SUKRYA MHATRE

