वकीलों को वैवाहिक विवादों में अपने मुवक्किलों को बेबुनियाद केस दायर करने से रोकना चाहिए: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
29 May 2026 7:49 PM IST

सुप्रीम कोर्ट ने शुक्रवार (29 मई) को वैवाहिक विवादों में झूठे और परेशान करने वाले आपराधिक मामले दायर करने के बढ़ते चलन की कड़ी निंदा की। कोर्ट ने कहा कि अदालतों के साथ-साथ बार के सदस्यों को भी अलग हो चुके पति-पत्नी के बीच निजी हिसाब-किताब चुकाने के लिए आपराधिक कानून के दुरुपयोग को रोकने के लिए सक्रिय रूप से काम करना चाहिए।
कोर्ट ने कहा,
"वैवाहिक विवादों के क्षेत्र में बेबुनियाद और झूठे आरोपों पर आधारित परेशान करने वाले मुकदमों को अदालतों और बार के सदस्यों द्वारा हतोत्साहित किया जाना चाहिए। वकीलों को अपने मुवक्किलों को उनके जीवनसाथी के खिलाफ बेबुनियाद आपराधिक कार्यवाही शुरू करने के लिए उकसाने के बजाय, उन्हें ऐसा न करने की सलाह देनी चाहिए।"
जस्टिस बी.वी. नागरत्ना और जस्टिस उज्ज्वल भुइयां की खंडपीठ ने ये टिप्पणियां तब कीं, जब उन्होंने एक पति और उसके परिवार के सदस्यों के खिलाफ 10 से अधिक आपराधिक मामलों को रद्द किया। इन मामलों में POCSO एक्ट और भारतीय न्याय संहिता (BNS) के तहत बलात्कार से संबंधित आरोप भी शामिल थे।
कोर्ट ने 'अचिन गुप्ता बनाम हरियाणा राज्य, 2024 LiveLaw (SC) 343' मामले में की गई अपनी पिछली टिप्पणी को दोहराया, उस मामले में कोर्ट ने कहा था:
"...बार के सम्मानित सदस्यों की यह बहुत बड़ी सामाजिक जिम्मेदारी और कर्तव्य है कि वे यह सुनिश्चित करें कि पारिवारिक जीवन का ताना-बाना बर्बाद या नष्ट न हो। उन्हें यह सुनिश्चित करना चाहिए कि छोटी-मोटी घटनाओं को बढ़ा-चढ़ाकर आपराधिक शिकायतों में पेश न किया जाए। अधिकांश शिकायतें या तो उनकी सलाह पर या उनकी सहमति से ही दायर की जाती हैं। बार के सम्मानित सदस्य, जो एक नेक पेशे से जुड़े हैं, उन्हें इस पेशे की नेक परंपराओं को बनाए रखना चाहिए। उन्हें धारा 498A के तहत आने वाली हर शिकायत को एक बुनियादी मानवीय समस्या के तौर पर देखना चाहिए और दोनों पक्षों के बीच उस मानवीय समस्या का सौहार्दपूर्ण समाधान निकालने में मदद करने के लिए पूरी गंभीरता से प्रयास करना चाहिए। उन्हें अपनी पूरी क्षमता से अपने कर्तव्यों का निर्वहन करना चाहिए, ताकि समाज का ताना-बाना, शांति और सौहार्द बना रहे। बार के सदस्यों को यह भी सुनिश्चित करना चाहिए कि एक ही शिकायत के आधार पर कई अलग-अलग मामले न बन जाएं।"
मामले की पृष्ठभूमि
यह विवाद शिकायतकर्ता पत्नी और उसके पति के परिवार के बीच लंबे समय से चले आ रहे वैवाहिक कलह से जुड़ा है। दोनों पक्षों की शादी वर्ष 2008 में हुई थी और इस शादी से दो बच्चे हुए। वर्ष 2011 में शिकायतकर्ता पत्नी ने अपना वैवाहिक घर छोड़ दिया, जबकि बच्चे पति के परिवार के साथ ही रहे। पिछले कुछ वर्षों में दोनों पक्षों के बीच दस से अधिक आपराधिक और दीवानी मामले शुरू किए गए, जिनमें IPC की धारा 498A, घरेलू हिंसा अधिनियम, हत्या के प्रयास के आरोप और तलाक के मामले शामिल थे।
2024 में दायर की गई विवादित शिकायत में आरोप लगाया गया कि पति ने अपनी नाबालिग बेटी के साथ बलात्कार किया था और उसके चाचा ने भी उसके साथ यौन उत्पीड़न किया था, जबकि परिवार के अन्य सदस्यों ने बच्ची के साथ शारीरिक दुर्व्यवहार किया और उसे डराया-धमकाया।
फैसला
इलाहाबाद हाईकोर्ट का फैसला रद्द करते हुए जस्टिस नागरत्ना द्वारा लिखे गए फैसले में आरोपों को अस्पष्ट पाया गया; ये आरोप न तो किसी मेडिकल सबूत से समर्थित थे और न ही किसी बड़े बदले की भावना से की गई कानूनी कार्रवाई का हिस्सा थे।
कोर्ट ने खास तौर पर यह बात नोट की कि शिकायतकर्ता और पीड़ित महिला के बयान लगभग एक जैसे थे—"एक-एक शब्द हूबहू"—जो इस बात का संकेत था कि उन्हें शायद किसी ने सिखाया-पढ़ाया था।
बेंच ने टिप्पणी करते हुए कहा,
"तीनों बयानों में न तो कोई बदलाव किया गया, न ही कुछ जोड़ा गया और न ही कुछ घटाया गया; नतीजतन, तीनों बयान एक-दूसरे से लगभग पूरी तरह मेल खाते थे। यह मामला बयानों में एकरूपता होने का नहीं है, बल्कि यह मामला बयानों को लगभग तोते की तरह हूबहू दोहराने का है—जो शिकायतकर्ता और शायद उसके परिवार द्वारा सिखाए-पढ़ाए जाने का नतीजा है।"
कानूनी कार्रवाई रद्द करते हुए कोर्ट ने यह फैसला सुनाया कि अगर सामान्य और मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर किसी के खिलाफ आपराधिक मुकदमा चलने दिया जाए तो यह कानून की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा।
कोर्ट ने टिप्पणी करते हुए कहा,
"अगर किसी व्यक्ति को आरोपी बनाया जाता है और उसे सामान्य व मनगढ़ंत आरोपों के आधार पर आपराधिक मुकदमे का सामना करने के लिए मजबूर किया जाता है, जबकि उसके आपराधिक आचरण का कोई ठोस या विशिष्ट उदाहरण रिकॉर्ड पर मौजूद न हो तो यह कानून और कोर्ट की प्रक्रिया का दुरुपयोग माना जाएगा। इसलिए ऐसे मामलों में कानूनी सलाह देने वाले वकीलों का यह कर्तव्य है कि जब उनसे सलाह मांगी जाए तो वे अपने मुवक्किलों को इस तरह की झूठी या बेबुनियाद शिकायतें दर्ज करने से रोकें। इसके अलावा, वकीलों को ऐसी आपराधिक शिकायतें दर्ज करने की सलाह भी नहीं देनी चाहिए, जो झूठी या मनगढ़ंत हों—जिनका मकसद सिर्फ विरोधी पक्ष पर दबाव बनाए रखना हो ताकि वे शिकायतकर्ता की शर्तों पर समझौता करने के लिए मजबूर हो जाएं; या फिर, उन्हें सालों तक चलने वाले आपराधिक मुकदमे का सामना करना पड़े।"
इसके अलावा, कोर्ट ने यह भी नोट किया कि अस्पष्ट और सामान्य आरोपों के आधार पर परेशान करने वाले मुकदमे दायर करने से कोर्ट में मुकदमों का बोझ (Docket Explosion) बेतहाशा बढ़ जाता है।
कोर्ट ने टिप्पणी की,
“जब यह चलन है, तो दूसरी ओर, ऐसे लोग जो किसी झूठी/बेबुनियाद शिकायत के कारण अपनी गिरफ्तारी की आशंका रखते हैं, वे अग्रिम ज़मानत (Anticipatory Bail) पाने की कोशिश करते हैं; ये मामले कभी-कभी ट्रायल कोर्ट और हाईकोर्ट में असफल होने के बाद इस कोर्ट तक पहुंचते हैं। साथ ही हाईकोर्ट में ऐसी झूठी/बेबुनियाद शिकायतों को रद्द करवाने के लिए भी कदम उठाए जाते हैं, जिसकी अपनी ही अनिश्चितताओं की एक लंबी कहानी है, जिससे तथाकथित आरोपी पर अनावश्यक दबाव, उत्पीड़न, तनाव और मानसिक खिंचाव पड़ता है। इन सबका नतीजा यह होता है कि कोर्ट में मुकदमों का अंबार लग जाता है और उन पर काम का बोझ बढ़ जाता है, जिसके चलते सच्ची शिकायतों और मामलों को वह उचित समय और ध्यान नहीं मिल पाता, जिसकी उन्हें ज़रूरत होती है।”
साथ ही कोर्ट ने यह भी स्पष्ट किया कि उसकी ये टिप्पणियां केवल इस मौजूदा मामले के विशिष्ट तथ्यों तक ही सीमित हैं। इन्हें यौन शोषण या वैवाहिक क्रूरता की सच्ची शिकायतों को कमज़ोर करने के तौर पर नहीं देखा जाना चाहिए।
“हम इस तथ्य से भली-भांति अवगत हैं कि ऐसे कई उदाहरण हैं, जहां महिलाएं वैवाहिक विवादों और हिंसा से बुरी तरह प्रभावित होती हैं, जिसे उन्हें अपने पति और ससुराल वालों के हाथों सहना पड़ता है... ऐसे मामले हमारे पूरे ध्यान और न्यायिक जाँच के हकदार हैं।”
अंततः, कोर्ट ने सभी आरोपी परिवार के सदस्यों के खिलाफ दायर शिकायत, संज्ञान लेने के आदेश (Cognizance Order) और समन जारी करने का आदेश रद्द किया।
अत: अपील स्वीकार की गई।
Cause Title: ISHWAR CHAND SHARMA & OTHERS VERSUS STATE OF UTTAR PRADESH & ANOTHER

