जन्म के 17 साल बाद रजिस्टर हुए बर्थ सर्टिफिकेट से नाबालिग होने का दावा अपने-आप साबित नहीं होता: सिक्किम हाईकोर्ट ने POCSO केस में आरोपी को बरी किया
Shahadat
12 Jun 2026 9:21 PM IST

सिक्किम हाईकोर्ट ने कहा कि अगर 'जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969' (Registration of Births and Deaths Act, 1969) के कानूनी नियमों का पालन नहीं किया गया तो किसी व्यक्ति के जन्म के कई साल बाद रजिस्टर किए गए बर्थ सर्टिफिकेट को अपने-आप सही नहीं माना जा सकता।
जस्टिस मीनाक्षी मदन राय और जस्टिस भास्कर राज प्रधान की डिवीजन बेंच ने देखा कि बर्थ सर्टिफिकेट 5 अप्रैल, 2022 को जारी किया गया, जिसमें पीड़िता की जन्म तिथि 1 जनवरी, 2005 दर्ज थी।
बेंच ने कहा:
"इसके अलावा, हम देखते हैं कि 'जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969' की धारा 13 जन्म और मृत्यु के देर से पंजीकरण से संबंधित है। इस अधिनियम की धारा 13 (3) में प्रावधान है कि कोई भी जन्म या मृत्यु, जिसका पंजीकरण घटना के एक साल के भीतर नहीं हुआ, उसे केवल फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट के आदेश पर ही रजिस्टर किया जाएगा। यह आदेश जन्म या मृत्यु की सच्चाई की जांच करने और तय फीस का भुगतान करने के बाद दिया जाएगा। रजिस्टर (एग्जिबिट-P15) में जन्म और मृत्यु के पंजीकरण से पहले इस प्रावधान का पालन किए जाने का कोई सबूत अभियोजन पक्ष ने पेश नहीं किया। नतीजतन, पब्लिक डॉक्यूमेंट यानी बर्थ सर्टिफिकेट (एग्जिबिट-P3) के सही होने का अनुमान उसके पक्ष में नहीं लगाया जा सकता है।"
यह मामला 10 अगस्त, 2022 को दर्ज FIR से जुड़ा है। एक युवती ने वजाइनल ब्लीडिंग, पेट दर्द और कमजोरी की शिकायत के साथ प्राइमरी हेल्थ केयर सेंटर से संपर्क किया। मेडिकल जांच में पता चला कि वह गर्भवती है।
अभियोजन पक्ष के अनुसार, महिला ने बताया कि उसने 13 जून, 2022 को आरोपी के साथ शारीरिक संबंध बनाए। जांचकर्ताओं का आरोप था कि आरोपी, जो शादीशुदा है और जिसका एक बच्चा भी है, पीड़िता के साथ रिश्ते में था और उसने उसकी सहमति से शारीरिक संबंध बनाए।
जांच के बाद POCSO Act और IPC की रेप से जुड़ी धाराओं (धारा 376) और बच्चे को जीवित पैदा होने से रोकने या जन्म के बाद उसकी मौत का कारण बनने के इरादे से किए गए कामों (धारा 315) के तहत आरोप तय किए गए।
बाद में ट्रायल कोर्ट ने आरोपी को POCSO Act और रेप के लिए दोषी ठहराया, यह मानते हुए कि घटना के समय पीड़िता नाबालिग थी।
इससे नाराज़ होकर आरोपी व्यक्ति ने उस आदेश को चुनौती देते हुए हाईकोर्ट का रुख किया। अभियोजन पक्ष ने जन्म प्रमाण पत्र का सहारा लिया जिसमें पीड़िता की जन्म तिथि 5 जनवरी, 2005 बताई गई।
हालांकि, हाईकोर्ट ने गौर किया कि प्रमाण पत्र कथित जन्म तिथि के 17 साल से ज़्यादा समय बाद 5 अप्रैल, 2022 को जारी किया गया। पीड़िता के बयान की जांच करते हुए कोर्ट ने देखा कि उसने अपनी जन्म तिथि 5 अप्रैल, 2004 बताई और दावा किया कि उसके माता-पिता ने उसकी उम्र कम करके 5 जनवरी, 2005 दर्ज कराई।
जन्म तिथि के सही होने की धारणा के बारे में कोर्ट ने कहा कि आम तौर पर जन्म प्रमाण पत्र को एक सार्वजनिक दस्तावेज़ के तौर पर सही माना जाता है, लेकिन इस मामले में ऐसी धारणा लागू नहीं की जा सकती।
जन्म और मृत्यु पंजीकरण अधिनियम, 1969 की धारा 13(3) का हवाला देते हुए कोर्ट ने कहा कि घटना के एक साल से ज़्यादा समय बाद दर्ज किए गए जन्म के लिए जन्म की सच्चाई की पुष्टि और तय फीस के भुगतान के बाद फर्स्ट क्लास मजिस्ट्रेट के आदेश की ज़रूरत होती है।
हालांकि, अभियोजन पक्ष ने आधिकारिक रजिस्टर में देर से पंजीकरण दर्ज करने से पहले इन कानूनी ज़रूरतों का पालन किए जाने का कोई सबूत पेश नहीं किया।
इसलिए बेंच ने निर्देश दिया:
"हमारी राय है कि अभियोजन पक्ष दुर्भाग्य से यह साबित करने में विफल रहा कि पीड़िता वास्तव में POCSO Act की धारा 2(d) के तहत परिभाषित 'बच्चा' थी। नतीजतन, POCSO Act की धारा 3(a) के तहत अपीलकर्ता की दोषसिद्धि और सजा रद्द की जाती है... चूंकि उनके बीच यौन संबंध आपसी सहमति से थे और अभियोजन पक्ष यह साबित नहीं कर सका कि पीड़िता एक बच्ची थी, इसलिए हम IPC की धारा 376(1) के तहत अपीलकर्ता की दोषसिद्धि और सजा की पुष्टि करने में असमर्थ हैं।"
Case Title: Jeet Hang Subba v State of Sikkim, CRL. A. No. 25 of 2024

