होटलों के लिए उदयपुर की पहाड़ियों को "बेरहमी से काटा गया", शहर की हालत 'दयनीय': हाईकोर्ट

Shahadat

31 July 2026 10:15 AM IST

  • होटलों के लिए उदयपुर की पहाड़ियों को बेरहमी से काटा गया, शहर की हालत दयनीय: हाईकोर्ट

    राजस्थान हाईकोर्ट ने उदयपुर की पहाड़ियों के बड़े पैमाने पर विनाश पर दुख जताया। कोर्ट ने कहा कि शहर की पहाड़ियों और पर्वतों को "बेरहमी से काटा गया" और उनकी जगह होटल, रिसॉर्ट और कमर्शियल इमारतें बना दी गई हैं, जिससे शहर की हालत "दयनीय" हो गई।

    जस्टिस समीर जैन की सिंगल-जज बेंच ने बसंत होटल्स प्राइवेट लिमिटेड की याचिका पर सुनवाई करते हुए ये बातें कहीं। कंपनी ने अपने होटल प्रोजेक्ट पर 2018 की हिल पॉलिसी लागू करने को चुनौती दी थी और अधिकारियों पर भेदभावपूर्ण व्यवहार का आरोप लगाया।

    24 जुलाई को सुनवाई के दौरान, कोर्ट ने कोर्ट कमिश्नरों द्वारा सौंपी गई अंतरिम रिपोर्ट और इलाके की हवाई तस्वीरों पर विचार किया। रिपोर्ट से पता चला कि पहाड़ियों पर कई होटल बनाए गए और याचिकाकर्ता की प्रॉपर्टी इसलिए अलग दिख रही थी, क्योंकि वह ज़्यादा ढलान वाली जगह पर बनी थी। कोर्ट ने यह भी गौर किया कि आस-पास की पहाड़ियों और पर्वतों को "बेरहमी से काटा गया" और उन पर इतनी ज़्यादा निर्माण गतिविधियाँ हुई हैं कि वे "खत्म होने की कगार पर हैं और उनकी जगह होटल ले रहे हैं।"

    रिपोर्ट पर ध्यान देते हुए कोर्ट ने कहा:

    "...कोर्ट को यह देखकर बहुत दुख हुआ कि उदयपुर शहर, जो ऐतिहासिक रूप से अपनी झीलों, पहाड़ों/पहाड़ियों (मगरी) और वाइल्डलाइफ सैंक्चुअरी के लिए मशहूर है, अब दयनीय हालत में पहुँच गया। सस्टेनेबल डेवलपमेंट (सतत विकास) थ्योरी और मनमाने ढंग से बनाई गई नीतियों की आड़ में, सैंक्चुअरी, संवेदनशील इकोसिस्टम, झीलों के पास और पहाड़ियों पर सैकड़ों होटल, रिसॉर्ट और कमर्शियल प्रॉपर्टीज़ बन गईं।"

    कोर्ट ने यह भी कहा कि 2018 की हिल पॉलिसी शायद प्राइवेट बाहरी एजेंसियों ने बनाई, जिसमें जलवायु, वाइल्डलाइफ, प्रदूषण और पर्यावरण संरक्षण से जुड़े सरकारी विभागों से कोई सलाह-मशविरा नहीं किया गया। कोर्ट ने कोर्ट कमिश्नर की इस बात पर भी ध्यान दिया कि उदयपुर डेवलपमेंट अथॉरिटी के अधिकारियों को हिल पॉलिसी और पहाड़ी इलाकों में निर्माण से जुड़े कानूनों की जानकारी नहीं है।

    उदयपुर की झीलों के संरक्षण से जुड़ी पहले की जनहित याचिका (PIL) का ज़िक्र करते हुए कोर्ट ने कहा कि उस मामले का निपटारा 2023 में हो गया, जब राज्य सरकार ने डिवीज़न बेंच को भरोसा दिलाया कि वह 'पब्लिक ट्रस्ट डॉक्ट्रिन' (सार्वजनिक ट्रस्ट सिद्धांत) को पूरी तरह से लागू करेगी और सही नीतियां बनाएगी।

    हालांकि, कोर्ट ने टिप्पणी की:

    "यह कोर्ट की अंतरात्मा को झकझोरने वाली बात है कि राज्य ने एक ऐसी पॉलिसी बनाई है, जिसमें न तो सोच-समझकर काम किया गया, न ही कोई विशेषज्ञता या रिसर्च एंड डेवलपमेंट शामिल है; यह पॉलिसी सिर्फ़ एक प्राइवेट एजेंसी की सपोर्ट सर्विस के आधार पर बनाई गई और इसमें पर्यावरण, जलवायु, वन्यजीव और प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जैसे मंत्रालयों और विभागों को पूरी तरह से नज़रअंदाज़ किया गया।"

    24 जुलाई के अपने आदेश में कोर्ट ने यह भी कहा था कि वह उदयपुर के पर्यावरण की सुरक्षा के लिए 'स्वतः संज्ञान' (suo motu) लेते हुए जनहित याचिका (PIL) दर्ज करने पर विचार करेगा। साथ ही, कोर्ट ने अधिकारियों को निर्माण की मंज़ूरी और 2018 व 2024 की हिल पॉलिसी (पहाड़ी क्षेत्रों से जुड़ी नीति) बनाने से जुड़े रिकॉर्ड पेश करने का निर्देश दिया।

    हालांकि, जब 28 जुलाई को इस मामले पर फिर से सुनवाई हुई तो वकील ने कोर्ट को बताया कि इस मुद्दे पर जनहित याचिका - 'झील संरक्षण समिति बनाम राजस्थान राज्य' (D.B. Civil Writ Petition No. 6960/2026) - पहले से ही डिवीज़न बेंच के सामने लंबित है और इसे 'उदयपुर चैंबर ऑफ़ कॉमर्स व अन्य बनाम राजस्थान राज्य व अन्य' (D.B. Civil Writ Petition No. 14817/2025) के साथ जोड़ दिया गया। प्रतिवादियों ने कोर्ट को यह भी बताया कि डिवीज़न बेंच ने निर्देश दिया कि मौजूदा याचिका को भी उन मामलों के साथ जोड़ा जाए।

    इसके बाद जस्टिस जैन ने रजिस्ट्रार (न्यायिक) को डिवीज़न बेंच के निर्देशों का पालन करने का आदेश दिया और कहा कि मौजूदा रिट याचिका को डिवीज़न बेंच के लंबित मामलों के साथ जोड़ा जाए, क्योंकि इसमें शामिल मुद्दे आपस में जुड़े हुए और एक-दूसरे पर निर्भर हैं।

    Title: Basant Hotels Private Limited v the State of Rajasthan

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