जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका खारिज: जांच समिति गठन को चुनौती देने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

Praveen Mishra

16 Jan 2026 12:07 PM IST

  • जस्टिस यशवंत वर्मा की याचिका खारिज: जांच समिति गठन को चुनौती देने से सुप्रीम कोर्ट का इनकार

    सुप्रीम कोर्ट ने आज इलाहाबाद हाईकोर्ट के जस्टिस यशवंत वर्मा द्वारा दायर उस रिट याचिका को खारिज कर दिया, जिसमें उन्होंने लोकसभा अध्यक्ष द्वारा जांच समिति गठित किए जाने के फैसले को चुनौती दी थी। यह समिति उनके आधिकारिक आवास से अघोषित नकदी बरामद होने के आरोपों से जुड़े महाभियोग प्रस्ताव के संदर्भ में गठित की गई थी।

    यह फैसला जस्टिस दीपांकर दत्ता और जस्टिस सतीश चंद्र शर्मा की खंडपीठ ने सुनाया। इस मामले में 8 जनवरी को फैसला सुरक्षित रखा गया था, जब जस्टिस वर्मा की ओर से सीनियर एडवोकेट मुकुल रोहतगी और लोकसभा सचिवालय की ओर से सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने दलीलें पेश की थीं।

    याचिका में मुख्य तर्क

    जस्टिस वर्मा की याचिका का प्रमुख तर्क यह था कि 21 जुलाई 2025 को लोकसभा और राज्यसभा—दोनों में एक ही दिन महाभियोग नोटिस दिए गए थे, इसके बावजूद लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने राज्यसभा के निर्णय की प्रतीक्षा किए बिना और कानून में निर्धारित अनिवार्य संयुक्त परामर्श के बिना ही जांच समिति का गठन कर दिया।

    याचिकाकर्ता ने न्यायाधीश (जांच) अधिनियम, 1968 की धारा 3(2) और उसके प्रावधान (proviso) पर भरोसा किया, जिसमें कहा गया है कि यदि दोनों सदनों में एक ही दिन नोटिस दिए जाएं, तो दोनों सदनों द्वारा प्रस्ताव स्वीकार किए जाने के बाद ही, और वह भी लोकसभा अध्यक्ष व राज्यसभा सभापति द्वारा संयुक्त रूप से, समिति गठित की जा सकती है।

    घटनाक्रम

    21 जुलाई 2025: लोकसभा और राज्यसभा दोनों में जस्टिस वर्मा के खिलाफ महाभियोग प्रस्ताव पेश

    उसी दिन तत्कालीन राज्यसभा सभापति जगदीप धनखड़ ने इस्तीफा दिया

    11 अगस्त: राज्यसभा के उपसभापति ने राज्यसभा में लाया गया प्रस्ताव खारिज कर दिया

    12 अगस्त: लोकसभा अध्यक्ष ओम बिरला ने तीन सदस्यीय जांच समिति के गठन की घोषणा की

    सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस अरविंद कुमार

    एक हाईकोर्ट के चीफ़ जस्टिस

    सीनियर एडवोकेट बी.वी. आचार्य

    याचिकाकर्ता की दलीलें

    मुकुल रोहतगी ने दलील दी कि:

    समिति का गठन संयुक्त रूप से किया जाना अनिवार्य था

    राज्यसभा उपसभापति को प्रस्ताव खारिज करने का अधिकार नहीं था, क्योंकि यह शक्ति केवल सभापति को प्राप्त है

    केंद्र सरकार का पक्ष और कोर्ट की टिप्पणी

    सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता ने कहा कि:

    लोकसभा अध्यक्ष ने समिति का गठन राज्यसभा में प्रस्ताव खारिज हो जाने के बाद किया

    इसलिए संयुक्त गठन की आवश्यकता नहीं थी

    सुनवाई के दौरान पीठ ने यह टिप्पणी की कि:

    सभापति की अनुपस्थिति में उपसभापति को उनके कार्य करने का अधिकार होता है

    यह भी सवाल उठाया कि यदि प्रक्रिया में कोई त्रुटि मानी भी जाए, तो जस्टिस वर्मा को इससे क्या वास्तविक नुकसान (prejudice) हुआ है?

    निष्कर्ष

    सुप्रीम कोर्ट ने सभी दलीलों पर विचार करने के बाद न्यायमूर्ति यशवंत वर्मा की याचिका खारिज कर दी, जिससे जांच समिति का गठन वैध बना रहा और महाभियोग प्रक्रिया आगे बढ़ने का रास्ता साफ हो गया।

    Next Story