आरोपी ट्रायल के सही स्टेज पर प्रॉसिक्यूशन के उन डॉक्युमेंट्स को पेश करने की मांग कर सकता है, जिनका इस्तेमाल प्रॉसिक्यूशन ने नहीं किया: सुप्रीम कोर्ट
Shahadat
30 Sept 2026 9:33 AM IST

सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ किया कि कोई आरोपी जांच के दौरान ज़ब्त किए गए उन डॉक्युमेंट्स को कैसे मांग सकता है, जिनका इस्तेमाल प्रॉसिक्यूशन ने नहीं किया। कोर्ट ने कहा कि हालांकि आरोपी को अपना बचाव तैयार करने के लिए प्रॉसिक्यूशन एजेंसी के पास मौजूद डॉक्युमेंट्स पाने का अधिकार है, लेकिन ऐसे डॉक्युमेंट्स की मांग किस स्टेज पर की जा सकती है, यह उन डॉक्युमेंट्स की प्रकृति पर निर्भर करेगा।
कोर्ट ने यह बात स्पेशल कोर्ट और हाईकोर्ट के उन आदेशों को रद्द करते हुए कही, जिनमें सेंट्रल ब्यूरो ऑफ़ इन्वेस्टिगेशन (CBI) को आरोपी अनिल दीक्षित द्वारा क्रिमिनल प्रोसीजर कोड, 1973 की धारा 91 के तहत मांगे गए कुछ डॉक्युमेंट्स पेश करने का निर्देश दिया गया।
यह मामला दीक्षित द्वारा दायर अर्ज़ी से जुड़ा है, जिसमें कई तरह के डॉक्युमेंट्स की मांग की गई। इनमें ज़ब्ती मेमो, CBI रजिस्टर, सोर्स इन्फॉर्मेशन रिपोर्ट, जांच के दौरान ज़ब्त किए गए वे डॉक्युमेंट्स जिनका इस्तेमाल नहीं किया गया, बिल्डिंग कमिटी की बैठकों के मिनट्स, इवैल्यूएशन कमिटी की बैठकों की रिकॉर्डिंग और मिनट्स, टेक्निकल बिड और उन दो लोगों की अपॉइंटमेंट फ़ाइलें शामिल थीं जिनके नाम FIR में तो थे लेकिन उनके ख़िलाफ़ चार्जशीट दाखिल नहीं की गई।
CBI ने कुछ डॉक्युमेंट्स पेश करने का विरोध करते हुए कहा कि कुछ डॉक्युमेंट्स गोपनीय थे, कुछ बहुत ज़्यादा मात्रा में थे, जबकि अन्य जांच एजेंसी के पास उपलब्ध नहीं थे।
सुप्रीम कोर्ट ने गौर किया कि आरोपी ने पहले के एक आदेश के तहत यह साफ़ कर दिया कि वह CBI को मिली जानकारी के सोर्स या केस डायरी की मांग नहीं कर रहा है।
बेंच ने 'स्टेट ऑफ़ ओडिशा बनाम देबेंद्र नाथ पाढ़ी' और 'सरला गुप्ता बनाम डायरेक्टरेट ऑफ़ एनफोर्समेंट' मामलों में सुप्रीम कोर्ट के फ़ैसलों पर दोनों पक्षों द्वारा दिए गए तर्कों पर विचार किया। 'देबेंद्र नाथ पाढ़ी' मामले में कहा गया कि CrPC की धारा 91 के तहत आदेश मांगने का आरोपी का अधिकार आम तौर पर केवल बचाव के स्टेज पर ही पैदा होता है, जबकि 'सरला गुप्ता' मामले में यह साफ़ किया गया कि वह टिप्पणी CrPC की धारा 227 के मकसद से "केस का रिकॉर्ड" क्या है, इस संदर्भ में की गई।
हालांकि, कोर्ट ने कहा कि अपील पर फ़ैसला करने के लिए इन दोनों फ़ैसलों के बीच दिख रहे विरोधाभास को सुलझाने की ज़रूरत नहीं है।
जस्टिस जेबी पारदीवाला और जस्टिस के विनोद चंद्रन की बेंच ने कहा,
"हमें पहले के फैसलों को देखने की ज़रूरत नहीं है, बल्कि हम इस आधार पर आगे बढ़ेंगे कि आरोपी को अपना बचाव तैयार करने के लिए जांच एजेंसी के पास मौजूद दस्तावेज़ पाने का अधिकार है; लेकिन सवाल यह उठता है कि ये दस्तावेज़ किस स्टेज पर मांगे जा सकते हैं, और इस पर मांगे गए खास दस्तावेज़ों के आधार पर विचार करना होगा।"
कोर्ट ने कहा कि आरोपी दस्तावेज़ों की जांच कर सकता है और ज़रूरी खास दस्तावेज़ों की पहचान कर सकता है। फिर ऐसे दस्तावेज़ों को सही स्टेज पर पेश करने की मांग की जा सकती है, जिसमें वह समय भी शामिल है, जब संबंधित गवाह से प्रॉसिक्यूशन या डिफेंस द्वारा पूछताछ की जा रही हो।
जवाब देने वाले आरोपी ने CBI की अपील का विरोध किया और हाईकोर्ट के आदेश का बचाव किया। उन्होंने 'सरला गुप्ता और अन्य बनाम डायरेक्टरेट ऑफ़ एनफोर्समेंट 2025 LiveLaw (SC) 541' मामले का हवाला दिया, जिसमें यह तय किया गया कि आरोपी उन दस्तावेज़ों, चीज़ों, सबूतों आदि की सूची पाने का हकदार है, जिन पर एजेंसी ने आरोप तय करने (फ्रेमिंग ऑफ़ चार्ज) के स्टेज पर भरोसा नहीं किया।
हालांकि, कोर्ट ने गौर किया कि सरला गुप्ता मामले में तय कानून आरोपी को आरोप तय करने के स्टेज पर उन दस्तावेज़ों की कॉपी मांगने का अधिकार नहीं देता है।
कोर्ट ने सरला गुप्ता मामले में कहा,
"...हालांकि आरोपी उन दस्तावेज़ों, चीज़ों, सबूतों आदि की सूची पाने का हकदार होगा, जिन पर ED ने आरोप तय करने के स्टेज पर भरोसा नहीं किया, लेकिन आम तौर पर आरोपी आरोप तय करने के स्टेज पर उन दस्तावेज़ों की कॉपी मांगने का हकदार नहीं है।"
बड़ी संख्या में मौजूद उन दस्तावेज़ों के संबंध में जिन पर भरोसा नहीं किया गया, कोर्ट ने CBI के इस रुख को स्वीकार किया कि आरोपी उनकी जांच कर सकता है, बजाय इसके कि आरोप तय करने के स्टेज पर ट्रायल कोर्ट के सामने सारा मटीरियल पेश करने की मांग की जाए।
बेंच ने कहा,
"आरोपी ऐसे दस्तावेज़ों की जांच कर सकता है और सही समय पर ज़रूरी खास दस्तावेज़ को पेश करने की मांग कर सकता है, जब सही गवाह से प्रॉसिक्यूशन या डिफेंस द्वारा पूछताछ की जा रही हो..."
CBI को निर्देश दिया गया कि वे ट्रायल के समय ज़रूरी फ़ाइलें तैयार रखें।
इसके अलावा, एजेंसी आरोपी या उसके अधिकृत प्रतिनिधि को जांच-पड़ताल के दौरान ज़रूरी दस्तावेज़ों की पहचान करने की अनुमति दे सकती है। कोर्ट ने कहा कि पहचाने गए खास दस्तावेज़ों को लिखित रूप में दर्ज किया जाना चाहिए, दोनों पक्षों के हस्ताक्षर होने चाहिए और बिना किसी देरी के ट्रायल कोर्ट के सामने पेश किया जाना चाहिए।
आरोपी द्वारा मांगी गई अलग-अलग बिल्डिंग कमिटी की बैठकों के मिनट्स (कार्यवृत्त) के बारे में CBI ने कहा था कि चार्जशीट में सिर्फ़ 27 जनवरी, 2012 की 11वीं बैठक के मिनट्स पर ही भरोसा किया गया।
आरोपी का तर्क था कि दूसरी बैठकों के मिनट्स उसकी बेगुनाही साबित करने में मदद करेंगे। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि अगर वे दस्तावेज़ जांच के लिए उपलब्ध बहुत सारे रिकॉर्ड में मौजूद थे, तो आरोपी कोर्ट द्वारा तय प्रक्रिया के अनुसार उन्हें पेश करने की मांग कर सकता था।
अगर ऐसे दस्तावेज़ CBI के पास उपलब्ध नहीं थे तो कोर्ट ने कहा कि आरोपी उन्हें हासिल कर सकता है और अपने बचाव में साबित कर सकता है, जिसमें 'सूचना का अधिकार अधिनियम, 2005' का इस्तेमाल करना या बचाव पक्ष के सबूतों के दौरान किसी उचित गवाह से पूछताछ करना शामिल है। उनकी सबूत के तौर पर अहमियत का आकलन ट्रायल कोर्ट को करना होगा।
आरोपी द्वारा मांगे गए अन्य दस्तावेज़ों के बारे में, जिनमें मूल्यांकन समिति की बैठकों की वीडियोग्राफी या फ़ोटोग्राफ़ी, 21 जनवरी, 2012 की बैठक के मिनट्स और टेक्निकल बिड शामिल हैं, CBI ने साफ़ तौर पर कहा कि यह सामग्री उसके पास उपलब्ध नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि जो दस्तावेज़ CBI के पास उपलब्ध नहीं हैं, उन्हें पेश करने का निर्देश CBI को नहीं दिया जा सकता।
कोर्ट ने यह भी नोट किया कि CBI पहले ही आरोपी द्वारा मांगे गए ज़ब्ती मेमो पेश कर चुकी थी। यह साफ़ करने के बाद कि वह जानकारी के स्रोत की मांग नहीं कर रहा है, आरोपी ने CBI रजिस्टर और स्रोत की जानकारी के लिए अपनी मांग पर ज़ोर नहीं दिया।
नतीजतन, कोर्ट ने ट्रायल कोर्ट को फ़ैसले में दिए गए निर्देशों के अनुसार आगे बढ़ने और विवादित आदेशों को रद्द करने का निर्देश दिया।
Cause Title: Central Bureau of Investigation Versus Anil Dixit

